व्यक्तित्व

उमर मुख्तार जिन्हें “रेगिस्तान का शेर” कहा गया..

उमर मुख्तार जिन्हें “रेगिस्तान का शेर” कहा गया..

दुनिया के इतिहास को जब हम किसी भी किताब में पढने की कोशिश करते हैं तो हमारे सामने कई ऐसे चेहरे,कई ऐसे व्यक्ति आते हैं जिन्होंने अपने देश के लिए,अपने लोगों के लिए या फिर अपने समाज के लिए आवाज़ उठाई और ज़ुल्म के खिलाफ खड़े होने का काम किया,और इसकी गूँज दुनिया भर में सुनाई दी।

लेकिन ये व्यक्ति दुनिया भर में ऐसे ही नहीं प्रसिद्ध होते हैं उसके लिए हैरान कर देने वाला कारनामा करना होता है। तब जाकर दुनिया भर के लोग उनको जानते है,लेकिन कुछ नाम ऐसे भी होते है जो कभी सामने तो नहीं आ पाते है लेकिन वो ऐसा कुछ करके ज़रूर जाते है जिसे हमेशा याद किया जाना ज़रूरी है  .

इन्ही में से एक नाम है “उमर मुख़्तार” ये नाम उस शख़्स का है जिसने कलम से बंदूक तक का सफर तय किया । जिसने साम्राज्यवाद के ज़ुल्म के खिलाफ, तानाशाही के खिलाफ तकरीबन 20 साल जंग की मशाल जलायी। लीबिया के इतिहास में आज भी यह नाम “रेगिस्तान के शेर” के नाम से याद किया जाता है।

उमर मुख्तार के जन्मदिन के दिन उनकी बहादुरी के बारे में पढ़ना ज़रूरी है।

ऐसे हुई थी शुरूआत..

इतिहास में साम्राज्यवाद जब अपने पैर मज़बूत कर रहा था,उसी समय इटली की साम्राज्यवादी सरकार ने ये घोषणा कर दी थी की लीबिया के सभी संसाधनों पर अब इटली का अधिकार होगा। ये उस दौर की बात है जब इटली बेहद शक्तिशाली देश था।

उसकी बात के खिलाफ जाने का मतलब मौत थी। यही नहीं इटली की शक्ति को सभी बखूबी जानते भी थे,इसलिए इटली के खिलाफ जाने की हिम्मत कर पाना मुमकिन नही था।

लेकिन उस वक़्त उस ज़मीन पर साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़े होने वाला,एक घुड़सवार “उमर मुख्तार” अपने गुट के साथ इटली की तानाशाही का विरोध करने के लिए तैयार था।

उसने अपने देश,अपनी ज़मीन और अपनी संस्कृति की हिफाज़त करने के लिए ज़ुल्म के खिलाफ इटली की सेना से गोरिल्ला युद्ध लड़ने की तैयारी कर ली।

जन्म और आरंभिक शिक्षा

उमर मुख़्तार का जन्म लीबिया के ज़वियर जन्ज़ुर शहर में 20 अगस्त 1858 को यानी आज ही के दिन हुआ था,मुख़्तार बिन उमर के घर पैदा हुए थे,जब उमर 11 साल के थे तब उनके पिता जी का निधन हो गया था।

जब वह धार्मिक यात्रा ( हज )के लिए गये हुए थे,लेकिन अपनी मौत से पहले ही उनकी पिता की ये इच्छा थी की उनके बेटे की  जिंदगी इंसानियत की सेवा के लिए होगी।

इसलिए पारिवारिक दोस्त हुसैन गरियानी की देख रेख में उन्हें दिया गया था तभी उमर मुख़्तार ने क़ुरान को हिफ्ज़ (क़ुरान को याद करना )करने की शिक्षा वहां पर ली थी।

उमर मुख्तार ने अपना जीवन एक शिक्षक के तौर पर शुरू किया था और एक मदरसे में वो बच्चों को क़ुरान  और अरबी पढ़ाया करते थे।

शुरुआती दौर और उमर का उदय

इससे पहले सूडान के साथ संघर्ष में भागीदार रहें उमर संघर्ष से वापस लौट कर शिक्षक के तौर पर कार्य करने लगे,और बच्चों को शिक्षा देने लगे।

लेकिन शायद हालात को ये मंज़ूर नही था और इटली में तानाशाही सरकार का आरम्भ हुआ। 1912 में लीबिया को अपना उपनिवेश घोषित कर दिया और उस पर कब्जा करने का ऐलान कर दिया।

उस समय ही एक अध्यापक के तौर पर बच्चों को पढ़ाने वाले उमर मुख़्तार ने अपनी ज़मीन और अधिकारों के लिए लड़ने का फैसला लिया।

उन्होंने 1000 लोगों का संगठन बना कर इटली के विरुद्ध जंग का ऐलान किया और उमर मुख़्तार को इस दस्ते का शैख़  (लीडर )बनाया गया.

ये फैसला किया जाना बहुत बड़ा था,क्योंकि उस समय ये नामुमकिन नजर आने वाला फैसला था। जब इटली के सामने कोई खड़ा होने की हिम्मत नही कर पाता था उस वक़्त ऐसा कह पाना हिम्मत का काम था।कलम से बंदूक थामने वाले उमर मुख़्तार को इस बात का पता था।

उमर मुख़्तार न सिर्फ लड़े बल्कि लीबिया के भूगोल की समझ रखने वाले गुरिल्ला युद्ध के माहिर इस व्यक्ति ने इटली की सरकार को हिला कर रख दिया ।

पूरे 20 सालों तक लीबिया की साम्राज्यवादी सरकार के विरुद्ध संघर्ष किया,और फासीवादी ताकतों को कमज़ोर करने का काम किया ।

उमर का ये संघर्ष इतना कामयाब रहा की इटली की सेना दिन में ज़मीनो पर कब्जा किया करती थी और रात में यह संघर्षकारी उसे आज़ाद करा लेते थे,इस काम से इस संघर्ष से उमर मुख़्तार को “रेगिस्तान को शेर” कहा जाता है।

लीबिया का इलाका अधिकतर रेगिस्तान का इलाक़ा था,इसी वजह से अपनी गुरिल्ला युद्ध की तकनीक और पूरे इलाके की समझ का इस्तेमाल कर इटली की नीतियों और रणनीति के विरुद्ध चलने वाला ये सशस्त्र आंदोलन कामयाब हुआ और इटली की तानाशाह सरकार की हर नीति यहाँ विफल रही ।

ये आंदोलन ज़मीनी तौर पर अपनी तकनीकों का इस्तेमाल किया करता था,जहाँ एक तरफ इटली के फौजी गाड़ियों का इस्तेमाल करते थे वही दूसरी तरफ उमर मुख़्तार और उनकी अगुवाई का गुट घोड़ों पर सफर करते हुए उन्हें मात देता था ।

जंग भी उसूलों पर लड़ी..

उमर मुख़्तार ने जंग लड़ने का फैसला सिर्फ इसलिए किया था क्योंकि वो ज़ुल्म और अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे। उन्होंने या उनके किसी साथी ने कभी किसी बेगुनाह पर वार नहीं किया था।

एक बार हार जाने के बाद इटली सैनिक इनकी फौज के सामने फंस गए और उन्होंने सरेंडर करना चाहा, लेकिन उमर की फौज के किसी शख़्स ने उन पर हमला करने के लिए बंदूक तान दी,तब उमर ने उसका हाथ झटक दिया और कहा कि

“हम कैदियों को नहीं मारते हैं” उनके साथी ने कहा कि लेकिन वो तो हमारे साथ ऐसा ही करते हैं, तब उमर मुख्तार ने पलट कर जवाब दिया था “ये हमारे टीचर (शिक्षक) नहीं हैं”।

उमर मुख़्तार की गिरफ्तारी

इतिहास में ये बात गवाह हुई कि रेगिस्तान में मौजूद चंद घुड़सवार लोगों के गुट ने इटली की फौज जो हथियारों और शक्ति से भी भरपूर थी।उसका मुकाबला बेहद बहादुरी से किया,लेकिन स्थिति तब बदल गयी जब इटली के शासक मुसोलिनी ने अपने सबसे क्रूर जनरल ग्रज़ियानी को लीबिया भेजा। ग्राज़ियानी ने लीबिया में अत्याचारों की हदें पार कर दी।

लेकिन यहाँ भी यह “रेगिस्तान का शेर” जरा भी पीछे नही हटा और अपने देश की हिफाज़त में और वहां के लोगों के अधिकारों के लिए बराबर लड़ता रहा । यही वजह रही की “उमर मुख्तार” पूरे इटली दस्ते को अपना दुश्मन नज़र आते थे।

11 सितम्बर को जब 73 साल के उमर मुख़्तार और उनके गुट के लोग इटली के विरुद्ध लड़ रहे थे तभी अभी उमर मुख़्तार के घोड़े के गोली लग गयी और उमर मुख़्तार का संभल पाना मुमकिन न हुआ ।

जिस शख्स का इटली की सेना में से किसी ने चेहरा नही देखा था वो आज गिरफ्तार हो चूका था,और उसे फांसी देकर इस आन्दोलन को कुचल देने के लिए सब बेसब्र थे।

जब उमर मुख्तार को गिरफ्तार कर लिया गया उसके बाद ग्राज़ियानी के सामने उसे पेश किया गया,उमर से बातचीत करते हुए ग्राज़ियानी ने उमर से अपने साथियों से हथियार डालने की बात कहने को कहा तब उमर ने जो बात कही उसे आज भी याद किया जाता है .

उमर ने कहा “ हम हार नहीं मानेंगे या तो हम लड़ेंगे या मरेंगे,तुम्हे हमारी अगली पीढ़ी से लड़ना होगा और फिर अगली पीढ़ी से और जहाँ तक मेरा सवाल है मैं अपने फाँसी लगाने वाले से ज्यादा जिंदा रहूँगा”

बस इस बात ने यह मोहर लगा दी की इटली साम्राज्यवाद के ज़रिये कभी भी लीबिया को जीत नही सकता था ,उमर मुख़्तार को उनके लोगों के सामने फांसी दी गयी.

 

लेकिन उमर मुख़्तार और उनके साथी साम्राज्यवाद के विरुद्ध वैसे ही लड़ें जेसे कोई भी देशप्रेमी या देश से मोहब्बत करने वाला लड़ेगा.

उमर ने ज़ुल्म के विरुद्ध अपनी आवाज़ को उठाया और ये दिखाया की ज़ुल्म के खिलाफ अपने देश से लड़ना कितना अहम है। वहीं उनकी कही बात आज तक सही साबित हुई है।

उमर मुख़्तार आज भी जिंदा हैं,उनकी बहादुरी के कारनामे आज भी याद किये जाते हैं। ज़ुल्म के खिलाफ उठायी गई उनकी आवाज़ अमर है। इस बहादुर योद्धा पर एक फ़िल्म भी बनी है “लॉयन ऑफ डिजर्ट”।

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Asad Shaikh