कर्नाटक की जनता ने भाजपा, मोदी-शाह और RSS के मुंह पर ऐसा तमाचा जड़ा है, जो बरसों याद रहेगा। कल सुबह से लेकर शाम तक,  मीडिया तो भाजपा की झूठी जीत के कसीदे पढ़ता रहा। सोशल मीडिया पर अच्छे से अच्छे उदारवादियों ने निराशा मे हाथ खड़े कर दिये। जिस मीडिया की आलोचना करने से थकते नही हैं, उसी मीडिया की मनघडँत बातो पर विश्वास कर लिया। और भाजपा की sweeping victory की घोषणा कर दी!

कर्नाटक की खासियत

भाजपा कर्नाटक मे जीत सकती ही नही थी। कुछ आँकड़े देखने थे, और थोड़ी अक्ल से काम लेना था बस। 2008 मे जब कर्नाटक मे भाजपा की ‘पूर्ण बहुमत’ वाली सरकार बनी, तब भी उसे 110 सीटें यानी simple majority से तीन सीटें कम मिली थीं। वोट प्रतिशत 33% था–कांग्रेस के 35% से कम।
इसकी वजह है कर्नाटक का जटिल जातीय-सामजिक समीकरण और राजनैतिक माहौल। सिर्फ एक जाती, लिंगायत, वोट बैंक के रूप मे, भाजपा के साथ है। लिंगायतों का प्रतिशत साफ नही है–12-17% की रेंज मे गिना जाता है। 24% SC-ST भी एक तरह से वोट नही करता।
कर्नाटक मे जाति से ज्यादा, वर्ग विभाजन रहा है। भारत के अन्य प्रदेशों की तुलना मे पूंजीवाद यहां तमाम विकृतियों के बावजूद, ज़्यादा स्वस्थ रहा है।

कर्नाटक और गुजरात

गुजरात मे वर्ग विभाजन ने जाति को कमज़ोर किया; पर कांग्रेस ने गरीब वर्ग की राजनीती को पिछड़ी जातियों की राजनीती मे क़ैद कर दिया। उभरते हुए नव-धनाड्य वर्ग ने रीऐक्शन मे हिन्दुत्व राजनीती को मज़बूत किया।
1990s और 2000s मे भाजपा की सरकारें बनवा कर, गुजराती नव-धनाड्य वर्ग की प्रमुख जातियां, जैसे पटेल, वर्गो मे विभाजित होती चली गई। पटेलों के अन्दर एक अमीर और एक गरीबी के करीब पहुंचता हुआ, खासकर गाँव मे, वर्ग पैदा हुआ। इसी वक़्त पटेलों का बड़ा हिस्सा, भाजपा से अलग होने लगा। जिसका असर हमने 2017 के गुजरात चुनाव मे देखा।
कर्नाटक मे मध्य वर्ग लगभग सभी जातियों मे फैल चुका है। कर्नाटक सर्विस इंडस्ट्रीज और नवीन उद्योगों का बड़ा केंद्र है। लेकिन कर्नाटक की राजनीती मे लिंगायत और वोकलिग्गा दो बड़ी जातियां पिछड़े वर्ग मे आती हैं–और आरक्षण का लाभ उठाती रहीं। गुजरात के पटेलों और उत्तर भारत के सवर्णो की तरह कर्नाटक मे कोई अनारक्षित जाति नही है।
समाजिक सुधार की धारा के चलते, दलित उत्पीड़न कम है। कर्नाटक एक मोडल, आधुनिक प्रदेश हो सकता था। पर राजनीती मे वोकलिग्गा के प्रभाव ने, लिंगायतों को पावर शेरिंग से दूर रखा। इसी वजह से हिन्दुत्व ने एन्ट्री मारी। और फिर कर्नाटक मे 90s और 2000s मे उभरे नव-धनाड्य वर्ग ने भाजपा का दामन थामा।

वर्ग-संघर्ष

गुजरात मे पटेल भाजपा के साथ उभरे और फिर उनमे वर्ग विभाजन हुआ। कर्नाटक मे भाजपा का दामन थामने के पहले, लिंगायत उभर चुके थे–उनके आभिजात्य वर्ग ने भाजपा को पकड़ा। और उनके साथ अन्य जातियों के उभरते हुए वर्गों ने अनुसरण किया। कर्नाटक की खासियत और द्वन्द रहा है: वर्ग चेतना का बढ़ना, पर वर्ग संघर्ष का अभाव।
भाजपा का व्यापक आधार नही है, और वो कुछ पोकेत्टस तक सीमित है। इसी वजह से उसे वोट कम मिलते हैं–पर सीट ज़्यादा। कांग्रेस का वोट पूरे राज्य मे बिखरा हुआ है। कांग्रेस का वोट जातिय पहचान से ज़्यादा गरीब, किसानो और निम्न मध्य-वर्ग का है। इसीलिये कांग्रेस को वोट प्रतिशत ज़्यादा पर सीटें कम मिली।
कांग्रेस की समस्या है, अपने पीछे गोलबंद हुई ताक़तो को एक नये, ideological-political ढांचे मे बांधना। हिन्दुत्व एक विचारधारा लेकर आ रहा है। उसका जवाब विचारधारा ही होगी। हिन्दुत्व अमीरों, नव-धनाड्य और कट्टर पन्थियों का प्लेटफॉर्म बनता जा रहा है। पर उसके बरखिलाफ कांग्रेस गरीबों और मध्य वर्ग को जोड़ती हुई नयी विचारधारा नही पैदा कर पा रही।
जनता मे हिन्दुत्व के खिलाफ गुस्सा था। उच्च मध्य वर्ग मे कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा था। एक तीसरा 20% हिस्सा, वोकलिग्गा और कुछ दलित-आदिवासियों का, कांग्रेस-भाजपा दोनो से दूर है। एसे मे त्रिशंकु विधान सभा आनी ही थी।
लेकिन कांग्रेस और जनता दल (एस) सरकार बना लेंगी। और मोदी का दक्षिण भारत मे घुसने का सपना अधूरा रह जायेगा। 2019 के लिये सन्देश है,की केन्द्र मे भाजपा को पूर्ण बहुमत नही मिलने वाली।

नोट – यह लेख , लेखक की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है
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Amaresh Mishra

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