बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों की हत्या पर सुशांत केस की तरह देश में हल्ला क्यों नहीं मचा? अगर क्राइम टीआरपी लाता है तो वे चारों केस टीआरपी भी दे सकते थे और रोमांचित करने वाले रहस्य भी, उसमें कोई संदेह भी नहीं था. उन सभी को गोली मार कर हत्या की गई।

अंधविश्वास के खिलाफ समाज को जागरूक करने वाले डॉ नरेंद्र दाभोलकर को 20 अगस्त, 2013 को पुणे में गोली मारी गई थी, जांच सीबीआई को गई, कई बार हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को बुरी तरह लताड़ा, लेकिन अभी तक ये केस अंजाम तक नहीं पहुंचा।

इस हत्या में शामिल कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन मास्टरमाइंड कौन है, ये पता नहीं चल सका। दाभोलकर का परिवार सीबीआई की भूमिका से दुखी है, उनका कहना है कि ये बेहद पीड़ादायक है कि जांच एजेंसी, जांच पूरी नहीं कर पाई और हत्याकांड के मास्टरमाइंड अब भी अज्ञात हैं।

इसके अलावा तीन बड़े बुद्धिजीवियों की हत्या की गई. गोविंद पानसरे को 16 फरवरी, 2015 को कोल्हापुर में गोली मारी गई। 30 अगस्त 2015 को प्रोफेसर एमएम कलबुर्गी की उनके घर पर हत्या की गई थी, वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की 5 सितंबर, 2017 को उनके घर के सामने हत्या की गई थी।

जांच में ये भी कहा गया कि इन सभी बुद्धिजीवियों की हत्या के तार आपस में जुड़े हो सकते हैं। कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया, लेकिन ये मामले अंजाम तक नहीं पहुंचे।

इन हत्याओं पर जो भी विरोध हुआ, वह बुद्धिजीवी समाज ने किया, राजनीति और मीडिया की उन केस में कम दिलचस्पी रही। उनकी हत्याओं के बारे में शायद ही कभी प्राइम टाइम बहस हुई हो, जबकि यह साफ था कि उनकी हत्या की गई।

हर हत्या दुखद होती है, लेकिन समाज के लिए हर व्यक्ति का महत्व अलग होता है। ये महत्व जितना बड़ा होगा, समाज का उतना ही अधिक नुकसान होगा। क्या हमने वह समाज बना लिया है जहां हम लेखकों, बुद्धिजीवियों, समाज सुधारकों, कवियों, पत्रकारों को गोली मार देंगे और दंगाइयों को सिंहासन पर बैठाएंगे?

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Krishna Kant