10 अप्रैल को दुनियाभर में महान जर्मन चिकित्सक व होम्योपैथी के संस्थापक डॉ सैमुअल हनीमैन  के जन्मदिवस पर “विश्व होम्योपैथी दिवस” मनाया जाता है. डॉ॰ क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैम्यूल हनीमैन  का जन्‍म 1755 में जर्मनी में हुआ था. डॉ॰ हैनिमैन, एलोपैथी के चिकित्‍सक होनें के साथ साथ कई यूरोपियन भाषाओं के ज्ञाता थे.जीवकोपार्जन के लिये चिकित्‍सा और रसायन विज्ञान का कार्य करनें के साथ साथ वे अंग्रेजी भाषा के ग्रंथों का अनुवाद जर्मन और अन्‍य भाषाओं में करते थे.आज जहां महंगा होता उपचार आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है, ऐसे में डॉ हनीमैन को श्रेय देना होगा कि उन्होंने वर्षों पहले आमजन के लिए एक बेहतरीन चिकित्सा विकल्प की खोज की.
कैसे हुई होम्योपैथी की खोज
एक बार डॉ हनीमैन जब अंग्रेज डाक्‍टर कलेन की लिखी “कलेन्‍स मेटेरिया मेडिका” में वर्णित कुनैन नाम की जडी के बारे में अंग्रेजी  भाषा का अनुवाद जर्मन भाषा में कर रहे थे तब डॉ॰ हैनिमेन का ध्‍यान डॉ॰ कलेन के उस वर्णन की ओर गया, जहां कुनैन के बारे में कहा गया कि ‘’ यद्यपि कुनैन मलेरिया रोग को आरोग्‍य करती है, लेकिन यह स्‍वस्‍थ शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा करती है.
कलेन की कही गयी यह बात डॉ हनीमैन के दिमाग में बैठ गयी. उन्‍होंनें तर्कपूर्वक विचार करके कुनैन की थोड़ी थोड़ी मात्रा रोज खानीं शुरू कर दी. लगभग दो हफ्ते बाद इनके शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा हुये. जड़ी खाना बन्‍द कर देनें के बाद मलेरिया रोग अपनें आप आरोग्‍य हो गया. इस प्रयोग को डॉ हनीमैन ने कई बार दोहराया और हर बार उनके शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा हुये. कुनैन के इस प्रकार से किये गये प्रयोग का जिक्र डॉ हनीमैन नें अपनें एक चिकित्‍सक मित्र से की. इस मित्र चिकित्‍सक नें भी डॉ हनीमैन के बताये अनुसार जड़ी का सेवन किया और उसे भी मलेरिया बुखार जैसे लक्षण पैदा हो गये.
कुछ समय बाद उन्‍होंनें शरीर और मन में औषधियों द्वारा उत्‍पन्‍न किये गये लक्षणों, अनुभवो और प्रभावों को लिपिबद्ध करना शुरू किया. डॉ हनीमैन की अति सूच्‍छ्म द्रष्टि और ज्ञानेन्द्रियों नें यह निष्‍कर्ष निकाला कि और अधिक औषधियो को इसी तरह परीक्षण करके परखा जाय.
इस प्रकार से किये गये परीक्षणों और अपने अनुभवों को डॉ हनीमैन नें तत्‍कालीन मेडिकल पत्रिकाओं में ‘’ मेडिसिन आंफ एक्‍सपीरियन्‍सेस ’’ शीर्षक से लेख लिखकर प्रकाशित कराया.इसे होम्‍योपैथी के अवतरण का प्रारम्भिक स्‍वरूप कहा जा सकता है.
औषधियों के विषय में ज्ञान और इसके अनुप्रयोग पर आधारित है होम्योपैथी
यह चिकित्सा पद्धति औषधियों के विषय में ज्ञान और इसके अनुप्रयोग पर आधारित है, जो इस सिद्धांत पर कार्य करती है कि रोग का प्रारंभ स्थूल शरीर में नहीं, बल्कि उसके सूक्ष्म शरीर में आता है. यदि सूक्ष्म शरीर (जीवन शक्ति) स्वथ्य है, रोग प्रतिरोधक शक्ति मजबूत है, तो रोग का आक्रमण सूक्ष्म शरीर पर नहीं हो सकता और स्थूल शरीर स्वस्थ बना रहता है. यदि उपचार से इस सूक्ष्म शरीर को रोगमुक्त कर दिया जाता है, तो स्थूल शरीर अपने आप ही रोगमुक्त हो जाता है.
जिस प्रकार आयुर्वेद में रोग का मूल कारण वात, पित्त और कफ को माना गया है,उसी प्रकार होमियोपैथी में सोरा, सिफलिश और सायकोसिस रोग का मूल कारण  माना जाता है. 90 प्रतिशत रोगों का मूल कारण सोरा दोष का बढ़ना है. इसी दोष की सक्रियता के कारण शरीर में खाज, खुजली, सोरायसिस, कुष्ठरोग तथा पेट के अन्य रोग होते हैं. सायकोसिस विष के कारण शरीर में अतिरिक्त वृद्धि जैसे- रसौली, गांठ, मस्से, कैंसर आदि हो जाता है और सिफलिश के कारण यौन-रोग आदि होते हैं.
यह पद्धति ‘समः समम् समयते’ यानी लक्षणों की समानता के आधार पर कार्य करती है. मतलब एक ही रोग होने पर भी दो अलग व्यक्तियों के लक्षणों के आधार पर दोनों के लिए अलग-अलग  औषधियां भी दी जाती हैं. स्पष्ट है कि इसमें रोग से उत्पन्न शारीरिक और मानसिक लक्षणों के आधार पर ही दवा दी जाती है, यानी बीमारी के आधार पर नहीं, बल्कि रोगी के तन-मन के हालात को देखते हुए चिकित्सा की जाती है.
एलोपैथी का विकल्प है होम्योपैथी
आज स्वास्थ्य के प्रति लोगों की अवधारणा और समझ तेजी से बदल रही है. आधुनिक चिकित्सा के युग में दुनियाभर में एलोपैथी चिकित्सा पद्धति के बाद यह सबसे अधिक पसंद की जानेवाली और प्रयोग में लायी जानेवाली चिकित्सा पद्धति है.आज होम्योपैथी न केवल बड़े शहरों में बल्कि छोटे-छोटे शहरों एवं कस्बों में भी अपनायी जा रही है. एक सर्वे के मुताबिक़ 75 प्रतिशत रोगियों ने स्वीकार किया है कि होम्योपैथी रोग को जड़ से समाप्त करने की क्षमता रखता है.वहीं शरीर पर किसी प्रकार का दुष्प्रभाव न होने के गुण के कारण लोकप्रिय भी होती जा रही है. कुछ आपात स्थितियों को छोड़ कर एलोपैथी के बजाए लगभग 80 प्रतिशत रोगों के उपचार के लिए होम्योपैथी ही कारगर उपचार है.
होम्योपैथी पुराने एवं जीर्ण रोगों के साथ-साथ, नए रोगों, श्वसन तंत्र, हड्डी एवं जोड़ों, पाचन तंत्र, शल्य क्रिया योग्य, बालों के रोगों व थाइराइड से संबंधित रोगों का बेहतर इलाज होता है. वर्तमान में होम्योपैथी दुनिया के 110 से अधिक देशों में विभिन्न रूपों में अपनाई जा रही है. होम्योपैथी मध्य एवं दक्षिणी अमेरिका (ब्राजील, चीलि, कोलम्बिया, कोस्टारिका, क्यूबा, मैक्सिको) एवं एशिया (भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांगलादेश) एवं यूरोप (जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम, बुल्गारिया, हंगरी, रोमानिया, रूस, यूके) में सरकार से मान्यता प्राप्त है.

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Durgesh Dehriya

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