सबरीमाला मंदिर महिलाओं का प्रवेश और मर्दवादी मानसिकता

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सबरीमाला मंदिर में दो औरतें घुसने में कामयाब रही हैं. वहां के महंत मंदिर को बंद कर शुद्धिकरण करने में कामयाब रहे हैं. सबरीमाला का मंदिर देश में सिर्फ एक जगह नहीं है. आपको महंत बने बैठे पुरुषों का ये तरीका घरों में, ऑफिसों में भी देखने को मिल सकता है. चार-पांच पुरुष मिलकर एक औरत को बदनाम कर सकते हैं, उसका कार्यक्षेत्र में रहना मुश्किल कर सकते हैं, उसका ऑफिस में काम करना मुश्किल कर सकते हैं. सिर्फ बातों के आधार पर.
औरत के लिए सबरीमाला मंदिर हर जगह बनाया जा सकता है. और इन मंदिरों में भी वही औरतें प्रताड़ित होती हैं, जो रजस्वला होती हैं. यानी बचपन पार कर कार्यक्षेत्र में आने की उम्र वाली कामकाजी औरतें. बच्चियों और उम्रदराज औरतों से तो ये पुरुष इज्जत से ही पेश आएंगे. चिढ़ तो कामकाजी और जवान औरतों से है.
जैसे सबरीमाला में औरतों के प्रवेश को लेकर महंतों ने औरतों की भीड़ इकट्ठा कर ली है, वैसे ही ऑफिस रूपी मंदिरों में भी महंत औरतों की भीड़ इकट्ठा कर लेते हैं, जिनको एक औरत का संघर्ष नहीं दिखाई देता. उन्हें महंतों की बात सही लगती है. महंतों के खिलाफ बोलती औरत उनको अपवित्र नजर आती है. इसके लिए वो औरतें कोई तर्क, कोई संवेदनशीलता नहीं दिखातीं.
सबरीमाला मंदिर में औरतों का घुसना उसी मर्दवादी मानसिकता के खिलाफ प्रतिरोध है, जिस मानसिकता में ये लोग औरत के बारे में पांच बातें कहकर या फैलाकर उसका रहना मुश्किल करते हैं, उसका आना-जाना मुश्किल करते हैं. एक मर्द के लिए कितना आसान है! घर बैठे एक औरत के बारे में फतवा दे देना और अपनी बात के लिए समर्थन जुटा लेना! औरत से पूछा तक नहीं जाएगा कि वो क्या कहना चाहती है! मर्द ने अपवित्र कह दिया, वो हो गई.

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