कोरोना काल में बॉम्बे हाईकोर्ट ने तब्लीग़ी जमात के विदेशी सदस्यों को ‘राहत’ दे दी है. कोर्ट का मानना है कि सरकार ने जमातियों को बलि का बकरा बनाया। न्यूज़ चैनलों और प्रिंट मीडिया ने प्रोपेगेंडा चलाकर उन्हें बदनाम किया और संक्रमण फैलने का ज़िम्मेदार बताया। उस पर पश्चाचाताप करने और क्षतिपूर्ति के लिए पॉजिटिव कदम उठाए जाने की जरूरत है। लेकिन सवाल यह है कि कोर्ट की यह सलाह कौन मानेगा?

क्या वे लोग बॉम्बे हाईकोर्ट की सलाह मान सकते हैं जिन्होंने कोरोना बम, कोरोना जिहाद जैसे प्रोग्राम चलाकर समाज में ज़हर घोला। मीडिया के उन बौद्धिक आतंकियों द्वारा फैलाया गए ज़हर के दुष्परिणाम समाज के सामने आए। इसकी शुरुआत दिल्ली के बवाना निवासी महबूब अली से हुई जो जमात से लौटा था, और उसे उसी के गांव वालों ने कोरोना फैलाने के आरोप में पीट पीट कर अधमरा कर दिया। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के चिटेहरा गांव में मीडिया द्वारा तैयार किए गए ‘राष्ट्र रक्षको’ ने मुस्लिम समुदाय के एक युवक के घर में घुसकर इसलिये तोड़फोड़ की, क्योंकि उन्हें शक था कि इस परिवार ने तबलीगी जमात से आए लोगों को अपने घर ठहराया हुआ है।

दिल्ली के राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में भर्ती एक जमाती ने कोरोना फैलाने के तानों से तंग आकर आत्हत्या करने की कोशिश की, उसकी किस्मत अच्छी थी कि उसे दूसरे साथियों ने देख लिया और उसे किसी तरह बचा लिया गया। महाराष्ट्र एक अस्पताल में भर्ती असम के जमाती ने कोरोना पॉजिटिव आने पर अपनी नसें काटकर जान दे दी। ये वे घटनाएं हैं जो दर्ज की गईं हैं, इनके अलावा और भी इसी तरह की घटनाएं हैं, जिनका उल्लेख यहां नहीं किया जा रहा है।

सब्जी बेचने वाले, फल बेचने वाले, फेरी वाले मुस्लिम मजदूरों को जिस प्रकार से नफरत और हिंसा का सामना करना पड़ा उसके गुनहगार भी अदालत को तय करने चाहिए? वे गुनहगार कोई और नहीं भारतीय मीडिया के वही बौद्धिक आतंकी हैं जिन्होंने कोरोना जैसी महामारी को एक धर्म विशेष से जोड़कर समाज में ज़हर फैलाए हैं। इसके अलावा जमातियों को गोली मारने, उनका बहिष्कार करने, उन्हें आतंकी बताने वाले सत्ताधारी दल के नेताओं ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी, हद तो तब हो गई जब तब्लीग़ी जमात की मीडिया कवरेज पर सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार की तरफ से कहा गया कि मीडिया को तब्‍लीगी जमात के मुद्दे पर रिपोर्टिंग से नहीं रोक सकते।

बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले से बहुत लोग खुश हैं, क्योंकि कोर्ट ने सरकार और मीडिया की मंशा को अपने शब्दों में बयान कर दिया है। लेकिन सवाल यह है कि जमात के नाम पर मीडिया द्वारा जो ज़हर फैलाया गया है उसकी सज़ा मुक़र्रर कौन करेगा? कौन ह्वाटस यूनीवर्सिटी के ‘चांसलर’ की सजा तय करेगा जहां से अफवाह, नफरत, प्रोपेगेंडा समाज में फैलाया गया? ताकि एक बीमारी के बहाने पूरे एक समाज को ‘देशद्रोही’ बताकर ‘ध्रुवीकरण’ कराया जा सके। कोरोना के मद्देनज़र लॉकडाउन में होने वाली सरकार की नाकामियों पर ‘तब्लीग़ी जमात’ का पर्दा डाला जा सके।

भारतीय मीडिया के बौद्धिक आतंकियों ने जमातियों के नाम पर क्या क्या नहीं चलाया? थूकने तक को सनसनी खेज़ बताकर प्रसारित किया गया, खाना मांगने को बिरायनी मांगना कहकर सनसनी खेज़ बनाया गया, हद तो तब हुई जब नर्सों से छेड़छाड़ करने के मनघड़ंत आरोप जमातियों पर लगा दिए गए। यह सब होता रहा, समाज सोता रहा, या फिर अख़बार और टीवी देखकर जमातियों को आतंकवादी बताते हुए उन्हें गोली मारने जैसे ‘आदेश’ घर, गली, मौहल्लों में देता रहा. यह सब मीडिया के बौद्धिक आतंकियों की बदौलत हुआ, दुकानदारों ने कई जगह मुसलमानों को सामान बेचने से इनकार कर दिया।

एक अस्पताल ने तो बाक़ायदा अख़बार में विज्ञापन छपवाकर ‘जमातियों’ का इलाज करने से मना कर दिया. कानपुर की डॉ. लाल चंदानी ने जमातियों को A.K-47 से भूनने की इच्छा ज़ाहिर की। आख़िर यह सब लोगों के दिमाग़ में किसने भरा? इसके तीन गुनहगार हैं, सत्ताधारी दल के नेता, ह्वाट्सप यूनीवर्सिटी के चांसलर, और भारतीय मीडिया के बौद्धिक आतंकवादी, इन्हीं तीनों ने मिलकर समाज में ज़हर बोया, जिसका परिणाम बहुत लोगों को भुगतना पड़ा है। अब देखना यह है कि इनमें से कितने लोग पश्चाचाताप करते हैं? बाक़ी मैंने पहले भी कहा था, अब फिर दोहरा रहा हूं कोरोना ने दुनिया भर में लोगों को फेफड़ों पर हमला किया, लेकिन भारत में दिमाग़ों पर हमला किया।