विचार स्तम्भ

क्या विरोधियों के खिलाफ़ यूपीकोका क़ानून का दुरूपयोग होगा ?

क्या विरोधियों के खिलाफ़ यूपीकोका क़ानून का दुरूपयोग होगा ?

आखिरकार उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी महाराष्ट्र के मकोका , गुजरात के गुजकोका की तर्ज़ पर U.P.C.O.C.A यानि Uttar Pradesh control organised crime act 2017 पास कर दिया है। रिहाई मंच के पेज से मिली डिटेल के मुताबिक इस कानून में बहुत ही खतरनाक प्रावधान हैं. ये भी मकोका, गुजकोका, टाडा, पोटा की तरह जन विरोधी, धार्मिक अल्पसंख्यक विरोधी, गरीब विरोधी कानून है. इसका सीधा शिकार राजनैतिक विरोधी और मुसलमान ही बनाये जायेंगे.
इस कानून में जो प्रावधान है,उसके मुताबिक न्यूनतम 3 साल और अधिकतम 7 साल या उससे अधिक आजीवन कारावास की सज़ा होगी. सजाये मौत भी दी जा सकती है, साथ ही 5 से 25 लाख का जुर्माना भी लगाया जा सकता है. प्रॉपर्टी भी ज़ब्त की जा सकती है. सबसे खतरनाक बात ये है की पुलिस को स्पेशल पावर दिया गया है और मुल्ज़िम को 30 दिन तक हिरासत में रखने का अधिकार होगा.
मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान के बजाय थर्ड डिग्री टॉर्चर के ज़रिये दिलवाए गए जबरन Confession को आधार बनाया जायेगा और शिनाख्ती परेड की भी ज़रूरत नहीं होगी. उसके खिलाफ कोई भी डॉक्टर्ड वीडियो या फोटो को भी सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा. पुलिस 90 से 180 दिन के अंदर Confessional statment की बुनियाद पर Chargsheet दाखिल कर देगी और फिर आरोपी की 6 माह तक ज़मानत भी नहीं होगी.
इस तरह के जन विरोधी , मुस्लिम विरोधी कानून बनाने की शुरुआत मुसलमानो की हमदर्द समझी जाने वाली कांग्रेस ने की थी जब उसने आतंकवाद ,उग्रवाद से निपटने के नाम पर टाडा बनाया और जब ज़बरदस्त विरोध हुआ तो उसे समाप्त कर पोटा बनाया. बाद में तो ये सिलसिला चल पड़ा और राज्य सरकारों ने भी इस तरह का Draconian Law पास करने शुरू कर दिए जिसके नतीजे में मकोका , गुजकोका देखने को मिला.
इस कानून का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल मुसलमानो का दमन करने में किया गया और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढाए जाने और उसके बाद महाराष्ट्र में हुए भयानक फसाद और सिलसिलेवार बम विस्फोट के बाद बड़ी तादाद में मुस्लिम नौजवानो, बूढों और औरतों को फसाया गया, और जेल भेजा गया. गुजरात दंगों के बाद गुजरात में भी बड़ी संख्या में गुजकोका के तहत मुसलमान जेल भेजे गए. अब U.P में देखना होगा की हमारे साथ क्या होता है.
मुसलमान ही दंगा, फसाद और अत्याचार का शिकार होते हैं और फिर इन कानूनों की मदद से उन्हें ही कुचला जाता है और प्रताड़ित किया जाता है. फिलहाल तो रिहाई मंच ही इस सिलसिले में आवाज़ उठा रहा है और बाकि मुस्लिम हितैषी होने का दम भरने वाली सेक्युलर पार्टियॉ और खुद A.I.M.I.M और Ulema Council , Peace Party खामोश हैं और कौम की तबाही और बर्बादी का इंतज़ार कर रही हैं. ताकि बाद में इस पर सियासत की जा सके और सियासत की रोटियाँ सेंकी जा सकें.
इस कानून के खिलाफ मानवाधिकार संगठनों को भी आगे आना चाहिए और इसका विरोध करना चाहिए  मुसलमानो के अलावा दलित , पिछड़ा वर्ग और आदिवासी समाज भी निशाना बनाया जायेगा और सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को दबा दिया जायेगा।

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