यु टयूब पर घटते हुए डिसलाइक के हजारों स्क्रीनशॉट तैर रहे हैं। यह तौर तरीका छह सालों में बार बार दिखा है। जीडीपी के आंकड़ों से लेकर बेरोजगारी तक, जीएसटी के आंकड़ों से कॅरोना तक, अब आकंड़े विश्वसनीय नही रह गए। अब तो यह साफ है, कि जो बताया जा रहा है, वास्तविकता उंसके उलट है।

दिल्ली में इस बार आप की जीत के बाद यह पोस्ट लिखी थी। पढिये, विचारिये। आम आदमी पार्टी जीत गयी, विपक्षी जीत गया। इससे EVM को कोई सर्टिफीकेट नहीं मिलता।

आतिशी और सिसोदिया का लम्बे समय तक ट्रेल करना, कुछ घण्टों तक 30 से अधिक सीटो पर हजार से नीचे का मार्जिन चलना.. अंतिम नतीजों के मद्देनजर शक का पूरा कारण देता हैं। मुझे लगता है एकदम ही भर भर के वोट नहीं मिले होते, तो पार नही पा सकते थे। सही वोटिंग होती तो मामला 62 पर नही अटकता।

Evm पवित्र है या नही, टेम्पर हो सकती है या नहीं.. इस बहस को किनारे कीजिये। “evm एक अपारदर्शी प्रक्रिया है, और अपारदर्शी सिस्टम का लोकतंत्र की सबसे महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया में स्थान नही होना चाहिए”… यह जर्मनी की सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट है।

वोट देने वाले नही, वोट गिनने वाला मायने रखता है। मतपत्र से हुए चुनाव में ऑब्जर्वर के सामने एक एक मत खोला जाता है, चेक किया जाता है, बंडल बनते हैं, गिना जाता है। evm सीधे थोक में एक आंकड़ा देती हैं। ऑब्जर्वर के रूप में बैठा अधिकारी या पार्टी एजेंट, गिनती तो जानता है, मगर मशीन के कोडिंग को नही जानता समझता। उसे मशीन की पवित्रता पर आस्था रखनी पड़ती हैं।

चेकिंग का दूसरा रास्ता भी बन्द है, जिसमें आप अधिकतम सिर्फ 5% की विविपैट पर्ची चेक कर सकते हैं। और अगर 100% करने लगें तो मशीन का औचित्य क्या??? मगर क्या लोकतंत्र का तकाजा ये नही कि, हर एक वोट चेक होना चाहिए??? भले दो दिन अतिरिक्त लग जाएं। चार महीने चलने वाला चुनाव चार माह सात दिन चलने दो।

लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया, अपने तकनीक प्रेम का शोकेस बंनाने की जरूरत नही। जिंदगी की सबसे बेसिक चीजें हम सशरीर, मानवीय तरीके से करते हैं। चुनाव की प्रकिया भी मानवीय तरीके से होनी चाहिए। परिणाम पाने की जल्दी है तो प्रोसेस दो दिन पहले शुरू कर दीजिए, इससे फर्क नही पड़ता। मगर लोकतंत्र में आयी सरकार हर शकों शुबहे से मुक्त होनी चाहिए।

Evm अपारदर्शी है। जर्मनी ने इसी तर्क के आधार पर अपने यहां मतपत्र वापस शुरू किए। भारत मे भी इसकी सख्त जरूरत है।