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माँ बनने के बाद छुआ बुलंदियों का आसमान

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“माँ ” नाम का शब्द केवल एक शब्द ही नहीं इसमें पूरी दुनिया समा जाती है. हर किसी की जिंदगी में अगर सबसे महत्वपूर्ण इंसान है, तो वो उसकी माँ है क्योंकि उसकी मां से करीब कोई नहीं होता है जो अपने बच्चों को गर्भ से लेकर मृत तक बिना किसी लालच के प्यार करती है. कहते हैं ना कि दुनिया मे आते ही हमारी पहली कक्षा माँ की गोद होती है ,माँ के स्पर्श से शिशु को ग़लत और सही का अहसास होने लगता है.
जैसे-जैसे हम बड़े होने लगते है तो हमारी शिक्षा की शुरूआत घर से होने लगती है,माँ हमे बताती है कि हमे कैसे बड़ो से व्यवहार करना है,खाना कौन से हाथ से खाना है,खाने से पहले और बाद में हाथ धोना है,सोने से पहले और बाद में ब्रश करना है। ये सरी बातें माँ हमे सिखाती है, कह सकते है कि जीने का सलिका माँ ही हमे सिखाती है। माँ लफ़्ज़ लिखने में जितना छोटा दिखता है लेकिन लफ्ज़ पढ़ने में उतना भारी भी है, माँ के किरदार के लिए आप चाहे जितना भी लिखो, बोलो,पढ़ो कुछ भी कर लो मगर आप माँ के किरदार को बयां नही कर सकते।

अंशु जैमसेनपा


पूरी कायनात में माँ वो शख्सियत है जो अपने बच्चो को सूखे में सुलाए और खुद गीले में सो जाती है। घर में गिले मुँह को पोछने के लिए महँगे से महंगा और मुलायम से मुलायम कपड़ा ही क्यों न हो मगर जो बात माँ के पल्लू से मुँह साफ करने में है वो कंही नही है। मैं कह रही हूँ न कि हम चाहे कितना भी लिख ले कम है। अब बात आती है उस माँ बनने के खूबसूरत अहसास को जीना ,जो औरत इस अहसास से गुज़रती है वो बहुत ही खुशनसीब औरत है। मगर इसी दुनिया मे कुछ ऐसे लोग है ,जो इसे अपनी कैरियर में अड़चन समझते है,लेकिन आज की मॉडर्न लाइफ में जी रही महिलाओं को गलत साबित किया है।
उन महिलाओं ने जिनका मैं एक ज़िक्र आपके सामने करने जा रही हूँ। जिन्होंने दुनिया की सबसे ऊँची चोटी से लेकर सीरियाई कैंप में मुसीबतों का सामना किया है, और लगातार कर भी रही है. अभी भी हर मानने को तैयार नही है । तो दोस्तों में आज आपके सामने उन औरतों की कहानी बताऊंगी। जिन्होंने माँ बनने के बाद भी हौंसले को बुलंद रखा है,और परेशानियों का सामना किया हैं।

अंशु जैमसेनपा

अरुणाचल प्रदेश के बोमडिला की अंशु जैमसेनपा ने दो बार माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई कर दुनिया में नया इतिहास रच दिया है। इससे पहले भी वह इस पर्वत पर दो बार फतह कर चुकी हैं ,अंशु एक पर्वतारोही होने के साथ-साथ दो बेटियों की मां भी है. अंशु बताती हैं, की लोगों ने उन्हें बहुत कुछ कहा लेकिन उनकी इच्छा थी. कि मेरे बच्चे मुझ से प्रेरणा लें. मैं यह जानती थी कि एवरेस्ट पर जाना आसान नहीं खतरे का काम है, फिर मैंने डायरी लिखनी शुरू की ताकि वहां कुछ होता है,तो मैं अपने बच्चों को बता सकूं. कि उनकी मां स्वार्थी नहीं थी, वह आगे कहती हैं की उनकी छोटी बेटी को लगता था. कि पर्वतारोहण भी एक गेम है, इसीलिए उसने जाने से पहले बोला की” मम्मी बेस्ट होकर आना” उसकी यही बात मेरा हौसला बढ़ाती रही।

फोटो – रजनी बाला

रजनी बाला

वाकई में पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती इस मिसाल को पूरा किया है, लुधियाना की रहने वाली रजनीबाला ने उन्होंने 44 साल की उम्र में अपने बेटे के साथ दसवीं की परीक्षा पास करके इस बात को साबित कर दिया। रजनी बताती हैं कि परिवार की मुसीबतों के कारण उन्होंने दसवीं की परीक्षा नहीं दी थी फिर उनकी शादी हो गई। रजनी कहती हैं कि अब मुझे मौका मिला और उन्होंने उस मौके का फायदा उठा लिया। रजनी सुबह 4:00 बजे उठकर पढ़ती हैं, घर का खाना बनाती हैं, और नौकरी पर जाती हैं, फिर अपने बेटे के स्कूल में जाकर ही पढ़ाई करती हैं। अब उनकी ख्वाहिश है कि वह आगे की पढ़ाई अपने बेटे के साथ ही जारी रखेंगी।

अमीरा

सीरिया जहां एक तरफ बमबारी और आतिशबाज़ी के माहौल से गुजर रहा है, वही एक ऐसी महिला है जो 5 बच्चों की मां भी हैं। और पेट्रोल पंप पर ईंधन भरने का काम करती है अमीरा दारा की रहने वाली है। वह कहती हैं मुझे गैस स्टेशन पर काम करते देखकर कई पुरुष हंसते हैं, लेकिन मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे बच्चों का भविष्य बनाना है।

घरोब

3 बच्चों की मां घरोब सीरिया के होम्स शहर के एक अनुसंधान में रहती थी, हालात बिगड़ने पर उनके परिवार को शरणार्थी कैंप में रहना पड़ा। उन्होंने वहां आकर ट्रैक्टर चलाना सीखा और वह अब लोगों को पानी सप्लाई करती हैं। वह कहती हैं मेरे पति कुछ समय के लिए बाहर थे. जिससे यहां आने के बाद मैं और मेरे बच्चे अकेले पड़ गए थे. मुझे ट्रैक्टर चलाते देखकर पुरुष हैरान भी होते हैं, लेकिन मुझे लगता है की सब बराबर हैं।

शरणार्थी कैंपों में संघर्ष पर मां लिख रही है नई कहानियां

ये हक़ीक़त है कि माँ अपने बच्चों के लिये जंग का मैदान भी नही छोड़ती. और ये सबक हमे दे रही है सीरिया के ये महिलाएं, जिन्हें भुला नही जा सकता। मैंने आपको बताया जिन औरतो के बारे में वह सब वो औरतें हैं। जिन्होंने माँ बनने के बाद छुआ है, बुलंदियों का आसमान. हमें सलाम करना चाहिए उन सभी औरतों को जिनके जज़्बे अभी भी बुलंद हैं और हमेशा बुलंद रहे। एक सोच जो कुछ लोगो के दिमाग़ में रहती है कि माँ बनने के बाद उनके कैरियर और शौक़ पर आँच आ जायेगी। वो गलत है. वो पूरी तरह से ग़लत साबित हुई हैं। हमें ऊप्पर वाले ने इतनी ताक़त दी है कि हम हर काम अपने दिल और मेहनत के साथ हर परेशानी में कर सकें। इसके लिए आपको मज़बूत बनना ज़रूरी है।
औरत होना कोई मजबूरी नही है। औरत को जितना कमज़ोर, बेचारा दिखाया जाता है, ऊपर वाले ने उसमे उतनी ही हिम्मत दी है. एक गलत सोच कभी भी अच्छी सोच से जीत नही सकती।

शगुफ्ता ऐजाज़
दिल्ली विश्विद्यालय
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