विचार स्तम्भ

नज़रिया – आपको मनौवैज्ञानिक तौर पर इन 'घटनाओं का आदी बना दिया गया है

नज़रिया – आपको मनौवैज्ञानिक तौर पर इन 'घटनाओं का आदी बना दिया गया है

सोचिये उत्तराखंड के सतपुली में एक गाय से दुष्कर्म हो जाता है मगर कोई गौरक्षक उस कुकर्मी को एक थप्पड़ तक नहीं मारता, वहीँ हापुड़ में अपने खेत से गाय भगाने वाले क़ासिम को नामर्द भीड़ घेर कर पीट पीट कर मार डालती है, ये क़त्ले आम करने की सोची समझी साजिश नहीं तो क्या है?
मॉब लिंचिंग, मुसलमानों से गौरक्षकों की गुंडागर्दी और क़त्ले आम, दलितों पर अत्याचार, देश में हो रहे बलात्कार और हत्याएं, हत्यारों और दंगाइयों का सम्मान जैसी घटनाएं इतनी होने लगी हैं है क़ि अब लोग उतने नहीं चौंकते ना ही बेचैन होते हैं जितने 2014 या 2015 में हुआ करते थे, ये एक मनौवैज्ञानिक रणनीति के तहत देश की सोयी जनता को इसकी आदत डाल रहे हैं.
दादरी के अख़लाक़ के सुनियोजित क़त्ल को याद कीजिये और उसके विरोध में देश में सड़कों पर हुए प्रचंड विरोध को याद कीजिये, न सिर्फ सड़कों बल्कि सोशल मीडिया पर भी इसका विरोध #Internationl_Shame हैशटैग के ज़रिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा था, वैश्विक मीडिया ने इसे प्रमुखता दी थी.
अख़लाक़ के बाद भी ये क्रम निरंतर जारी है, दादरी के अख़लाक़ के बाद चालीस के लगभग लोग इस सुनियोजित साजिश की भेंट चढ़ गए, मगर अब वो बेचैनी वो विरोध कहीं नज़र नहीं आता जो दादरी के वक़्त आया था, ठीक यही मॉब लिंचिंग में भी हो रहा है, बलात्कारों हत्याओं और दंगों में भी हो रहा है.
ये लोग इन करतूतों को अप्रत्यक्ष रूप से सहमति और मान्यता देकर देश में लागू कर चुके हैं, और देश की सोयी हुई जनता इसे अब रोज़ मर्रा की घटनाएं समझ कर पेज स्क्रॉल कर जाती है, मुठ्ठी भर लोग हैं जो आज भी इस अन्याय के खिलाफ आज भी ज़मीनी तौर पर तन कर खड़े हैं.
मगर इस सुनियोजित एजेंडे के खिलाफ अगर आवाज़ें उठती हैं तो उन्हें कुटिलता से दबा दिया जाता है, सीबीआई का बुलावा आता है, या पुलिस का दबाव बनता है, या फिर धमकियाँ मिलने लगती हैं, या फिर उसमें हिन्दू मुस्लिम एंगल पैदा कर उसे विवादित बना दिया जाता है, वो पहले जैसा प्रचंड विरोध अब कहीं नज़र नहीं आता, यही सब ये लोग चाहते थे.
पंगु और असहाय विपक्ष केवल मोदी विरोध के बलबूते बनने वाली हवा के दम पर अपनी अपनी पतंगे उड़ाने की वाहियात कोशिशें कर रहे हैं, सभी विपक्षी दलों के आईटी सेल की हालत उस नक़लची बच्चे की तरह है जो अपने आगे वाले किसी भी भोंदू बच्चे की कॉपी की नक़ल मारकर पास होने के सपने देखने लगता है.
कोई चमत्कार ही इस देश की बदतर होती हालत को सुधार सकता है.

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Syed Asif Ali

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