आरक्षण एम्पलॉयमेंट एक्सचेंज है? नहीं। स्वर्गीय वी पी सिंह कहते थे आरक्षण से नौकरियां नहीं सामाजिक पिछड़ों में विश्वास पैदा हुआ। उन्हें विश्वास हुआ कि इस ज़मीन पर उनका अस्तित्व है और आसमान में उनका हिस्सा। वो जो कल चंबल के बीहड़ों और सुकमा के जंगलों में शरण लेने को मजबूर थे वो मुख्यधारा की तरफ पलटे। जिनके हाथों में बंदूक़ थी और जो राहज़नी, लूटपाट और झपटमारी में लगे थे उनमें विश्वास आया कि वो मुख्यधारा में लौट सकते हैं। पश्चिम यूपी इसका शानदार उदाहरण है।

ग़ुंडागर्दी और लूटपाट के लिए बदनाम हो चुकी गुर्जर, जाट, लोध और सैनी जैसी पिछड़ी जातियों के लड़के खेत और सड़कों पर पुलिस, अर्धसैनिक बलों और सेना में भर्ती की तैयारियां करते देखिए। इनके बच्चों को ज़मीन बेचकर शिक्षण संस्थानों में जाते देखिए। हो सकता है आरक्षण के कारण इनमें कुछ को नौकरी मिली हो लेकिन सरकारी सेवाओं इनकी हिस्सेदारी अभी भी औसतन कम है। चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों से आगे इनके लिए अवसर हैं ही नहीं। हर घर में दो तीन बेरोज़गार ज़रूर हैं। इसकी एक वजह है कि सरकारी नौकरियां लगातार घट रही हैं और निजी क्षेत्र में सवर्णों का तक़रीबन एकाधिकार है। इन एकाधिकारवादियों ने मान लिया है कि उनके अलावा दुनिया में सब अक्षम हैं।

इधर सरकार 60% से ज़्यादा स्थायी पद हमेशा के लिए ख़त्म कर चुकी है। देश की आबादी के लिहाज़ से हर साल तीन से साढ़े तीन करोड़ नौकरियों की दरकार है। लेकिन नौकरियां दो लाख की सालाना संख्या पर अटक गयी हैं। जो नौकरियां हैं वो जुगाड़ुओं की हैं या रिश्तेदारों के लिए। ज़ाहिर है आरक्षण समस्या का हल नहीं है। हल नई नौकरियों का सॄजन है जिसमें सरकारें नाकाम रहीं हैं।

इस सरकार की ग़लती है कि इसने छोटे और असंगठित कारोबार पर नोटबंदी और जीएसटी के ज़रिए चोट की है। सरकार ढिंढोरा पीट रही है की इन क़दमों से टैक्स नेट बढ़ा है। कितने राजस्व का अर्जन हुआ ये नहीं बता रहे हैं। क्या ये राजस्व इतना है कि सबको रोज़गार और बराबरी दिला पाए? क्या सरकार ने इतना धन कमा लिया है कि देश का समुचित विकास हो? नहीं।

सरकार को अपने ख़र्च पूरे करने के लिए लोन लेना पड़ रहा है। असंगठित क्षेत्र के डूबने से देश की कुल राजस्व प्राप्ति घटी हैं। बैंक डूब गए हैं और रोज़गार के अवसर पहले से एक तिहाई रह गए हैं।

नेहरू कह गए हैं सरकार बनिए की दुकान नहीं है जो मुनाफों पर ध्यान दे। सरकार का काम जन जन को उनके दरवाज़े पर सुविधाएं मुहैया कराना है। लेकिन अब सरकार के मुखिया दावा करते हैं कि उनके ख़ून में व्यापार है। मतलब मुनाफा चाहिए चाहे सरकारी सेवाएं मिट जाएं। जल, जंगल, ज़मीन बेचकर भी पैसे चाहिए। लेकिन जब ख़र्च करने की बारी आए पहले मना कीजिए। फिर चिल्लर फेंक कर ख़ैरात बताइए, अहसान जताइए और ज़लील कीजिए। मानो सरकार अपने बाप के घर से कुछ लेकर आए हैं। लोकतंत्र न हुआ राजशाही हो गयी। भगवान सरकार की आत्मा को शांति दें।

नोट: यह लेख लेखक कि फ़ेसबुक वाल से लिया गया है