आतंकवाद से भारत एक लंबे समय से पीड़ित है। पहले 1980 से 2000 तक पंजाब में फिर 1980 से ही अब तक जम्मू कश्मीर में। इन दोनों ही प्रदेशों में आतंकवाद की घटनाएं पाक प्रायोजित थीं और आज भी पाक प्रायोजित ही हो रही हैं। पंजाब का आतंकवाद तो अब समाप्त हो गया, पर कश्मीर का आतंकवाद न केवल लगातार हो रहा है बल्कि और बढ़ रहा है। इस कड़ी में सबसे बड़ी घटना हाल ही में पाक पोषित आतंकी संगठन, जैश ए मोहम्मद द्वारा  पुलवामा में सीआरपीएफ के कानवाय पर हमला करके 40 जवानों की ह्त्या करना रहा है। इसके जवाब में सरकार ने जवाबी कार्यवाही की और जैश के बालाकोट स्थित एक अड्डे को नष्ट कर दिया। इससे जुड़ी कार्यवाही में हमारा एक पायलट विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान द्वारा पकड़ लिया गया था जो बात में सरकार के कूटनीतिक प्रयासों से छूटा। यह न तो पहली घटना है, और न ही अंतिम । अभी भी कश्मीर में आतंकवाद उफान पर है और रोज़ कोई न कोई हिंसक घटना आतंकियों द्वारा की जा रही है।

आतंकवाद का सीधा संबंध धर्म की कट्टरता से है। अक्सर हम यह कहते हैं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता है। पर यह एक कटु तथ्य है कि हर आतंकी अपने धर्म के कट्टर विचारों से प्रभावित होकर ही हिंसक कार्यों में लिप्त होता है। यही पंजाब के आतंकी काल मे खालिस्तान आंदोलन के समय हुआ था और यही अब कश्मीर में हो रहा है। पर धार्मिक कट्टरता ही आतंकवाद का अकेला कारण हो यह बात भी सच नहीं है। धर्मांध कट्टरपंथी भावुक , बेरोजगार और अतार्किक युवा जिन्हें आसानी से बरगलाया जा सकता है, को गोलबंद करके हिंसक कार्यो में झोंक देने के लिये एक लॉन्चिंग पैड की तरह धर्म को इस्तेमाल करते हैं।  धार्मिक कट्टरता के साथ साथ नस्लीय कट्टरता की भी भूमिका आतंकवाद के प्रसार में रहती है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि कट्टरता ही ऐसे हिंसक आतंकवाद को जन्म देती है। आज जब हम किसी को कट्टर हिन्दू या कट्टर मुस्लिम कहते देखते सुनते हैं तो यह बात एक मनोविकार की तरह लगती है। कट्टरता का अर्थ प्रतिबद्धता नहीं है। प्रतिबद्धता किसी भी विचार के प्रति हो सकती है। उस विचारधारा को फैलाने, बहस करने तथा उसे विकसित करने का अधिकार सभी को है। पर उस विचारधारा को किसी अन्य विचारधारा के मानने वाले व्यक्ति पर थोपने की बात उचित नहीं है। यह थोपना ही एक प्रकार की ज़िद है और हिंसा को जन्म देती है। धर्म, जाति, नस्ल और रंग का श्रेष्ठतावाद भी एक प्रकार की कट्टरता है। इस कट्टरता को फैलाने की ज़िद हिंसक बनाती है और यही सामुहिक हिंसा आतंकवाद में बदल जाती है।

दुनिया के इतिहास में अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिये हिंसा का सहारा लेने की यह प्रवित्ति नयी नहीं है बल्कि आदिम है। जब विवेक का विस्तार नहीं हुआ था, तर्क की बात गौड़ थी तो बाहुबल का उपयोग वैचारिक विस्तार के लिये होता था। पर धीरे धीरे जैसे समाज और इतिहास विकसित होता गया बाहुबल के स्थान पर बुद्धि और तर्क का प्रयोग होने लगा। इसी प्रकार के परिवर्तन युद्धकला में भी हुये और अब युद्ध बाहुबल से कम बल्कि तकनीक और प्रत्युत्पन्नमति कौशल से अधिक लड़े जाने लगे। नस्लीय और धार्मिक कट्टरता ने वैचारिक और तार्किक बहसों की किताबें बंद कर के हिंसा का रास्ता ग्रहण कर लिया जिससे धर्म, जो समाज और लोगों को उन्नत और गरिमापूर्ण जीवन के लिये कभी अवधारित किया गया था का औचित्य ही समाप्त हो गया।

कश्मीर का आतंकवाद पाकिस्तान के एक अधूरे एजेंडे को पूरा करने की चाल है। 1947 में जब धर्म के आधार पर एक नया मुल्क बना तो, मुस्लिम बहुल इलाके उक्त नए मुल्क में गये। कश्मीर तब भी मुस्लिम बहुल था। लेकिन कश्मीर ब्रिटिश भारत मे न होकर एक रियासत था तो वह इस फॉर्मूले से पाकिस्तान में नहीं जा सकता था। यह दर्द जिन्ना को तब भी था और वह दर्द पूरे पाकिस्तान को अब भी है। इसी एजेंडे को पूरा करने के लिये पाकिस्तान ने कबायलियों से हमला करवा दिया,और श्रीनगर तक वे हमलावर पहुंच गए। आनन फ़ानन में कश्मीर के राजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया और तब भारतीय फौजों ने इन कबायलियों को पीछे खदेड़ा और अब जहां तक उन्हें खदेड़ा जा सका वह सीमा नियंत्रण रेखा बन गयी।

1947 के हमले की विफलता का प्रतिशोध लेने की कोशिश 1965 में पुनः पाकिस्तान ने किया और उसे ज़बरदस्त हार का सामना करना पड़ा। 1971 में जो हुआ वह पहले पाकिस्तान का आंतरिक मामला था, पर जब पूरा पूर्वी पाकिस्तान उबल कर विद्रोह पर आ गया तो फिर भारत पाक युद्ध हुआ और पाकिस्तान टूट गया और बांग्लादेश बना। 90,000 पाक सैनिक युद्धबंदी बने और पाकिस्तान बुरी तरह हारा। लेकिन कश्मीर का मोह उसके एजेंडे से गया नही। 1999 में करगिल घुसपैठ हुयी और यह युद्ध भी उसे हारना पड़ा। लगातार असफल होने की खीज से पाकिस्तान की रणनीति बदली और उसने आतंकी समूहों को कश्मीर में भेजना शुरू किया और कट्टर वहाबी इस्लाम की विचारधारा से ओतप्रोत ये आतंकी तंजीमें आज भी कश्मीर में सक्रिय है।

पाकिस्तान ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिये कट्टरपंथ का बुरी तरह प्रयोग किया है। चरमपंथी विचारधारा का इस्लाम कश्मीर के सूफियाना धार्मिक मानस पर आतंकी संगठनों से जुड़े मदरसों और जमातों द्वारा थोपा गया। प्रत्यक्ष में दीन की बात करने वाली इन तंजीमों का मक़सद ही यह है कि वे कश्मीर को इस्लाम का वास्ता देकर तोड़ लें, और पाकिस्तान के हित को साधे। यही एजेंडा न केवल कश्मीर में ही अपनाया जा रहा है बल्कि इसे पूरे भारत मे फैलाने की चाल है। यह एजेंडा इस सिद्धांत पर बनाया गया है कि भारत की साझी विरासत और साम्प्रदायिक सौहार्द की नींव खिसके और पूरा देश 1937 से 47 वाले जहरीले सांप्रदायिकता के वातावरण में बंट जाय। यह एजेंडा ही देश के अखंडता को तोड़ने के उद्देश्य से लाया गया है और यह योजना जनरल जिया उल हक के समय बनाई गयी भारत तोड़ो योजना का एक अंग है।

आतंकवाद के खिलाफ कोई भी लड़ाई धार्मिक कट्टरता की पैरवी करके नहीं लड़ी जा सकती है। यह लड़ाई लड़ी जा सकती है साम्प्रदायिक सद्भाव, एका, और समूह में एकजुट रह कर। पाकिस्तान और उसके पोषित आतंकी संगठन यह बात अच्छी तरह समझते हैं। वे साम्प्रदायिक सद्भाव और हिंदू मुस्लिम एका की बात सोच ही नहीं सकते हैं। क्योंकि कि पाकिस्तान का जन्म ही इसी साम्प्रदायिक विद्वेष के आधार पर हुआ है। पाकिस्तान आज भी उसी पिनक में जी रहा है कि भारतीय उपमहाद्वीप में जहां जहाँ भी मुस्लिम आबादी है, वह उसके देश का हिस्सा है। जब कि यह द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत 1971 में ही मर गया था और अब यह सिद्धांत अस्तित्वहीन हो चुका है।

आतंकवाद भले ही नस्लीय या धार्मिक कट्टरता से उपजा हुआ ज़हर हो, पर इसका स्थायी भाव हिंसा है। हिंसा जन्य भय इसका आधार है। यह एक आपराधिक कृत्य भी है। आपराधिक कृत्य का समाधान ही अपराध और दंड की संहिता और कानून से होता है। पंजाब में जो कुछ हुआ और कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, वह बड़ी आपराधिक घटनाएं हैं जो उक्त प्रदेश के कानून व्यवस्था पर जबरदस्त असर डालती है। उनसे निपटने के लिये सेना और अन्य सुरक्षा बल लगाए जाते हैं। कश्मीर में पिछले दस सालों का आंकड़ा देखें तो लगभग हर दूसरे तीसरे दिन या तो आतंकी घटनाओं में नागरिक या जवान मरे हैं, या आतंकी,सुरक्षा बलों से हुये मुठभेड़ों में मारे गए हैं। आतंकी इन हिंसक घटनाओं से दो उद्देश्य प्राप्त करते हैं। एक तो जनता निरन्तर भयभीत बनी रहे और अपनी सरकार में अपना विश्वास खोने लगे और दूसरे सुरक्षा बल भी लंबे समय तक हो रहे इस प्रछन्न युद्ध मे ऊब जाय या ऊब और चिढ़ कर कुछ ऐसे उन्मादित कृत्य कर दे कि उसका बतंगड़ और तमाशा बन जाय और इसका सीधा असर सुरक्षा बल के मनोबल पर पड़े। सुरक्षा बल कितने भी अनुशासन से अपना कार्य करे, पर जब उसका डिप्लॉयमेंट लंबे समय के लिये प्रतिकूल परिस्थितियों में होता है तो अनुशासनहीनता की छोटी बड़ी गलतियां होती ही हैं। आतंकी और उनके समर्थक इन घटनाओं का लाभ एक प्रोपैगैंडा के रूप में करने से चूकते नहीं हैं। यह आप नार्थ ईस्ट, पंजाब, कश्मीर और छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जहां काफी अरसे से सुरक्षा बल नियुक्त हैं, देख सकते हैं।

कश्मीर का आतंकवाद, भारत पाक आपसी संबंधों के जटिल समीकरण पर आधारित है। जब देश बंटा तो देश का नेतृत्व सबसे कद्दावर नेताओं के हांथ में था, पर गांधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद, जिन्ना, लियाकत अली, बादशाह खान, आदि आदि के कद धरे के धरे रह गया, और मुल्क बंट गया। न सिर्फ बंटा बल्कि इस त्रासदी में 10 लाख लोग मारे गए तथा 50 लाख की आबादी का विस्थापन हुआ। मैं इस दुखद त्रासदी को नियति कह कर अलग हट जाता हूँ। यह नियति ही तो है कि 1857 से 1947 तक हिन्दू मुसलमान एकजुट हो अंग्रेजों से लड़ते रहे और जब आज़ाद हुये तो आपस मे लड़ कर मरने लगे। 1947 के दंगे में एक भी अंग्रेज़ नहीं मारा गया जबकि वह साझा दुश्मन था। आज भी दुःखद यह है नियति अभी भी पिंड नहीं छोड़ रही है।

देश में गत दो-तीन दशकों से जिस प्रकार आतंकवाद पनप रहा है, उससे देश की अखण्डता को ही खतरा उत्पन्न हो रहा है तथा देश के  राजनीतिज्ञ इस आसन्न खतरे से अनभिज्ञ अपने-अपने राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए ही प्रयासरत हैं। आतंकवाद के शमन के लिए देश की संसद  में शायद ही कोई सार्थक बहस कभी चली हो। न तो कभी सर्वदलीय बैठक बुला कर समस्या के मूल में जाने की कोशिश की गयी और न ही सर्वसम्मति से आतंकवाद के विरूद्ध कोई कार्ययोजना ही तैयार की गयी। यदि आतंकवाद का उन्मूलन शीघ्र ही प्रभावपूर्ण तरीके से नहीं किया गया तो यह एक ऐसी जटिल समस्या बन जायेगा कि उसका हल मुश्किल से ही होगा।

धार्मिक कट्टरता से उपजे आतंकवाद का उत्तर प्रति धार्मिक कट्टरता तो नहीं ही हो सकती है। इसका उत्तर साम्प्रदायिक सद्भाव ही होगा। पाकिस्तान का उद्देश्य केवल कश्मीर ही नहीं है, बल्कि उसका एक ही उद्देश्य है भारत को तोड़ना। अगर कोई यह सोचता है कि पाक अधिकृत कश्मीर पाकिस्तान को देकर इस जटिल समस्या से पिंड छुड़ाया जा सकता है तो वह बेहद भ्रम में हैं। इससे और भी समस्या पैदा होगी। भारत तोड़ने के  इसी घृणित उद्देश्य से तो उसने खालिस्तान समर्थकों को पालना पोसना शुरू किया था। पर पंजाब में 20 साल तक आतंक फैलाने के बाद पाकिस्तान का यह प्रयोग असफल हो गया। देश न टूटे इसकी फिक्र हमे करनी होगी और हर वह तत्व, विचार, और कदम जो भारत भंग की ओर ले जाते हैं के खिलाफ मजबूती से खड़ा होना पड़ेगा। यह तभी संभव है जब साम्प्रदायिक सद्भाव बना रहे हम विविध भाषा, धर्म, संस्कृति के बावजूद भी एक समृद्ध उपवन की तरह फलते फूलते रहे। सरकार तो आतंकवाद से निपटने के लिये जो भी कर रही है उसे करने दीजिये पर हम तो एकजुट बने रहें।

© विजय शंकर सिंह