भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी की आज 27 वी पुण्यतिथि है.श्रीपेरंबुदूर में 21 मई 1991 को हुए हमले में भारत ने राजीव गांधी के तौर पर एक होनहार नेता ही नहीं खोया, बल्कि यह भारत में पहला विदेशी आतंकवादी हमला भी था. राजीव गांधी की हत्या के पीछे श्रीलंकाई अलगाववादी संगठन लिट्टे का हाथ था. वेलुपिल्लै प्रभाकरण द्वारा 1976 में स्थापित इस संगठन का उद्देश्य श्रीलंका में एक स्वतंत्र तमिल राज्य की स्थापना करना था.

क्यों की गयी राजीव गांधी की हत्या

श्रीलंका में तमिलों के लिए अलग देश की मांग के नाम पर तीन दशकों तक चले जातीय संघर्ष से भारत शुरू से जुड़ा रहा. इसकी कई वजह हैं जिनमें श्रीलंका की तमिल आबादी से जातीय संबंध, रणनीतिक हित और भूराजनैतिक प्रभाव कायम करने की आकांक्षा.

 

भारत और श्रीलंका के बीच 1987 में हुए शांति समझौते में लिट्टे अनमने ढंग से शामिल हुआ क्योंकि वह श्रीलंका में भारतीय सैन्य हस्तक्षेप नहीं चाहता था.इसीलिए वह समझौते के उस हिस्से को मानने को तैयार नहीं था जिसमें उससे हथियार डालने को कहा गया. फिर भी उसने समझौते की खातिर बहुत से हथियार सौंपे, लेकिन काफी कुछ अपने पास बनाए भी रखे.

अक्टूबर 1987 तक स्थिति यह पैदा हो गई कि भारतीय शांति सेना का लिट्टे से सीधा टकराव होने लगा। लिट्टे इस बात को फैलाने में भी कामयाब रहा कि भारतीय शांति सेना मानवाधिकारों का गंभीर हनन कर रही है. श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति राणासिंघे प्रेमदासा भी भारतीय शांति सेना की मौजूदगी के खिलाफ थे. अपने 1000 से ज्यादा सैनिकों को गंवाने के बाद आखिरकार भारत पर अपनी शांति सेना को बुलाने का दबाव था. इस बीच भारत में चुनाव हुए और 1989 में सत्ता राजीव गांधी के बाद सत्ता वीपी सिंह के हाथ में आई. उन्होंने श्रीलंका में शांति सेना के मिशन को नाकाम करार दिया और 1990 में शांति सैनिकों की वापसी का आदेश दिया.

इस कदम से लिट्टे को और ताकत मिली और उसने अलग तमिल राष्ट्र के लिए अपनी मुहिम तेज कर दी. भारत में 1991 में फिर चुनावों की बिसात सजी. राजीव गांधी ने श्रीलंका की एकता और अखंडता को बनाए रखते हुए तमिलों की समस्याएं हल करने पर बल दिया, जो साफ तौर पर अलग तमिल राष्ट्र के लिए लड़ रहे लिट्टे की विचारधारा के खिलाफ था.

लिट्टे को लगता था कि वह अपना तमिल ईलम राष्ट्र पाने के करीब है, ऐसे में अगर राजीव गांधी भारत की सत्ता में लौटे तो उसके रास्ते की बाधा बन सकते थे.

21 मई 1991 को तमिलनाडु की एक चुनावी सभा में एक महिला आत्मघाती हमलावर धनु ने धमाका कर राजीव गांधी की जान ले ली. वैसे इसे पहले 1987 में कोलंबो में राजीव गांधी को परेड के दौरान निशाना बनाने की नाकाम कोशिश की गई थी.

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इसी दौरान 1988 में राजीव गांधी ने मालदीव में तमिल संगठन PLOTE की तख्तापलट कोशिशों को भारतीय सेना भेज नाकाम करवा दिया. तमिल आतंकियों में इसे लेकर भी खासी नाराजगी थी.

कैसे रची गई राजीव गांधी की हत्या की साजिश

1990 के समय जाफना(श्रीलंका) में लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण और उसके चार साथियों बेबी सुब्रह्मण्यम, मुथुराजा, मुरूगन और शिवरासन ने राजीव गांधी की हत्या की साजिश रची. इन चारों को प्रभाकरण ने अलग अलग जिम्मेदारी सौंपी

  • बेबी सुब्रह्मण्यम- लिट्टे आइडियोलॉग, हमलावरों के लिए ठिकाने का जुगाड़.
  • मुथुराजा- प्रभाकरण का खास, हमलावरों के लिए संचार और पैसे की जिम्मेदारी.
  • मुरुगन- विस्फोटक विशेषज्ञ, आतंक गुरू, हमले के लिए जरूरी चीजों और पैसे का इंतजाम.
  • शिवरासन- लिट्टे का जासूस, विस्फोटक विशेषज्ञ, राजीव गांधी की हत्या की पूरी जिम्मेदारी.

प्रभाकरण से राजीव की हत्या का फरमान लेने के बाद बेबी सुब्रह्मण्यम और मुथुराजा 1991 की शुरूआत में चेन्नई पहुंचे. इनके जिम्मे था बेहद अहम और शुरूआती काम. बेबी और मुथुराज को चेन्नई में ऐसे लोग तैयार करने थे जो मकसद से अंजान होते हुए भी डेथ स्क्व्यॉड की मदद करें. खासतौर पर राजीव गांधी के हत्यारों के लिए हत्या से पहले रुकने का घर दें और हत्या के बाद छिपने का ठिकाना.

बेबी सुब्रह्मण्यम और मुथुराजा चेन्नई में सीधे शुभा न्यूज फोटो एजेंसी पहुंचे. एजेंसी का मालिक शुभा सुब्रह्मण्यम इलम समर्थक था. शुभा सुब्रह्मण्यम के पास  दोनों की मदद का पैगाम बेबी और मुथुराजा के पहुंचने से पहले ही आ चुका था. शुभा को साजिश के लिए लोकल सपोर्ट मुहैया कराना था. यहां पहुंच कर बेबी और मुथुराजा ने अपने अपने टारगेट के मुताबिक अलग-अलग काम करना शुरू कर दिया.

बेबी सुब्रह्मण्यम ने सबसे पहले शुभा न्यूज फोटो एजेंसी में काम करने वाले भाग्यनाथन को अपने चंगुल में फंसाया. राजीव हत्याकांड में सजा भुगत रही नलिनी इसी भाग्यनाथन की बहन है जो उस वक्त एक प्रिंटिंग प्रेस में काम करती थी. भाग्यनाथन और नलिनी की मां नर्स थी. नर्स मां को इसी समय अस्पताल से मिला घर खाली करना था.

मुश्किल हालात में घिरे भाग्यनाथन और नलिनी को आतंकी बेबी ने पैसे और मदद के झांसे में लिया. बेबी ने एक प्रिंटिंग प्रेस भाग्यनाथन को  सस्ते में बेच दिया. इससे परिवार सड़क पर आने से बच गया. बदले में नलिनी और भाग्यनाथन बेबी के प्यादे हो गए. साजिश का पहला चरण था समर्थकों का नेटवर्क बनाना जो शातिर दिमागों में बंद साजिश को धीरे-धीरे अंजाम तक पहुंचाने में मददगार साबित हों पर बिना कुछ जाने.

एक तरफ बेबी सुब्रह्मण्यम चेन्नई में रहने के सुरक्षित ठिकाने बना रहा था तो मुथुराजा बेहद शातिर तरीके से लोगों को अपनी क्रूर साजिश के लिए चुन रहा था. चेन्नई की शुभा न्यूज फोटो एजेंसी में काम करने वाले इन शैतानों के लिए वरदान बन गए थे. यहीं से मुथुराजा ने दो फोटोग्राफर रविशंकरन और हरिबाबू चुने.

रविशंकरन और हरिबाबू दोनो शुभा न्यूज फोटोकॉपी एजेंसी में बतौर फोटोग्राफर काम करते थे. हरिबाबू को नौकरी से निकाल दिया गया था. मुथुराजा ने हरिबाबू को विज्ञानेश्वर एजेंसी में नौकरी दिलाई. श्रीलंका से बालन नाम के एक शख्स को बुला कर हरिबाबू का शागिर्द बनाया. इससे हरिबाबू को काफी पैसा मिलने लगा और उसका झुकाव मुथुराजा की तरफ बढ़ने लगा. मुथुराजा ने अहसान के बोझ तले दबे हरिबाबू को राजीव गांधी के खिलाफ खूब भड़काया कि अगर वो 1991 के लोकसभा चुनाव में जीत कर सत्ता में आए तो तमिलों की और दुर्गति होगी.

राजीव की हत्या के लिए साजिश की एक एक ईंट जोड़ी जा रही थी. श्रीलंका में बैठे मुरूगन ने इस बीच जय कुमारन और रॉबर्ट पायस को चेन्नई भेजा. ये दोनों पुरूर के साविरी नगर एक्सटेंशन में रुके. यहां जयकुमारन का जीजा लिट्टे बम एक्सपर्ट अरीवेयू पेरूलीबालन 1990 से छिप कर रह रहा था. इन दोनों को श्रीलंका से चेन्नई भेजने का मकसद था अर्से से चुपचाप पड़े कंप्यूटर इंजीनियर और इलेक्ट्रॉनिक एक्सपर्ट अरीवेयू पेरूलीबालन को साजिश में शामिल करना ताकि वो हत्या का औजार बम बना सके. आगे चलकर पोरूर का यही घर राजीव गांधी हत्याकांड के प्लान का हेडक्वार्टर बन गया. यहीं से चलकर पूरी साजिश श्रीपेरंबदूर तक पहुंची थी.

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शातिर सूत्रधार जुड़ने वाले हर शख्स के दिमाग में राजीव गांधी के खिलाफ भीषण नफरत भी पैदा कर रहा था. उन्हें पता था कि भयंकर नफरत के बिना भीषण घिनौनी साजिश अंजाम तक नहीं पहुंचेगी. जब बेबी और मुथुराजा ने अपने अपने चार लोग जोड़ लिए तो साजिश में मुरूगन की एंट्री हुई.

मुरुगन ने चेन्नई पहुंच कर बहुत रफ्तार में साजिश को अंजाम की ओर लाने की कोशिशें तेज कीं. मुरूगन के इशारे पर जयकुमारन और पायस. नलिनि-भाग्यनाथन-बेबी-मुथुराजा के ठिकाने पर पहुंच गए. राजीव गांधी विरोधी भावनाएं लोगों के दीमाग में भरी जाने लगीं. नलिनी राजीव गांधी के खिलाफ पूरी तरह तैयार हो गयी थी. नलिनि जिस प्रिटिंग प्रेस में नौकरी करती थी वहां छप रही एक किताब सैतानिक फोर्सेस ने उसके ब्रेनवॉश में अहम भूमिका निभाई. ब्रेनवॉश के साथ मुरूगन ने हत्यारों की नकली पहचान तैयार करने के लिए जयकुमारन और पायस की मदद से फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया.

मुरूगन,मुथुराजा और बेबी ने मिलकर चेन्नई में छिपने के तीन महफूज ठिकाने खोज लिए. अरवियू के तौर पर एक बम बनाने वाला तैयार था. राजीव के खिलाफ नफरत से भरे नलिनी पदमा और भाग्यनाथन की ओट तैयार थी. शुभा सुब्रह्मण्यम जैसा आदमी मुहैया कराने वाला तैयार था. अब शिवरासन को संदेशा भेजा गया. मार्च की शुरूआत में वो समुद्र के रास्ते चेन्नई पहुंचा. वो पोरूर के इसी इलाके में पायस के घर में रुका.

पोरूर ही राजीव गांधी की हत्या की साजिश का कंट्रोलरूम बन गया. शिवरासन के पोरूर पहुंचते ही जाफना के जंगलों की साजिश का जाल पूरा हो गया. शिवरासन ने कमान अपने हाथ में ले ली. बेबी औऱ मुथुराज को श्रीलंका वापस भेज दिया गया. चेन्नई में नलनी,मुरूगन और भाग्यनाथन के साथ शिवरासन ने मानवबम खोजा पर वो नहीं मिला. शिवरासन ने अरीवेयू पेरुली बालन के बम की डिजायन को चेक किया, शिवरासन खुद अच्छा विस्फोटक एक्सपर्ट था. सारी तैयारी को मुकम्मल देख मानवबम के इतंजाम में शिवरासन फिर समुद्र के रास्ते जाफना वापस गया वहां वो प्रभाकरण से मिला. उसने प्रभाकरन को बताया कि भारत में मानवबम नहीं मिल रहा है. इसपर प्रभाकरन ने शिवरासन की चचेरी बहनों धनू और शुभा को उसके साथ भारत के लिए रवाना कर दिया.

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धनू और शुभा को लेकर शिवरासन अप्रैल की शुरूआत में चेन्नई पहुंचा. धनू और शुभा को वो नलिनी के घर ले गया. यहां मुरूगन पहले से मौजूद था. शिवरासन ने बेहद शातिर तरीके से पायस- जयकुमारन-बम डिजायनर अरिवू को इनसे अलग रखा और खुद पोरूर के ठिकाने में रहता रहा. वो समय-समय पर सबको सही कार्रवाई के निर्देश देता था. अब चेन्नई के तीन ठिकानों में राजीव गांधी हत्याकांड की साजिश चल रही थी. शिवरासन ने टारगेट का खुलासा किए बिना बम एक्सपर्ट अऱिवू से एक ऐसा बम बनाने को कहा जो महिला की कमर में बांधा जा सके.

शिवरासन के कहने पर अरिवू ने एक ऐसी बेल्ट डिजाइन की जिसमें छह आरडीएक्स भरे ग्रेनेड जमाए जा सके. हर ग्रेनेड में अस्सी ग्राम सीफोर आडीएक्स भरा गया. हर ग्रेनेड में दो मिली मीटर के दो हजार आठ सौ स्पिलिंटर हों. सारे ग्रेनेड को सिल्वर तार की मदद से पैरलल जोड़ा गया. सर्किट को पूरा करने के लिए दो स्विच लगाए गए. इनमें से एक स्विच बम को तैयार करने के लिए और दूसरा उसमें धमाका करने के लिए था और पूरे बम को चार्ज देने के लिए 9 एमएम की बैटरी लगाई गई. ग्रेनेड में जमा किए गए स्प्रिंटर कम से कम विस्फोटक में 5000 मीटर प्रतिसेकेंड की रफ्तार से बाहर निकलते यानी हर स्प्रिंटर एक गोली बन गया था. बम को इस तरह से डिजायन किया गया था कि आरडीएक्स चाहे जितना कम हो अगर धमाका हो तो टारगेट बच न सके और वही हुआ भी.अब शिवरासन के हाथ में बम भी था और बम को अंजाम तक पहुंचाने वाली मानवबम धनू भी. इतंजार था तो बस राजीव गांधी का.

12 मई 1991 को शिवरासन-धनू ने पूर्व पीएम वीपी सिंह और डीएमके सुप्रीमो करूणानिधि की रैली में फाइनल रेकी की. तिरुवल्लूर के अरकोनम में हुई इस रैली में धनू वीपी सिंह के बेहद पास तक पहुंची उसने उनके पैर भी छुए. बस बम का बटन नहीं दबाया. पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की रैली में सुरक्षा का स्तर राजीव की सुरक्षा के बराबर न सही तो कम भी नहीं था पर शिवरासन और धनू के शातिर इरादे कामयाब रहे. इससे शिवरासन के हौसले बुलंद हो गए और उसे अपना प्लान कामयाब होता दिखने लगा.

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लोकसभा चुनाव का दौर था राजीव गांधी की मीटिंग 21 मई को श्रीपेरंबदूर में तय हो गई. शिवरासन ने पलक झपकते ही तय कर लिया कि 21 को ही साजिश पूरी होगी. 20 की रात शिवरासन नलिनि के घर रैली के विज्ञापन वाला अखबार लेकर पहुंचा और तय हो गया कि अब 21 को ही साजिश पूरी होगी.

नलिनी के घर 20 मई की रात धनू ने पहली बार सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देने के लिए चश्मा पहना. शुभा ने धानू को बेल्ट पहना कर प्रैक्टिस करवाई और श्रीपेरंबदूर में किस तरह साजिश को अंजाम तक पहुंचाना है इसकी पूरी तैयारी मुकम्मल कर ली गई. सभी पूरी तरह शांत और मकसद के लिए तैयार थे. 20 मई की रात को सभी ने साथ मिलकर फिल्म देखी और सो गए. सुबह हुई तो पांच लोग शिवरासन-धनू-शुभा-नलिनी और हरिबाबू साजिश को पूरा करने के लिए तैयार थे.

श्रीपेरंबदूर में रैली की गहमागहमी थी. राजीव गांधी के आने में देरी हो रही थी. बार-बार ऐलान हो रहा था कि राजीव किसी भी वक्त रैली के लिए पहुंच सकते हैं. पिछले छह महीने से पक रही साजिश अपने अंजाम के बेहद करीब थी. एक महिला सब इंस्पेक्टर ने उसे दूर रहने को कहा पर राजीव गांधी ने उसे रोकते हुए कहा कि सबको पास आने का मौका मिलना चाहिए. उन्हें नहीं पता था कि वो जनता को नहीं मौत को पास बुला रहे हैं. नलिनी ने माला पहनाई, पैर छूने के लिए झुकी और बस साजिश पूरी हो गई.

धमाके के बात कैसे थे हालात

बीबीसी हिंदी के एक लेख के मुताबिक़ – उस समय गल्फ न्यूज की संवाददाता और इस समय डेक्कन क्रॉनिकल, बंगलौर की स्थानीय संपादक नीना गोपाल, राजीव गांधी के सहयोगी सुमन दुबे से बात कर रही थीं.

नीना याद करती हैं, “मुझे सुमन से बातें करते हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे कि मेरी आंखों के सामने बम फटा.  मैं आमतौर पर सफेद कपडे नहीं पहनती.  उस दिन जल्दी-जल्दी में एक सफेद साडी पहन ली.  बम फटते ही मैंने अपनी साडी की तरफ देखा.  वो पूरी तरह से काली हो गई थी और उस पर मांस के टुकडे और खून के छींटे पडे हुए थे. ये एक चमत्कार था कि मैं बच गई, मेरे आगे खडे सभी लोग उस धमाके में मारे गए थे.”

नीना बताती हैं, “बम के धमाके से पहले पट-पट-पट की पटाखे जैसी आवाज सुनाई दी थी.  फिर एक बडा सा हूश हुआ और जोर के धमाके के साथ बम फटा.  जब मैं आगे बढीं तो मैंने देखा लोगों के कपडो में आग लगी हुई थी, लोग चीख रहे थे और चारों तरफ भगदड मची हुई थी.  हमें पता नहीं था कि राजीव गांधी जीवित हैं या नहीं. ” श्रीपेरंबदूर में उस भयंकर धमाके के समय तमिलनाडु कांग्रेस के तीनों चोटी के नेता जी के मूपनार, जयंती नटराजन और राममूर्ति मौजूद थे.

जब धुआँ छटा तो राजीव गाँधी की तलाश शुरू हुई.  उनके शरीर का एक हिस्सा औंधे मुंह पडा हुआ था. उनका कपाल फट चुका था और उसमें से उनका मगज निकल कर उनके सुरक्षा अधिकारी पीके गुप्ता के पैरों पर गिरा हुआ था जो स्वयं अपनी अंतिम घडियाँ गिन रहे थे.

बाद में जी के मूपनार ने एक जगह लिखा, “जैसे ही धमाका हुआ लोग दौडने लगे. मेरे सामने क्षत-विक्षत शव पडे हुए थे, राजीव के सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्ता अभी जिंदा थे. उन्होंने मेरी तरफ देखा, कुछ बुदबुदाए और मेरे सामने ही दम तोड दिया मानो वो राजीव गाँधी को किसी के हवाले कर जाना चाह रहे हों. मैंने उनका सिर उठाना चाहा लेकिन मेरे हाथ में सिर्फ मांस के लोथडे और खून ही आया.  मैंने तौलिए से उन्हें ढक दिया.

“मूपनार से थोडी ही दूरी पर जयंती नटराजन अवाक खडी थीं. बाद में उन्होंने भी एक इंटरव्यू में बताया, “सारे पुलिस वाले मौके से भाग खडे हुए.  मैं शवों को देख रही थी, इस उम्मीद के साथ कि मुझे राजीव न दिखाई दें.  पहले मेरी नजर प्रदीप गुप्ता पर पडी. उनके घुटने के पास जमीन की तरफ मुंह किए हुए एक सिर पडा हुआ था. मेरे मुंह से निकला ओह माई गॉड… दिस लुक्स लाइक राजीव. वहीं खडी नीना गोपाल आगे बढती चली गईं, जहाँ कुछ मिनटों पहले राजीव खड़े हुए थे. नीना बताती है, “मैं जितना भी आगे जा सकती थी, गई. तभी मुझे राजीव गाँधी का शरीर दिखाई दिया.  मैंने उनका लोटो जूता देखा और हाथ देखा जिस पर गुच्ची की घडी बँधी हुई थी. थोडी देर पहले मैं कार की पिछली सीट पर बैठकर उनका इंटरव्यू कर रही थी.  राजीव आगे की सीट पर बैठे हुए थे और उनकी कलाई में बंधी घडी बार-बार मेरी आंखों के सामने आ रही थी.

इतने में राजीव गांधी का ड्राइवर मुझसे आकर बोला कि कार में बैठिए और तुरंत यहाँ से भागिए.  मैंने जब कहा कि मैं यहीं रुकूँगी तो उसने कहा कि यहाँ बहुत गड़बड़ होने वाली है.  हम निकले और उस एंबुलेंस के पीछे पीछे अस्पताल गए जहाँ राजीव के शव को ले जाया जा रहा था.

जब सोनिया गांधी को राजीव गांधी की मौत की खबर दी गई

रशीद किदवई सोनिया की जीवनी में लिखते हैं, “फोन चेन्नई से था और इस बार फोन करने वाला हर हालत में जॉर्ज या मैडम से बात करना चाहता था.  उसने कहा कि वो खुफिया विभाग से है.  हैरान परेशान जॉर्ज ने पूछा राजीव कैसे हैं? दूसरी तरफ से पाँच सेकेंड तक शांति रही, लेकिन जॉर्ज को लगा कि ये समय कभी खत्म ही नहीं होगा. वो भर्राई हुई आवाज में चिल्लाए तुम बताते क्यों नहीं कि राजीव कैसे हैं?  फोन करने वाले ने कहा, सर वो अब इस दुनिया में नहीं हैं और इसके बाद लाइन डेड हो गई.

जॉर्ज घर के अंदर की तरफ मैडम, मैडम चिल्लाते हुए भागे. सोनिया अपने नाइट गाउन में फौरन बाहर आईं. उन्हें आभास हो गया कि कुछ अनहोनी हुई है. आम तौर पर शांत रहने वाले जॉर्ज ने इस तरह की हरकत पहले कभी नहीं की थी. जॉर्ज ने काँपती हुई आवाज में कहा “मैडम चेन्नई में एक बम हमला हुआ है. “सोनिया ने उनकी आँखों में देखते हुए छूटते ही पूछा, “इज ही अलाइव? ” जॉर्ज की चुप्पी ने सोनिया को सब कुछ बता दिया.

रशीद बताते हैं, “इसके बाद सोनिया पर बदहवासी का दौरा पडा और 10 जनपथ की दीवारों ने पहली बार सोनिया को चीख कर विलाप करते सुना.  वो इतनी जोर से रो रही थीं कि बाहर के गेस्ट रूम में धीरे-धीरे इकट्ठे हो रहे कांग्रेस नेताओं को वो आवाज साफ सुनाई दे रही थी.  वहाँ सबसे पहले पहुंचने वालों में राज्यसभा सांसद मीम अफजल थे. उन्होंने मुझे बताया कि सोनिया के रोने का स्वर बाहर सुनाई दे रहा था. उसी समय सोनिया को अस्थमा का जबरदस्त अटैक पडा और वो करीब-करीब बेहोश हो गईं.

जांच एजेंसियों के लिए कैमरा बन था सुराग

धमाके के तुरंत बाद शिवरासन चेन्नई की ओर भागा. नलिनी और सुधा उससे चेन्नई में आकर मिले. वहां शिवरासन ने सुधा को बताया कि हरिबाबू तो मारा गया पर उसका कैमरा वहीं पड़ा है. शिवरासन ने सुंदरम को हरिबाबू का कैमरा मौके से उडा़ने की जिम्मेदारी सौंपी. सुंदरम ने काफी कोशिश की पर नाकाम रहा और फिर उस कैमरे के रोल में कैद तस्वीरों ने वो सुराग दिए जिन्होंने राजीव के हत्यारों को जांच दल के शिकंजे तक पहुंचा दिया.

इस हत्याकांड के 26 दोषियों को सबसे पहले 1998 में फांसी की सजा मिली. 2000 में इस सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी. इसके बाद इस हत्याकांड के आरोप संथन, मुरुगन और पेरारिवलन ने राष्ट्रपति को दया याचिका भेजी. जिसे 2011 में खारिज कर दिया गया. और इन तीनों ही आरोपियों को फांसी पर चढ़ाने की तैयारी होने लगी. लेकिन तब मद्रास हाईकोर्ट ने इनकी फांसी की सजा पर रोक लगा दी और इसके बाद मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में आ गया था. इससे पहले दोषियों में शामिल मुरुगन की पत्नी नलिनी की फांसी को सोनिया गांधी की अपील पर उम्रकैद में बदल दिया गया था.