शादमान चौक पर लाहौर हाईकोर्ट का फैसला और भगत सिंह

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यह एक ऐसी खबर है जो तमाम जद्दोजहद और स्वार्थांधता  से भरी खबरों के माहौल में एक सुखद हवा के झोंके से समान आयी है। पछुआ हवा की तरह यह खबर सरहद पार से आयी है। यह न तो वहां के हुक़ूमत की खबर है और न ही उनके फौजी महकमे की और न ही कांटो के जंगलों की तरह पनप रहे दहशतगर्द तंजीमों की। यह खबर अदालत के डायस से निकली है और हमारे साझे इतिहास के अत्यंत गौरवपूर्ण पृष्ठ को पुनः आर्काइव्स से ला कर हमारे सामने रख दे रही है। खबर है पाकिस्तान के शहर लाहौर की और इस खबर के नायक हैं शहीद भगत सिंह। लाहौर, भले ही पाकिस्तान का एक खूबसूरत और महत्वपूर्ण शहर हो, पर वह भारत के आज़ादी की लड़ाई के साथ इतना जुड़ा रहा है कि उस शहर को नजरअंदाज कर हम आज़ादी का इतिहास लिख ही नहीं सकते हैं। इसी शहर में 1930 की 26 जनवरी को कांग्रेस के अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास किया था। यह शहर है हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी या एसोशिएशन के सेनानी भगत सिंह का। यह शहर है सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह का। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को इसी शहर लाहौर के सेंट्रल जेल में अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। जुर्म ? आज़ादी की चाहत। ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति। क्रांति की उद्घोषणा। जिस सेंट्रल जेल में भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था, अब न वह जेल रहा, न वे तख्ते। ताज बदला तो तख्ते भी न जाने कहाँ चले गए और अब वहां है एक खूबसूरत चौराहा जिसे लोग शादमान चौक के नाम से जानते हैं।
लाहौर हाईकोर्ट ने बुधवार को  लाहौर जिला प्रशासन को उक्त  शादमान चौक का नाम बदलकर भगत सिंह के नाम पर रखने का आदेश पारित किया है। लाहौर हाईकोर्ट के न्यायधीश शाहिद जमाल खान ने लाहौर के डिप्टी कमिश्नर को यह आदेश दिया है । यह आदेश भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के चेयरमैन इम्तियाज रशीद कुरैशी द्वारा दायर की  गयी एक याचिका पर दिया गया है। यह संगठन, भगत सिंह को अन्यायपूर्ण तरीके से दिए गए प्राणदंड के खिलाफ एक कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। 2011 में हाईकोर्ट में इस संगठन द्वारा एक याचिका दायर की गयी थी कि भगत सिंह को बिना किसी सूबूतों के केवल सरकारी दबाव में अदालत ने फांसी की सज़ा सुनायी थी। उसकी पुनः सुनवायी हो और उन सूबूतों की पड़ताल की जाय। उनको जिस स्थान पर फांसी दी गयी थी, वह स्थान अब सेंट्रल जेल नहीं है बल्कि एक चौराहा है, जिसे लोग शादमान चौक के नाम से जानते हैं, का नाम बदल कर भगत सिंह चौक कर दिया जाय। अदालत ने याचिका की सुनवायी करते हुये कहा कि  – ” भगत सिंह देश के महान स्वतंत्रता सेनानी थे और स्वतंत्रता के लिए अपने साथियों के साथ शहीद हुए थे । पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने भी भगत सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि भगत सिंह जैसा स्वतंत्रता सेनानी पूरे देश में कोई नहीं रहा. याचिकाकर्ता ने कहा कि भगत सिंह के नाम पर शादमान चौक का नाम रखना न्यायपूर्ण है ।
“इम्तियाज रशीद कुरैशी ने कहा है,
“मैं अधिकारियों से आग्रह करता हूं कि शादमान चौक पर जहां भगत सिंह को फांसी दी गई थी, वहां उनकी मूर्ति भी लगाई जाए ।”
उन्होंने कहा कि – “भारत में शाहजहां, बहादुर शाह ज़फ़र और अकबर जैसे मुस्लिम शासकों के नाम पर कई सड़कें और स्मारक हैं ।. भारत सरकार ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की फोटो के साथ डाक टिकट भी जारी किए है और उनकी मूर्ति भी है। ये सारी शख्सियतें हमारे तारीख की धरोहर हैं। ”
अदालत द्वारा अपनी याचिका स्वीकार करने के फैसले के बाद कुरैशी ने खुशी जाहिर करते हुये कहा – “भगत सिंह के नाम पर शादमान चौक का नाम रखने की दिशा में यह पहला कदम है. हालांकि अदालत ने इस मामले पर फैसला करने के लिए डिप्टी कमिश्नर के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की है, लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि प्रशासन जल्द ही इस मामले में फैसला करेगा।”
उन्होंने यह भी कहा है कि, भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन ने मांग की थी कि भगत सिंह को पाकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान ‘निशन-ए-हैदर’ प्रदान किया जाना चाहिए।
लाहौर के इस शादमान चौक पर कभी अंग्रेजी जमाने की वह सेंट्रल जेल हुआ करती थी जहां 88 साल पहले, भगतसिंह और साथियों ने फांसी के फंदे को चूमा था । ब्रिटिश ऑफिसर जेपी सांडर्स पर गोली चलाने और सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के मामले में इसी जेल में भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव को लगभग दो साल ( 8 अप्रैल, 1929 से 22/23 मार्च 1931) तक कैद रखा गया था।
लेकिन अब वहां वह जेल नहीं है। वह जेल क्यों ध्वस्त कर दी गयी और उसका क्या कारण था, यह मैंने नेट और संदर्भों में ढूंढने की बहुत कोशिश की पर कोई वजह नहीं मिल पायी।
अलबत्ता डॉन अखबार के एक लेख में इसका कारण जेल का जर्जर होना, उसके स्थान परिवर्तन का एक कारण बताया गया है।  वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन यह लाहौर सेंट्रल जेल 1961 में गिरा दी गई । 1961 में पाकिस्तान में फौजी हुकूमत थी। एक मित्र का कहना है कि हो सकता है भगत सिंह के फांसी के कारण उनके स्मारक बनाने हेतु इसे गिरा दिया गया हो। लेकिन मुझे यह तर्क उपयुक्त नहीं लगता है। अगर भगतसिंह की यादों और इस धरोहर को बचाने की फिक्र तत्कालीन फौजी हुक़ूमत को होती तो एक स्मारक के तौर उक्त जेल को पाकिस्तानी हुकूमत संरक्षित रख सकती थी और एक संग्रहालय बना सकती थी । ताकि आने वाली नस्लें अपने पुरखों को पढ़ और समझ सकें। पर ऐसा न करके उस जगह को ध्वस्त कर एक आकर्षक चौराहा बना कर बाद में उसे शादमान चौक का नाम दे दिया गया । इस स्थान को लोग पहले भी और आज भी आपसी बातचीत में चौक भगत सिंह कह कर पुकारते हैं। यह भगत सिंह का भारतीय महाद्वीप के मानस में गहरे पैठे होने का यह एक प्रमाण भी है।
लेकिन इस अच्छी खबर पर एक शर्मनाक प्रतिक्रिया आतंकी हाफिज सईद की भी आयी है। आतंकवादी गुट के सरगने ने शादमान चौक का नाम बदलने के प्रस्ताव का जोरदार विरोध किया है और इसके सहयोग में खड़े लोगों को उसने धमकी भी दी है । धर्मांध कट्टरपंथी मानसिकता के लोग भगत सिंह को कभी भी पसंद नहीं कर सकते है। भगत सिंह साम्प्रदायिक एकता को देश की आज़ादी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खात्मे के लिये सबसे ज़रूरी समझते थे। हालांकि उस समय तक जहरीले द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का जन्म नहीं हुआ था। यह ज़हर सावरकर और जिन्ना द्वारा 1937 के बाद फैलाया गया। हाफ़िज़ सईद और अन्य धर्मांध दहशतगर्द संगठन भला भगत सिंह के साथ कैसे खड़े हो सकते हैं ? वे तो विरोध ही करेंगे।
दरअसल भगत सिंह के नाम पर शादमान चौराहे के नामकरण का हाफ़िज़ सईद द्वारा किया गया विरोध, उसके लिये एक प्रकार से भारत का विरोध है। भले ही भगत सिंह की जन्मस्थली और शहादत का स्थान पाकिस्तान के पंजाब में हो पर भारतीय महाद्वीप के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में भगत सिंह सबसे लोकप्रिय क्रांतिकारी माने जाते हैं। इसका कारण, न तो असेम्बली में बम फेंकना है और न ही सांडर्स हत्याकांड। बल्कि भगत सिंह की राजनैतिक विचारधारा जो उन्हें भारत के क्रांतिकारी आंदोलन में एक विशिष्ट स्थान दिलाती है। भारत के स्वाधीनता संग्राम की मुख्य धारा भले ही गांधी जी और कांग्रेस के आंदोलनों के रूप में रही हो पर, देश के अंदर और देश के बाहर भी कई संगठन और स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों की जमात सक्रिय थी। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद आदि का संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी भी उनमें से एक था। यह उन नौजवानों का समूह था जो 1917 में हुयी रूसी क्रांति और महान साम्यवादी विचारक मार्क्स और लेनिन से प्रभावित थे। ये दुनिया बदलने के सपने देखते थे। ये एक ऐसी दुनिया के तलबगार थे जो शोषण से मुक्त हो कर एक समतावादी समाज के निर्माण की ओर अग्रसर हो। भगत सिंह ब्रिटिश राज से केवल इसी लिये मुक्ति नहीं चाहते थे कि वह एक विदेशी सत्ता थी, बल्कि वे पूंजीवाद के बर्बर रूप उपनिवेशवाद जो व्यक्ति के शोषण से आगे बढ़ कर राज्य और समाज का शोषण करने लगा था से मुक्ति चाहते थे। यह लड़ाई सिर्फ एक संप्रभु राज्य के लिये ही नहीं थी बल्कि एक समाजवादी और शोषण मुक्त समाज के स्थापना के लिये  थी। भगत सिंह अगर फांसी पर शहीद नहीं हुए होते और वे जीवित रहते तो, देश को न केवल एक जुझारू और निडर नेतृत्व मिलता बल्कि एक गम्भीर राजनैतिक विचारक भी मिलता जो समय के साथ साथ और परिपक्व हो जाता।  पर यह हो न सका।
ब्रिटिश हुकूमत भगत सिंह से कितना ख़ौफ़ज़दा थी इस प्रसंग से स्पष्ट हो जाएगा। भगत सिंह और उनके साथी लाहौर जेल में अनशन पर थे। यह अनशन, जेल की आंतरिक खानपान और अन्य अव्यवस्थाओं के बारे में था। उस दौरान जवाहरलाल नेहरू उनसे मिलने जेल में गये भी थे। नेहरु ने इसका उल्लेख भी किया है और तब के अंग्रेज़ी दैनिक ट्रिब्यून में यह खबर प्रमुखता से छपी भी थी। भगत सिंह और उनके साथी शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो गए थे पर उनके मनोबल और दृढ़ता पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ा था। जतिनदास उसी अनशन में शहीद हो गए पर वे टूटे नहीं। इस दौरान मुक़दमे की कार्यवाही में उनके न जाने के कारण ट्रायल नहीं हो पा रहा था। भगत सिंह ट्रायल का परिणाम जानते थे। देश भर में हो रही उनके ट्रायल से ब्रिटिश हुकूमत की किरकिरी से भी वह अनभिज्ञ नहीं थे। अंग्रेज़ी सरकार उनके मुक़दमे का फैसला जल्द कराना चाहती थी। वह नहीं चाहती थी कि भगत सिंह का ट्रायल लम्बा चले और पंजाब तथा देश मे इस पर चर्चा हो। लेकिन तब जो कानून था, उसके अनुसार उनकी उपस्थिति के बिना ही मुक़दमे की सुनवाई नहीं हो सकती थी। पंजाब सरकार ने यह कानून बदलने की सोची। इसलिए कानून में एक संशोधन लाया गया कि मुल्ज़िम की उपस्थिति ट्रायल के दौरान अनिवार्य नहीं होगी। असेम्बली में यह कानून पेश हुआ। उसके विरोध में एमए जिन्ना ने जो कहा, उसे पढिये,
” सवाल उठा-जिस पर आरोप है, वही अदालत में अपने बचाव के लिए मौजूद नहीं तो फिर सुनवाई कैसे हो ?
अंग्रेजी सरकार ने एक संशोधन पेश किया है। इस संशोधन के जरिए अदालत को अधिकार दिया गया है कि आरोपी अगर स्वेच्छा से कोर्ट ना आए तो फिर उसकी गैरमौजूदगी में उसके खिलाफ अदालती सुनवाई जारी रह सकती है.” जिन्ना ने 12 सितंबर 1929 के दिन इस बिल पर बहस के दौरान असेंबली में कहा – ” आप चाहते हैं यह सदन इस मामले में एक खास कानून बनाये, ऐसा कानून जो इस मामले (भगत सिंह) में भूख-हड़ताल तुड़वाने का औजार बने । याद रखिए कि ये लोग ( भगत सिंह और उनके साथी ) सर पर कफन बांध चुके हैं । ये कोई मजाक नहीं है । जो भूख हड़ताल पर बैठता है उसे अपने जमीर (विवेक) पर यकीन होता है । वह अपने जमीर के कहे पर चलता है और उसे अपने मकसद के जायज होने का भरोसा होता है। वे कोई आम अपराधी नहीं है और चाहे मैं उनके रास्ते को पसंद नहीं करता लेकिन आप चाहे उन्हें कितना भी गुमराह बता लें लेकिन यह आपकी सरकार है..निन्दा के काबिल यह आपकी सरकार जिससे ये लोग नफरत करते हैं.’
जिन्ना यहीं नहीं रुके भगत सिंह के पक्ष में अंग्रेजी सरकार  की पोलपट्टी खोलते हुए उस रोज असेंबली में कहा था,
” क्या आज की तारीख में दुनिया में ऐसी भी कोई सभ्य सरकार है जो दिन-रात, हर हफ्ते और हर महीने अपने लोगों को कटघड़े में खड़े करने पर आमादा है ?..अगर आंखें खोलकर देखें तो क्या आपको खुद ही यह महसूस नहीं होता कि आपकी नीतियों और आपके कार्यक्रमों के खिलाफ लोगों में आक्रोश है, चौतरफा आक्रोश..?
यह बिल अंग्रेज़ सरकार की असहजता और भय को स्पष्ट रूप से बताता है। कानून तो असेम्बली से नहीं बना पर एक अध्यादेश ज़रूर लाया गया। कानून सर्वोच्च है कि बात करने वाले अंग्रेज़ों का एक चेहरा यह भी था।
पाकिस्तान के साथ एक विडंबना यह भी रही है कि वह अपना अलग इतिहास चाहता है पर अतीत को तो नया नहीं गढ़ा जा सकता है।  1947 में अंग्रेज़ मुल्क छोड़ गए तो उससे पहले का सारा इतिहास ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास हो गया । पाकिस्तान इस इतिहास की खुल कर चर्चा करने और इसका अध्ययन करने से बचता है। इस इतिहास में अगर हिन्दू मुस्लिम, और द्विराष्ट्रवाद की बात करने वाले जिन्ना और सावरकर हैं तो बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो इस साम्प्रदायिक पचड़े के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई में तन मन धन से समर्पित हैं। गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, आज़ाद, मौलाना हसरत मोहानी, बादशाह खान और क्रांतिकारियों की पूरी जमात है जो साप्रदायिक ताकतों के खिलाफ थी और आज़ाद भारत चाहती थी। पर जब आज का पाकिस्तान आज़ादी के इन नायकों को पढ़ना चाहता है या पढ़ना चाहेगा तो उसे अपनी ज़मीन ही दरकती नज़र आएगी। वह मानता है कि-
उसके पास जिन्ना के अलावा कोई और बड़ा नाम नहीं है, जिसका उल्लेख वह आज़ादी के नायकों के रूप में कर सके। और जिन्ना भी आज़ादी के वैसे नायक नहीं रहे हैं जैसे नाम मैंने ऊपर गिनाये हैं। जिन्ना भी अपने गैर इस्लामी आचरणों के कारण उसे नापसंद होते हुए भी  मजबूरी के पसंद हैं क्योंकि जिन्ना उस जहरीले द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांतकार हैं जिनके ऊपर पाकिस्तान का पूरा वजूद टिका है। आज़ाद तो पाकिस्तान भी हुआ था.। अंग्रेजों से लड़ाई में लाहौर, ढाका, रावलपिंडी जैसे शहर भी बग़ावत के केंद्र में रहे थे। जब आज़ादी नसीब हुई तो आज़ादी की सारी लड़ाई का इतिहास ‘भारतीय’ इतिहास बन गया. ऐसा नहीं है कि इसमें भारत का कोई हाथ रहा हो, लेकिन कुछ तो पैरेंट कंट्री होने से और कुछ पाकिस्तान की खुद की हठधर्मी की वजह से पाकिस्तान के पास अपना कहलाने जैसा इतिहास नदारद है। उनके यहां जो इतिहास पढ़ाया जाता है उनमें प्रमुखता से उन्हीं लोगों का ज़िक्र है जिनकी पाकिस्तान बनाने में भूमिका रही। मुहम्मद अली जिन्ना, अल्लामा इकबाल, मौलाना शौकत अली, मौलाना मुहम्मद अली जौहर, चौधरी रहमत अली वगैरह-वगैरह। पाकिस्तान में जिन्ना और इकबाल के उदार और धर्मनिरपेक्ष विचारों को भी वे नहीं पढ़ाते है। कभी कभार वे गांधी का ज़िक्र कर देते हैं वे नेहरू से वैसे ही चिढ़ते हैं जैसे हम भारतीय जिन्ना से।
इस विडंबना के बावजूद भगत सिंह को पाकिस्तान में  लोकप्रियता प्राप्त है। यह बात थोड़ी हैरान करने वाली इसलिए है, क्योंकि भगत सिंह में पाकिस्तान जैसे धर्मांध मुल्क का हीरो होने के लिए ज़रूरी बुनियादी खसूसियात नहीं थी। जैसे कि वो नॉन-मुस्लिम थे, नास्तिक थे, रशियन क्रांति से हमदर्दी रखते थे और साम्यवादी विचारों के थे। इसके बावजूद भगत सिंह पाकिस्तान में बेहद मशहूर हैं. हर साल 23 मार्च को उन्हें बड़े जोशो-खरोश के साथ वहां याद किया जाता है। लाहौर हाईकोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिये। पाकिस्तान में इम्तियाज रशीद कुरेशी और उनके जैसे लोगों का जो देश की साझी विरासत और अतीत के साथ एक धर्मांध और कट्टर मुल्क में खड़े हों का उत्साहवर्धन किया जाना चाहिये। वहां ऐसे लोग हैं पर हो सकता हो, खामोश हों पर उनके इस कदम की सराहना की जानी चाहिये।

© विजय शंकर सिंह
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