एंटी रोमियो स्क्वैड…
यह बड़ी अजीब सी चीज है, मगर है और फ़िलहाल उत्तर प्रदेश में है। अभी नया-नया लाया गया है और श्री योगी जी सत्ता में आये तो इसे भी साथ ही लिए आये। यह वो दस्ता है जो प्रेमियों या प्रेमालाप करते युवा-वृद्ध युगलों के विरुद्ध तैयार हुआ है। यानि आप प्रेम करते या फिर प्रेम प्रदर्शित करते पाये गए तो पुलिस का पचड़ा भी आपके मत्थे मढ़ दिया जायेगा। फिर शुरू होगा पुलिसिये लोगों और अधिकारियों के रिश्वत का खेल… बदनामी अलग और सामाजिक तिरस्कार की तो पूछिये ही मत।
जीसस कह गए, “प्रेम

परमात्मा है।” चिचा टॉलस्टॉय फ़रमा गए, “जो कुछ भी मैं समझता हूँ वो इसीलिए समझता हूँ कि मैं प्रेम कर पाता हूँ।” वैदिक काल से लेकर रीतिकालीन, भक्तिकालीन, छायावाद युगीन और वर्तमान काव्य और साहित्य के पुरोधाओं ने प्रेम की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। प्रेम के ही विभिन्न स्वरूपों की मर्मस्पर्शी व्याख्या हम आज तक किताबों-किस्सों में पढ़ते-सुनते रहे। हमारे जीवनक्रम का मूल भी हमेशा प्रेम ही रहा और उस जीवनवृक्ष का पुष्पन-पल्लवन भी केवल और केवल प्रेम ही रहा। किसी कौम ने कभी भी घृणा के बीज बोने की कुचेष्टा नहीं की।

यह सब बात सही है मगर सड़क, बाजार, दुकान, गली-मोहल्लों, बसों-ट्रेनों या पार्क वगैरह में प्रेम का अलख जगाते लोगों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई करके उन पर थोथी नीतियाँ और सारहीन मर्यादायें थोपने को कटिबद्ध ये एंटी रोमियो स्क्वैड वाले मिथ्या हिन्दुत्व से प्रेरित हैं जो यह बिलकुल भूल गए कि उनके ही सद्धर्म ने उन्हें विपुल मात्रा में सीता-राम, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती आदि प्रेमपरक आख्यान दिए हैं। वे यह भी भूल गए कि कविकुलगुरु और श्रृंगार शिरोमणि कालिदास और जयदेव आदि उनकी ही परंपरा से थे। वे बिलकुल भूल गए कि उनके पुराण और उनके महाकाव्य प्रेम-प्रसंगों की जीवंत व्याख्या थे। उन्हें सूफियों की लज़्ज़त का भले ही रत्ती भर एहसास न हो लेकिन शिवलिंग के व्यापक रहस्य और तंत्र की खरधार उनके ही सद्धर्म के सनातन प्रतीक हैं।
योगी जी की कृपा से एंटी रोमियो स्क्वैड यदि रामराज्य में भी होते तो वन-वन भटकते श्रीराम को वे कब का जेल में डाल चुके होते। योगी जी की दया से यदि महाभारत काल में भी एंटी रोमियो स्क्वैड होते तो द्वापर के महायोगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण को फाँसी पड़ गयी होती। कबीर, सुन्दरदास, दादू दयाल, मीरा, जगजीवन, नानक, गुलाल, बुल्लेशाह और भीखा सरीखे संत तो हथकड़ी डाले मिलते।
जीवन की सुवास है प्रेम। रिश्तों की मिठास है प्रेम। एक दूसरे का विश्वास है प्रेम। प्रेम ही जीवन का सर्वस्व है। प्रेम के अतिरिक्त जीवन में और कुछ है ही नहीं। मनुष्य के सारे उद्यम और प्रयास प्रेमपूर्ण जीवन व्यतीत करने में ही निहित है। प्रेम ही मनुष्य की असली सार्थकता है। प्रेम व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
समाज के सभी सदस्यों के पारस्परिक संबंधों के उचित निर्वहन और उनकी निजी स्वतंत्रता को अखंडित रखने के उद्देश्य से स्थान विशेष के आधार पर किसी निश्चित समयांतराल में सर्वसम्मति से निर्णीत नियम ही नीति और मूल्य की संज्ञा पाते हैं। नीति और नियम को यूँ न मरोड़ दिया जाना चाहिए जिससे व्यक्ति के मौलिक जीवन अधिकार ही असुरक्षित हो जाएँ। आम जीवनशैली पर थोपी गयी उन विषाक्त मर्यादाओं से मनुष्यत्व का मानमर्दन होता है। विकृति बढ़ने लगती है और नए असहज मार्ग खोज निकाले जाते हैं जिससे मानव चेतना कुंठित होती है। समग्र विकास बाधित हो जाता है। व्यर्थताओं में ही उलझकर व्यक्ति सार्थक की दिशा में स्वस्थ और स्वच्छ कदम नहीं बढ़ा पाता है।
यह सही है कि योगी जी एंटी रोमियो स्क्वैड के जरिये उच्छृंखलता और व्यभिचार पर लगाम कसना चाहते हैं लेकिन क्या कुछ काँटों को मिटाने के चक्कर में गुलाब के बगीचे में ही आग लगा देना कहाँ तक उचित है। और क्या ऐसा करने से काँटे समाप्त हो जाएँगें? रोमियो प्रेम का प्रतीक है। प्रेम पर प्रतिबंध लगाने से क्या वासना दब जायेगी? नहीं, इससे यौन विकृति और अधिक बढ़ेगी और वह सर्वग्रासी होगी। प्रेशर कुकर की सीटी जाम करने का परिणाम भयानक विस्फोट होता है योगी जी। आप चीजों को सम्हलकर देखें। मामला साफ़ दिख जायेगा। एंटी रोमियो स्क्वैड अनर्गल है। सामान्य और निर्दोष नागरिकों को अपराधी बनाने, नयी वेश्याएँ निर्मित करने और बलात्कार तथा छेड़खानी को बढ़ावा देने के साथ-साथ यौन विकृति और रिश्वतखोरी की दिशा में सफर बढ़ाने का माध्यम न बनें श्रीमान। रुकें और देखें। सत्ता आपके हाथ में है। समाज को व्यर्थ दूषित न करें।
जय श्री राम।
: – मणिभूषण सिंह
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Manibhushan Singh

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