अमित शाह भले ही एक राजनीतिक शख्सियत हों पर उनके भाषण, उनके बोलने का ढंग, गुजरात मे गृह मंत्री रहते हुये उनके क्रिया कलाप, उनका आचरण और उनसे जुड़े आपराधिक मामले और विवाद  उनकी अलग ही तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। गुजरात मे उनके ऊपर एक महिला की जासूसी कराने, कुछ चुनिंदा पुलिस अफसरों का एक गिरोह बना कर फ़र्ज़ी मुठभेड़ें कराने के आरोप लग चुके हैं। वे एक मामले में तड़ीपार भी रह चुके हैं। फिलहाल पार्टी विद द डिफरेंस का दावा करने वाली आजकल सत्तारूढ़ दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनकी हैसियत सरकार में कभी कभी पीएम से भी बड़ी लोग बताते हैं। प्रतिबद्ध नौकरशाही का एक अच्छा खासा गिरोह उनके पास है। कुछ लोग उन्हें चाणक्य के नाम से भी पुकारते हैं पर यह भूल जाते हैं चाणक्य जोड़ तोड़ , राजनीतिक षडयंत्र, दुरभिसंधि आदि का ही नाम नहीं बल्कि देश को एक सुव्यवस्थित और सुप्रशासित लोकरंजक तँत्र के प्रवर्तक का नाम भी है। जब ठकुरसुहाती के दौरान गर्दम गर्दा में प्रधानमंत्री को उनके दलीय प्रवक्ता उन्हें विष्णु का एकादशावतार घोषित कर देते हैं तो इन्हें चाणक्य कहते सुन कर अचंभा नहीं होता है। राजनीति का एक अंग ही आत्म प्रशंसा, आत्म मुग्धता और रासो परम्परा से युक्त अतिश्योक्ति से पगी हुयी प्रवंचक ठकुरसुहाती है।

कल उन्होंने कन्नूर केरल में एक भाषण दिया। उनके भाषण में भगवान अयप्पा का उल्लेख आया जो सबरीमाला मंदिर के मुख्य देवता है। कहा जाता है कि अयप्पा एक ब्रह्मचारी देव है और एक धार्मिक मान्यता के अनुसार उनके मंदिर में 10 से 50 वर्ष तक कि महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित है। इन वय में महिलाएं रजस्वला होती हैं और उनके प्रवेश से अयप्पा के ब्रह्मचर्य जो ऊर्ध्वरेता है के खंडित हो जाने का भय होता है।

लेकिन कुछ महिला समूहों ने जो महिलाओं के अधिकारों के प्रति सजग रहते हैं ने सुप्रीम कोर्ट में मंदिर प्रबंधन के इस लिंगभेदी प्राविधान के विरुद्ध याचिका दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को स्वीकार करते हुए मंदिर प्रबंधन को इस वय की महिलाओं को प्रवेश करने से न रोकने के लिये कहा। राज्य सरकार का यह पावन कर्तव्य है कि वह सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का पालन कराये। लेकिन इस आदेश ने एक राजनैतिक रूप ले लिया तथा आरएसएस और बीजेपी सहित कुछ अन्य संगठनों ने महिलाओं के मंदिर प्रवेश का विरोध शुरू कर दिया। सबरीमाला में पर्याप्त पुलिस व्यवस्था के बाद भी अभी स्थिति सामान्य नहीं है गतिरोध जारी है।

इसी क्रम में अमित शाह ने उसी मंच से यह कहा कि अगर बात बिगड़ी तो केरल की सरकार बर्खास्त भी की जा सकती है और वे श्रद्धालुओं की भावनाओं के साथ हैं। यह भी हैरानी की बात है कि जो आरएसएस आज अयप्पा के दर्शन हेतु महिलाओं के प्रवेश का विरोध कर रही है उसी ने 2006 में महिलाओं के प्रवेश के लिये आंदोलन भी किया था और सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी उनके द्वारा दायर की गयी थी। भावनाओं के प्रति आरएसएस का सुविधाजनक रुख सदैव रहा है। अमित शाह की बात का जवाब देते हुए केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन ने कहा कि वहां की सरकार बीजेपी के रहमो करम पर नहीं बल्कि जनता द्वारा चुनी गयी है। ऐसी सरकार का दायित्व है कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कराए। देवस्थानों में महिलाओं के प्रवेश के विवाद की यह पहली घटना नहीं है बल्कि इसके पहले शनि शिंगणापुर और हाजी अली की दरगाह मुंबई में भी ऐसे आंदोलन, याचिकाये और आदेश हो चुके हैं और काफी विरोध के बाद इन स्थानों पर भी महिलाओं के प्रवेश से रोक हटी है। सुप्रीम कोर्ट ने इन आदेशों को लिंगभेद और मौलिक अधिकार जो समानता के अधिकार की बात करते हैं के अंतर्गत दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अमित शाह ने सुप्रीम कोर्ट को एक नसीहत भी दी। यह नसीहत है, या धमकी है, या निर्देश या आदेश यह तो वही जाने, कि अदालत वही फैसले या आदेश दे जिसे लागू किया जा सके। बजाय यह कहने के कि, सरकार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू कराए यह कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट वह आदेश दे जो लागू किया जा सके। मतलब सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू नहीं कराया जा सकता है। ऐसा लगता है अमित शाह में कानून के प्रति अवज्ञा की एक सतत ग्रन्थि है । अदालत चाहे किसी भी स्तर की हो देश के कानून के अनुसार ही मुकदमों का फैसला देती है। वह कोई कानून नहीं बनाती है बल्कि कानून की व्याख्या संविधान के अनुसार कर के मुकदमों का फैसला देती है। अदालत,  व्यक्ति या सरकार या विचारधारा या सरकार की उक्त कानून के लागू कर सकने की क्षमता या अक्षमता के अनुसार कभी फैसले नहीं देती है।

अगर सरकार को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में निर्णय संविधान के अनुरूप नहीं दिया है तो वह पुनरीक्षण याचिका दायर कर सकती है। वैसे इस मामले में पुनरीक्षण याचिका दायर भी है। उसकी सुनवायी अभी होनी है। अगर अमित शाह को लगता है कि सबरीमाला में महिलाओं के साथ  हो रहा भेदभाव जायज़ है और यह भेदभाव आगे भी चलता रहना चाहिये तो वह संविधान में दिये गए मौलिक अधिकारों को संशोधित कराएं और लिंगभेद से जुड़े समानता के अधिकार को पुनः लिखवाएं। सार्वजनिक रूप से सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष के रूप में उनका यह दृष्टिकोण न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि विधि विरुद्ध भी है। यह अदालत की अवमानना है या नहीं यह अदालत जाने या विधि विशेषज्ञ।

© विजय शंकर सिंह