जीएसटी काउंसिल की बैठक के बाद मीडिया वित्तमंत्री जी ने कहा कि

” देश की अर्थव्यवस्था कोरोना वायरस के रूप में सामने आए असाधारण ‘एक्ट ऑफ गॉड’ का सामना कर रही है, जिसकी वजह से इस साल अर्थव्यवस्था के विकास की दर सिकुड़ सकती है।”

वित्त मंत्रालय के अनुमान के अनुसार – जीएसटी क्षतिपूर्ति अंतर 2.35 लाख करोड़ रुपये होने की उम्मीद है। यह इसलिए है क्योंकि केंद्र को कोविड द्वारा प्रभावित आर्थिक गतिविधियों के कारण जीएसटी उपकर से केवल 65,000 करोड़ रुपये एकत्र करने की उम्मीद है। पहले, इससे 3 लाख करोड़ रुपये जीएसटी कलेक्शन की उम्मीद थी।

बैठक में जीएसटी के मुआवजे पर मंथन के बाद, वित्त मंत्री ने राज्यों को दो विकल्प प्रदान किए हैं।  पहला विकल्प, आरबीआई के परामर्श से राज्यों को एक विशेष कर्ज़ की योजना सुलभ कराना है। यह कर्ज़, उपकर के संग्रह से पांच साल बाद चुकाया जा सकता है।

केंद्र इस पहले विकल्प के दूसरे चरण के रूप में एफआरबीएम अधिनियम के तहत राज्यों की उधार सीमा में 0.5 प्रतिशत की और छूट देगा। इससे राज्यों को अपनी क्षतिपूर्ति कमी को कवर करने के लिए बिना शर्त अधिक उधार लेने की अनुमति मिलेगी। महामारी के कारण पनपे विपरीत हालातों के कारण राज्य अपेक्षित मुआवजे से परे, अधिक उधार लेने का विकल्प चुन सकते हैं।

दूसरा विकल्प यह है कि इस साल पूरे जीएसटी मुआवजे के अंतर को आरबीआई से सलाह लेने के बाद उधार के जरिए पूरा किया जाए।

यानी दोनों विकल्पों की बात करें तो पहले विकल्प के तौर पर केंद्र खुद उधार लेकर राज्यों को मुआवजा देने की बात कर रहा है और दूसरे विकल्प के तौर पर आरबीआई से सीधे उधार लेने की बात कही गई है। यानी अब केवल एक ही रास्ता है, ऋणं कृत्वा घृतम पीवेत।

31 अगस्त को,जून तिमाही में जीडीपी के आंकड़े जारी हुए हैं जो माइनस 23.4 % है। आज़ादी के बाद की यह सबसे बड़ी गिरावट है। दुनिया की बात करें तो जीडीपी की गिरावट के मामले में भारत से बाद सिर्फ ब्रिटेन है, जिसकी अर्थव्यवस्था में 21.7% की गिरावट आई है।

लेकिन यह सारी गिरावट भले ही कोरोना के मत्थे मढ़ने की कोशिश की जाय, लेकिन इस महामारी का इस आर्थिक दुरवस्था में केवल अकेले ही योगदान नहीं है। महामारी, एक्ट ऑफ गॉड हो तो हो, पर जिस प्रकार से देश की आर्थिक नीतियों का संचालन 2016 से सरकार कर रही है, न केवल वे नीतियां ही त्रुटिपूर्ण हैं बल्कि उनका क्रियान्वयन भी बेहद दोषपूर्ण है। नीतियां एक्ट ऑफ गॉड नहीं हो सकती हैं, वह तो एक्ट ऑफ सरकार ही कही जाएगी। निर्दोष ईश्वर पर विफलता का ठीकरा फोड़ने के बजाय सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों और उनके क्रियान्वयन का स्वतः मूल्यांकन करना चाहिए, ताकि वह इस मिथ्या नियतिवाद से बाहर आकर स्थिति को संभालने के लिये कुछ न कुछ सार्थक कदम उठाये।

देश मे कोरोना के आने के पहले से ही देश के सारे आर्थिक संकेतकों में गिरावट आने लगी थी। यूपीए 2 के बाद जिस गुजरात मॉडल के मायामृग ने हमे छला था उसका दुष्परिणाम आज सबके सामने है। कोरोना न भी आता तो भी देश के बाजारों में मंदी रहती, लोगों की नौकरिया जातीं, आर्थिक विकास अवरुद्ध होता और जीडीपी गिरती। कोरोना ने अर्थव्यवस्था की इस गिरावट को भूस्खलन जैसी गति दे दी है, जबकि यह गिरावट तो 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे की गयी नोटबन्दी की घोषणा के बाद से ही शुरू हो गयी थी। सरकार के तीन महत्वपूर्ण निर्णय, नोटबन्दी, जीएसटी का अकुशल क्रियान्वयन, और कोरोना में लॉक डाउन की तृटिपूर्ण घोषणाओं, ने देश की विकासोन्मुख अर्थव्यवस्था को बेपटरी कर दिया। पर सरकार केवल कोरोना का उल्लेख कर, इसे एक्ट ऑफ गॉड बताती है, ईश्वर को कठघरे में खड़ा करती है, उस पर दोष मढती है और जब सरकार की नीतियों पर सवाल उठते हैं, उनके क्रियान्वयन की कमियां दिखाई जाती है, समस्याओं की ओर इंगित किया जाता है, या समस्याओं के समाधान के बारे में पूछा जाता है तो सरकार मौन रहती है और सरकारी दल अपने विभाजनकारी एजेंडे पर आ जाते हैं।

लगभग सभी अर्थशास्त्रियों ने 2016 की नोटबन्दी को एक अनावश्यक और आत्मघाती कदम बताया था और डॉ मनमोहन सिंह ने तो उसके तुरंत बाद ही यह घोषणा कर दी थी कि इससे जीडीपी में 2 % की गिरावट होगी। डॉ सिंह की यह घोषणा कोई राजनीतिक घोषणा नहीं बल्कि एक पेशेवर अर्थशास्त्री का आकलन था जो बिल्कुल सही साबित हुआ। उसके बाद सरकार ने अफरातफरी में अनेक ऐसे कदम उठाए जिससे अर्थव्यवस्था में कोई भी सुधार नहीं हुआ और 31 मार्च 2020 तक जीडीपी गिर कर 4.1% पर रह गयी। इसके बाद तो कोरोना ही आ गया।

एक्ट ऑफ गॉड (Act of God) के पहले एक्ट ऑफ सरकार द्वारा की गयी नोटबन्दी के कुछ दुष्परिणाम तो तुरन्त ही दिखने लगे थे

  • नोटबंदी (Demonetization) के अर्थव्यवस्था (Economy) की विकास दर पर पड़े नकारात्मक प्रभाव को तो अब हर कोई मान रहा है। अंतर बस इसके परिमाण को लेकर है। इससे विकास दर लगभग दो फीसदी कम हो गई और इसके बाद तो, हर साल जीडीपी की दर गिरती ही जा रही है और अब तो वह शून्य से भी नीचे जाने लगी है।
  • नोटबंदी का सबसे बड़ा कुप्रभाव, रोजगार पर पड़ा है। नोटबन्दी का एक चेन रिएक्शन हुआ। नोटबन्दी के कारण, रीयल स्टेट, असंगठित क्षेत्र आदि पर सीधा असर पड़ा और जब वे मंदी के शिकार हुए तो, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, सेवा सेक्टर, और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर बुरी तरह से प्रभावित हुए और लोगों की नौकरिया जाने लगीं। कोरोना काल के बहुत पहले, 2016 से ही, सरकार ने बेरोजगारी के आंकड़े देने बंद कर दिए थे। अकेले कोरोना काल मे ही 40 लाख लोगो की नौकरिया जा चुकी हैं। छोटी विनिर्माण इकाइयां और सेवा क्षेत्र के व्यवसाय सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था जो मूलत: खेती पर आ​श्रित होती है, पर भी इसका खासा असर देखने को मिला।
  • नोटबंदी से सरकार को कई स्रोतों से मिलने वाले राजस्व पर भी असर पड़ने लगा। जब लोगो की, क्रय क्षमता कम होगी तो, बाजार में मंदी आने लगेगी, इससे अप्रत्यक्ष कर की वसूली पर पड़ेगा। आय कम होने से प्रत्यक्ष कर भी घटने लगेगा। यह एक सरल सिद्धान्त है।
  • बैंक किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं. बैंकों की दशा नोटबंदी से और खराब हुई। नोटबंदी के पहले ही फंसे हुए कर्ज की मात्रा लगातार बढ़ते जाने से बैंक खुलकर कर्ज बांटने से बच रहे है। वे लगातार कर्ज़ की वसूली न कर पाने से  एनपीए के गिरफ्त में आने लगे। सिलसिला अब भी जारी है । वहीं नोटबन्दी के बाद मांग सुस्त हो जाने से कारोबारी भी कर्ज लेने को लेकर इच्छुक नहीं रहे।
  • नोटबंदी के दौरान जमा हुई राशि पर बैंकों को ग्राहकों को ब्याज देना पड़ा ओर नोटबंदी को लागू करने में भी बैंकों को अच्छा खासा खर्च करना पड़ा। सामान्य बैंकिंग कारोबार के प्रभावित होने से भी उन्हें नुकसान हुआ। जानकारों के अनुसार इससे बैंकों की दशा सुधरने के बजाय और पस्त ही हुई। यही वजह है कि सभी बैंक अपना नुकसान पूरा करने के लिए ग्राहकों से सेवा और रखरखाव शुल्क के नाम पर कई तरह का चार्ज वसूलने लगे हैं। अब तो बैंकों के निजीकरण की ही बात चलने लगी है।
  • केंद्र सरकार का दावा है कि नोटबंदी से महंगाई में कमी हुई जिससे ब्याज में कटौती हुई। इस बीच पिछले एक साल में आरबीआई ने ब्याज दरों में केवल चौथाई फीसदी की कमी की है। जानकार इन दोनों बदलावों को बहुत बड़ा नहीं मानते. इसके उलट नोटबंदी के बाद किसानों और असंगठित क्षेत्र के लोगो की हालत पस्त हुयी। इससे राजकोषीय घाटा बढ़ा और इससे, महंगाई के और भी बढ़ने के अंदेशा है।
  • नोटबन्दी के कुछ उद्देश्य, कालाधन की खोज, नकदी के प्रवाह में कमी और नकली मुद्रा पर रोक, बताये गए थे। सरकार आज तक यह नहीं बता पायी कि, नोटबन्दी से लाभ क्या हुआ और इसकी ज़रूरत क्या थी।

नोटबन्दी जैसे एक्ट ऑफ सरकार (Act of Modi Government) के बाद सरकार ने आधी रात को एक देश एक टैक्स जैसी योजना को काफी उत्सवपूर्ण माहौल में शुरु किया था। यह कर सुधारों की दिशा में, एक महत्वपूर्ण कदम था। पर अपनी जटिल प्रक्रिया और त्रुटिपूर्ण प्रशासनिक क्रियान्वयन से इस कर सुधार ने व्यापार और व्यापारियों को नुकसान ही पहुंचाया। लालफीताशाही को कम करने के उद्देश्य से लाये गए इस कर सुधार ने अनेक जटिलताओं को ही जन्म दिया। अब तो यह कर तंत्र देश के संघीय ढांचे के लिये ही खतरा बनने लगा है। जीएसटी की नीतियां और नियमावली जैसी बनाई गयी उससे बड़े व्यापारियों को तो भले ही लाभ हुआ हो, पर गांव कस्बों के छोटे और मझोले व्यापारियों को नुकसान ही उठाना पड़ा है।

देश मे कोरोना का पहला मामला 31 जनवरी को केरल में आया था लेकिन सरकार ने, 13 मार्च तक इसे गम्भीरता से नहीं लिया। न तो विदेश से आने वालों की कोई नियमित चेकिंग की व्यवस्था हुयी और न ही स्वास्थ्य ढांचे के सुधार के लिये कोई कदम उठाया गया। मार्च के दूसरे तीसरे हफ्ते तक तो, मध्यप्रदेश में सरकार के गिराने का ही खेल होता रहा। फिर 23 मार्च को एक दिन का ताली थाली पीटो मार्का प्रतीकात्मक लॉक डाउन हुआ, और फिर 18 दिन के महाभारत की तर्ज़ पर 21 दिनी लॉक डाउन अचानक घोषित कर दिया। तब से अब तक यह सिलसिला चल रहा है। आज दुनियाभर में महामारी संक्रमण में दूसरे स्थान पर हैं।

सरकार ने कहा कि, लॉक डाउन की अवधि का कामगारों को वेतन मिलेगा, लेकिन यह वादा नहीं पूरा हुआ। उद्योगपति धनाभाव के बहाने पर सुप्रीम कोर्ट चले गए, और अदालत में सरकार, उद्योगपतियों के ही हित मे खड़ी दिखी। कामगारों का ऐतिहासिक देशव्यापी पलायन हुआ, जिसे 1947 के बंटवारे के  महा पलायन के बाद का सबसे बड़ा पलायन कहा गया। स्टेशन पर अपनी मृतक मां की मृत्यु से अनजान एक छोटी  बच्ची का उसके ऊपर पड़ी चादर से खेलना, सरकार के प्रशासनिक विफलता की एक प्रतीकात्मक तस्वीर है, जिस पर सरकार या सत्तारूढ़ दल के किसी भी व्यक्ति ने कुछ भी नहीं कहा। क्या यह कुप्रबंधन भी एक्ट ऑफ गॉड ही कहा जायेगा ?

वित्तमंत्री का यह कहना सच है कि, लॉकडाउन से देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा है। कोरोना एक  महामारी के रूप में एक्ट ऑफ गॉड हो सकता है पर ऐसी महामारियों से निपटने में सरकार की रणनीति और उसकी प्रशासनिक विफलता तो एक्ट ऑफ गॉड नहीं बल्कि एक्ट ऑफ सरकार ही कही जाएगी। मार्च के तीसरे सप्ताह से देश अभूतपूर्व तालाबंदी में जी रहा है और सारी व्यावसायिक गतिविधियां, लगभग ठप हैं। मई के अंत मे एसोचैम जो उद्योगपतियों की एक शीर्ष संस्था है, ने देश की अर्थव्यवस्था पर अपने जो निष्कर्ष दिये थे, उसे देखे।

निवेशकों के साझा कोष का प्रबंध करने वाली कंपनी कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट के प्रबंध निदेशक (एमडी) निलेश शाह ने कहा कि, ” कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम के लिये देश भर में लागू किये गये लॉकडाउन से भारतीय कंपनियों को 190 अरब डॉलर (करीब 14 लाख करोड़ रुपये) के उत्पादन का नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि कारोबारियों को दोबारा काम-काज शुरू करने के लिये काफी लागत उठानी होगी।”

यह आंकड़ा मई 2020 के अंत का है, जबकि अब तक तीन महीने बीत चुके हैं। अब आगे पढिये, शाह ने कार्यक्रम में कहा, ‘‘हमारी अर्थव्यवस्था (जीडीपी) सालाना करीब तीन हजार अरब डॉलर की है। कारोबार पूरी तरह से बंद हो तो एक माह का उत्पादन नुकसान 250 अरब डॉलर होगा। यदि 50 फीसदी काम-काज ही बंद हों तो एक महीने में यह नुकसान 125 अरब डॉलर का होगा। इस तरह यदि हम मान कर चलें कि अब कारोबार पूरी तरह खुल जायेगा, तो केवल मई के अंत तक उत्पादन का नुकसान 190 अरब डॉलर का था, अब इससे और अधिक बढ़ गया होगा। ”

पूंजीपतियों के संगठन एसोचैम ने अर्थव्यवस्था में सुधार की राह भी बताई। पर दिक्कत यह है कि ऐसे संगठन जब कोई राह सुझाते हैं तो, उनके प्रेस्क्रिप्शन में उन्ही की समस्याओं का निदान होता है न कि जनता की मूल समस्याओं का।

एसोचेम की विज्ञप्ति के अनुसार  – शाह ने कहा कि ” कच्चा तेल सस्ता होने से इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था को 40-50 अरब डॉलर का लाभ होगा। इसी तरह यदि भारत चीन में बने सामानों की जगह स्थानीय स्तर पर सामानों का विनिर्माण करा पाये तो इससे 20 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। ऐसे में हमें लॉकडाउन के कारण हुए उत्पादन नुकसान में सिर्फ बचे 130 अरब डॉलर की भरपाई करने की ही जरूरत बचेगी। उन्होंने कहा कि इस समय कुछ उद्योगों को अनुदान या सब्सिडी की जरूरत है। इसके लिये राजकोषीय प्रोत्साहन जरूरी है। ”

इस प्रकार यदि आप पिछले छह सालों के सरकार की आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन करेंगे तो सरकार की हर नीति, चाहे वह नोटबन्दी की हो, जीएसटी की हो, कोरोना लॉकडाउन की हो, बैंकों को उबारने की हो, आरबीआई से रिज़र्व धन लेने की हो, रोजगार के लिये मुद्रा लोन की हो, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को ऋण पैकेज का हो, या महामारी से निपटने के लिये 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज का हो, सरकार आज तक इन कदमो से क्या लाभ भारतीय आर्थिकी को हुआ है न तो बता पा रही है और न ही इनसे जुड़े सवालों पर कोई उत्तर दे रही है। एक अजीब सी चुप्पी है।

देश आज प्रतिभा के अभाव से भी जूझ रहा है। कम से कम अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में तो यह बात जगजाहिर है। हमारा थिंक टैंक नीति आयोग हर मर्ज का एक ही इलाज सुझा रहा है कि, जो भी सार्वजनिक क्षेत्र की संपदा है उसे बेच दो। निजीकरण से देश को लाभ क्या होगा, यह भी सरकार को पता नहीं है। आज जब देश की जीडीपी शून्य से नीचे जा रही है और के मुकेश अंबानी और अडानी ग्रुप की संपत्तियां बेहिसाब बढ़ रही हैं, तो इसका सीधा अर्थ यह है कि, देश की संपत्ति का, चंद पूंजीपति घरानों में केंद्रीकरण हो रहा है और जनता विपन्न होती जा रही है।

नेतृत्व की पहचान और परख संकट में ही होती है । सब कुछ ठीक है तो नेतृत्व की परख नहीं हो सकती है । जब कोई संकट आसन्न हो तो उस समय नेतृत्व उस संकट से कैसे उबरता है और कैसे सबको ले कर बढ़ता है यह महत्वपूर्ण है। दिन के उजाले में तो कोई भी हमराह बन जाएगा । पर जब अँधेरा हो और मुसीबतें तथा समस्याएं सामने खड़ी हों तभी नेतृत्व की कुशलता की पहचान होती है। ऐसे समय यदि, निष्पक्ष और स्पष्ट सोच, नेतृत्व के पास नहीं है तो, वह तो भटकेगा ही, साथ ही, अपने अनुयाइयों को भी भटका देगा । यह स्थिति नेतृत्व के हर स्तर पर लागू होती है । चाहे आप किसी परिवार का नेतृत्व कर रहे हों या किसी कॉरपोरेट का या किसी प्रशासनिक ईकाई का या किस प्रदेश या देश या किसी राजनैतिक दल का ।

विपत्ति या संकट काल में सबसे अधिक ज़रूरी होता है नेतृत्व की साख  या उस पर भरोसा । अगर भरोसा और आपसी विश्वास है तो कोई भी संकट पार किया जा सकता है । पर अगर भरोसे का अभाव और साख का संकट है तो सारी सामर्थ्य रखते हुए भी उस संकट से पार पाना कठिन होता है । कभी कभी युद्धों के इतिहास में ऐसे भी क्षण आये हैं कि छोटी सेना की टुकड़ी ने बड़ी और सन्नद्ध सैनिक बटालियनों को भी मात दी है । यही स्थिति राजनैतिक या सरकार के नेतृत्व की भी है। इस समय, देश में जैसा कि स्टेट्समैन राजनैतिक नेतृत्व की कल्पना की जाती है उसका पर्याप्त अभाव है।

सरकार इस संकट के बारे में तब तक कोई निदान नहीं ढूढ़ सकती, जब तक कि वह यह स्वीकार न कर ले कि उसकी आर्थिक नीतिया और उसके द्वारा उठाये गए कुछ कदमो से देश को नुकसान पहुंचा है और अब जो स्थिति सामने है उससे उबरने के लिये उसे दक्ष और प्रोफेशनल अर्थशास्त्री समूह की आवश्यकता है। रोग और महामारी को, भले ही एक्ट ऑफ गॉड कह कर, हम निश्चिंत हो जांय पर इस महामारी से निपटने के लिये जो  तैयारियां होती हैं उन्हें तो एक्ट ऑफ सरकार से ही पूरा किया जा सकता है। आज समस्या जटिल है और स्वास्थ्य के साथ साथ, उससे अधिक गम्भीर रूप में अर्थव्यवस्था के सामने है। अब देखना है कि, सरकार इस दुर्गति से किस प्रकार निपटती है।

( विजय शंकर सिंह )