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आज हमें जो पसंद आ रहा है, कल वही हमारे बच्चों के लिए वीभत्स होगा

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“देश” शो केस में रक्खा कोई मुर्दा एंटीक पीस नहीं है। अपने नागरिकों की धड़कनों में दिल का जगह धड़कता है देश। एक आज़ाद, मुकम्मल आत्मनिर्भर देश वही कहला सकता है जिसका हर नागरिक (बच्चा,बूढ़ा, जवान, मर्द, औरत,ट्रांसजेंडर, असक्षम, बीमार, स्वस्थ्य, ग़रीब, अमीर) बराबरी के साथ स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, घर, रोज़गार, जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ ही अमन, ख़ुद्दारी के साथ हर जगह सर उठा के जीने के अधिकारों से भी संपन्न हो। अपने नागरिकों के सम्पूर्ण हक़ों की देखरेख, उसके संरक्षण की ज़िम्मेदारी उसकी सरकारों के सुपुर्द हो – जिनका पालन वेईमानदारी से करती रहें।
डॉ आंबेडकर के नेतृत्व में बनाये गए हमारे संविधान में बतौर एक नागरिक हम सभी को इज़्ज़त और आत्मसम्मान के साथ जीने का हक़ दिया गया है। आज हमारी सरकारें, हमसे, हमारे संवैधानिक हक़ छीनने की पुरज़ोर वकालत और कोशिशों  में संलग्न दिखाई पड़ रही हैं। एक बहुत छोटा तबक़ा हर तरह की आज़ादी का उपभोक्ता बन बैठा है और 85 फ़ीसद से भी ज़्यादा की आबादी अपने इंसानी हक़ों से महरूम की जा रही है। इस महरुम आबादी में औरतों का बड़ा हिस्सा शामिल है- जिसकी तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।
किसी घटना दुर्घटना में जब एक “आदमी” की मौत होती है या वो ज़ख़्मी होता है तो उसका सीधा क़हर उसपे डिपेन्डेन्ट औरतों/बच्चों पर टूटता है। फ़िर चाहे वो किसान, मज़दूर, इंजीनियर डॉक्टर, पुलिस, कलेक्टर, वकील, जज हो या कि साइकिलरिक्शा/ठेला खींचने वाला, रेहड़ी/फेरी लगाने वाला, परचून की दुकान/टैक्सी चलाने वाला, क़ुली, हम्माल, चमड़ाउतारने/झाड़ू लगाने वाला हो या ट्रक, ऑटो, टैक्सी, बस, ट्रेन का ड्राइवर हो या फिर जंगलों से लकड़ी बीनने वाला, पेड़ों से सल्फ़ी उतारने वाला या घड़े, मटके, सुराही बनाने वाला हो या टेबिल, कुर्सी, चारपाई, जूते, चप्पल बनाने वाला हो- कोई भी हो-किसी बाहरी को इस से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.मगर एक हँसता, खेलता परिवार किस तरह ज़िंदा लाश बन जाता है ये हम में से बहुत सारे (शहरी/शिक्षित )लोग नहीं जानते। हम नहीं जानते कि सौभाग्य या दुर्भाग्य से बच गईं औरतें कैसे परिवार की गाड़ी ठेलती हैं? उनके साथ कौन, कैसा सुलूक करताहै? हम  जानना भी नहीं चाहते।
ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है जब देश के “प्रधानसेवक” ने  उप्र की एक चुनावी सभा में औरतों की सुरक्षा पर बोलते हुए ये कह डाला कि “यहाँ औरते” सुरक्षित नहीं हैं, अगर मजबूरी के तहत किसी औरत को देर शाम तक घर से बाहर रहना पड़े तो वो इस दहशत में रहती है कि उसकी इज़्ज़त और जान के बचे रहने की कोई गारंटी नहीं है। ज़ाहिर है ये सुनने के बाद दुनिया के दुसरे मुल्कों की सरकारें अपने यहाँ के औरतों की हिफाज़त के लिए फ़िक्रमंद हो सकती हैं और हुआ भी यही। UNO ने बाक़ायदा लेटर लिखकर मित्र देशों के राष्ट्राध्यक्षों को अपनी नागरिक औरतों को भारत भेजने में सतर्कता बरतने की सलाह दे डाली यही नहीं अपने लेटर में ये भी लिख भेजा कि जो औरतें पर्यटक के तौर पे भारत जाना चाहती हैं तो उनसे एक डिक्लरेशन फॉर्म भरवाया जाए जिसमे उनके साथ भारत में रहते हुए कुछ भी अप्रिय घटने की ज़िम्मेदारी गृहदेश के सरकार की नहीं होगी। UNO ने भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते रखने वालों को भी समझाईश दी है कि वे भी ख़ूब सोच समझकर भारत के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते आगे को जारी रखें।
वर्ण व्यवस्था में बंटे देश की कहानी बड़ी विचित्र है। मनुस्मृति के पालन हार भरतवासियों की नज़र में औरत की दो कौड़ी भर भी इज़्ज़त नहीं है। ख़ूनी रिश्तों के अलावा ज़ुबानी रिश्तों का रिवाज अब चलती बेला में है। हालात ये हैं कि गृह मंत्रालय के मुताबिक़ दलितों के साथ किये जाने वाले अपराधों की संख्या में 2014 के मुक़ाबले 2015 में 7000 की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। यही नहीं वाइब्रेंट कहे जाने वाले गुजरात में 2016 स्थानीय दलितों के लिए बेहद खूंखार अपराधों की नज़र रहा। इस बरस में जहाँ 80 दलित औरतों के साथ रेप किये गए वही 32 औरतों को रेप के साथ हत्या भी की गई। इन्हें मिलाकर दलितों के साथ (सवर्णों ने) 900 से ज़्यादा अपराध किये। इसी बरस (28 फ़रवरी2017 ) यहाँ अमरेली ज़िला के वरसड़ा गांव में एक युवा दलित सरपंच जयसुख मधाड़ को बर्बरता पुर्वक तलवारों से काटकर मार डाला गया।
देश की राजधानी दिल्ली पे नज़र दौड़ाएं तो CAW 2016 (क्राइम अगेंस्ट वुमन ) की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2,155 “रेकॉर्डेड” रेप (प्रति दिन 6 रेप) किये गए हैं (TOI 20. 2.17) 3,423 किडनैपिंग के मामले दर्ज किये गए हैं। पति और सुसराल वालों द्वारा 3,877 मामले दर्ज किये गए। 162 दहेज़ हत्या और 18 दहेज़ प्रताड़ना के मामले दर्ज किये गए हैं। ये रिपोर्ट बताती है कि 96.4% बलात्कारी पीड़िता के परिचितों में से थे।
16 दिसं 2012 को हुए क्रूर निर्भया बलात्कार कांड के बाद उपजे देश व्यापी जन आक्रोश के चलते 3 अप्रैल 2013 (संशोधित) पारित किया गया और जल्द ही क़ानून के रूप में लागू भी हो गया। इस क़ानून में जो ख़ास था वो ये कि बलात्कार पीड़ित की मौत हो जाती है तो अपराधी को 20 बरस की सज़ा का प्रावधान रखा और तेज़ाबी हमले करने वालों के लिए 10 बरस की सज़ा क़ायम की गयी है। इसके साथ ही औरतों के ख़िलाफ़ अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज न करने वाले पुलिस कर्मियों के लिए भी सज़ा का प्रावधान रखा गया है। इस क़ानून ने औरतों का पीछा करने व उसे घूर घूर कर देखने वालों पे भी सजा मुक़र्रर की है। मगर अफ़सोस औरतों के साथ किये जा रहे अपराध थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं।
राष्ट्रिय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक़ “औरतों को इतनी क़ानूनी सुरक्षा उपलब्ध करवाने के बावजूद 2014 में पूरे देश में 100 औरतों के साथ हरदिन बलात्कार और 364 औरतें यौन शोषण की शिकार बनायीं गयीं।” रिपोर्ट के मुताबिक़ केंद्र शाषित राज्यों को मिला लिया जाए तो 36,735 मामले दर्ज किये गए। लेकिन इस हक़ीक़त से कौन मुंह मोड़ सकता है कि बरस दर बरस औरतों/बच्चियों के साथ बर्बर रेप और यौन अत्याचार से सम्बंधित मामलों में लगातार तेज़ी आती जा रही है। इसका -सीधा मतलब है- अपराधियों को महिला अत्याचार विरोधी क़ानूनों का ख़ौफ़ नहीं है या फिर इन क़ानूनों का ईमानदारी से अमल नहीं किया जा रहा है।
एक दशक पहले के आंकड़ों की सुनें तो 2004 में बलात्कार के कुल 18,233 मामले दर्ज हुए थे। जो 2009 में बढ़कर 21,397 हो गए। 2012 में 24,993 मामले दर्ज किये गए जो 2014( मात्र दो बरस में ) में बढ़कर 36,735 हो गए। 2004 से 2014 तक बलात्कार के आंकड़ों का 2 गुना बढ़ जाना दिखाता है कि बलात्कारियों/अपराधियों को सामाजिक/राजनैतिक संरक्षण हासिल है।
NCRB (राष्ट्रिय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ) की रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले बरस( 2015-2016) में मप्र  औरतों के लिए सबसे ज़्यादा ग़ैर-महफ़ूज़  (5,076 की संख्या लेकर) रहा। महाराष्ट्र में 3,438, राजस्थान 3,759, दिल्ली 2,096, उप्र 3,467 बलात्कार के मामले दर्ज किये गए। बिहार जिसे मुख्याधारा का मिडिया “जंगलराज” के नाम से प्रचारित करता रहा है वहां 2014 में बलात्कार के 1,127 मामले दर्ज किए गए। और सम्पूर्ण साक्षर केरल में 1,347 औरतों के साथ रेप किये गए। अगर केंद्र शाषित राज्यों की तरफ़ देखें तो रिपोर्ट के मुताबिक़ लक्षद्वीप, नागालैंड और दादर नगरहवेली अपराधों के नज़रिये से औरतों के लिए “महफ़ूज़ पनाहगाह” की तरह दिखलाई पड़ते हैं।
ग़ौरतलब बात ये है कि औरतें सिर्फ़ सड़कों या सार्वजनिक जगहों पे ही ग़ैर-महफ़ूज़ होती हों, ऐसा हरगिज़ नहीं है, बल्कि सबसे महफ़ूज़ कहलाने वाली जगह उनका “घर” और “परिवार” के अंदर  भी आज की औरतें महफ़ूज़ नहीं हैं। क्राइम अगेंस्ट वुमन -दिल्ली 2016 की रिपोर्ट देखें तो हम पाएंगे कि 96.4% बलात्कारी उनकी जान-पहचान या रिश्तेदारों में से ही रहे हैं।
क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ ही है कि वंचित तबक़ों की औरतों के साथ अपराधों के जघन्य और बर्बर तऱीके एक खास विचारधारा वाली सरकार या उसकी समर्थित सरकारों वाले राज्य में ज़्यादा  दिखाई पड़ते हैं..? औरतों के साथ की जार ही बर्बर हिंसा, अत्याचारों, अपराधों के इतने वीभत्स आंकड़ें देखने के बाद ज़ेहन में एक ही सवाल कौंधता है कि क्या औरतों के साथ हिंसा/अपराध करने वाले  किसी ग़ैर इंसानी “उपग्रह” के बाशिंदे होते हैं..? अगर नहीं तो हमारी पुलिस, खोजी एजेंसियां किस काम में बिज़ी हैं ? जो अपराधियों को ढूंढ़ के सजा नहीं दिलवा पा रही हैं। इसका जवाब पाने के लिए हमें रिसर्च करने की ज़रूरत नहीं है बल्कि अपने आसपास नज़र दौड़ाने भर की ज़रूरत है। हमारे चारों तरफ़ कुछ ख़ास वर्गों/तबक़ों के लिए नफ़रत, ग़ैरबराबरी, उपेक्षा, उनकी तकलीफ़ों से ख़ुशी/सुकून का एहसास होने की फ़ितरत दिखलाई पड़ती है, जो हमें दिन प्रतिदिन- ख़ुदग़र्ज़, संवेदनहीन और बर्बर बनाती जा रही है। हम अनजाने ही अपने आसपास एक ऐसा समाज गढ़ते चल रहे हैं जो आज तो नहीं, मगर हां, कल ज़रूर हमारे बच्चों/आने वाली पीढ़ियों को अपने ज़हरीले दांत और नाख़ूनों से ज़ख़्मी करेगा, लेकिन तब वेअ-सहाय होंगे। हमने, (आज) उन्हें ऐसी विषम परिस्थितियों से बाहर आने का रास्ता ही नहीं दिखलाया है। हम तो बस उन्हें अच्छे नम्बर लाने वाली मशीन बनाकर, उनके नाज़ुक कन्धों पर, अपने ग़ैर-हासिल सपनों कागठ्ठर लादे उन्हें क़ूलि/हम्माल बना रहे हैं, जिसके बोझ तले वो अपने आसपास घट रही घटनाओं/दुर्घटनाओं से बे-ख़बर बने रहे और हम बड़े फ़ख़्र से अपने पड़ौसियों, रिश्तेदारों को ख़ुशहोकर दिखाते/बताते रहे कि देखो हमारी औलादें तुम्हारी औलादों से ज़्यादा क़ाबिल और फ़र्माबरदार (अनुशाषित) हैं।
हम वे सारे परिजन ..! क्या आज ये समझने को तैयार हैं- कि अपने मासूम बच्चों/अपनी अगली पीढ़ी को निहत्था, आदमज़ाद “आदमख़ोरों” के बाड़ों में, ज़बरदस्ती धकेले जा रहे हैं कि, जिसमें वे “हमारे बाद” क़ैद कर दिए जाएंगे। कि, फिर ग़ुलामों की तरह सलामी बजाने के अलावा उनके हाथ कुछ भी नहीं होगा..? कि, अगर हममें से किसी की औलाद अपने हालात से बग़ावत कर दे तो (सबक़ सिखाने के लिए ) पहले उसकी उंगलियां, फ़िर हाथ, फ़िर टांगें काट दी जाएं और आदेश न मानने पर उसका सर-धड़ से अलग कर दिया जाए। हमारी बेटियों से सामूहिक बलात्कार कर के उनके जननांगों में लाठी, गन्ना, रॉड, बोतलें, ठूंस दी जाएं, उस जगह को चाकुओं से गोद दिया जाये या 8 -10 गोलियां उतार दी जाएँ, उसके स्तन दांतों से चबा लिए जाएँ या काट कर अलग फेंक दिए जाएं और उनके लिए बोलने/रोने वाला कोई न हो….? डर लगा..? क्यूं लगा डर..? यही तो है हमारी पसंद का समाज। यही तो बना रहे हैं हम…! याद रखिए जो आज हमें पसंद आ रहा है वही, कल हमारे बच्चों के लिए बहुत बुरा, बहुत भयानक, बहुत वीभत्स होगा…!
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पे हम तमाम “औरताना जमातें”अपने  मरते हुए देश को भरपूर ऑक्सिज़न पहुंचाना चाहती हैं। येजो हमारे ख़्वाबों का देश है। हमारे अरमानों, हमारी आरज़ूओं का देश है। गंगा-जमनी तहज़ीबों वाला ये देश, वलीगुजराती, गुरुनानक, रविदास, कबीर, ख़ुसरो, की मोहब्बतों वाला देश। सावित्रीबाई और फ़ातमा शेख़ की जीवट ज़िद वालाये देश, डॉ आंबेडकर और उस्मान शेख़ की जोड़ी वाला ये देश। मुर्दा शांति की तरफ तेज़ी से गिरते हमारे देश को अपने मज़बूत हाथों में थामने के लिए, फ़ातमा शेख और सावित्री बाई फुले की लड़ाका बेटियां अपनी मोहब्बतों, चाहतों की मशाल लिएनिकल पड़ी हैं। एक यलगार लेकर मनुवाद के गढ़ में हल्ला बोलने चल पड़ी हैं। हमारा ये देश अगर आपका भी है तो आइये 10 मार्च को नागपुर के इंदोरा मैदान में आंबेडकर वाले भारत में इंसानियत बचाने के यज्ञ में अपने समर्थन की आहूति डालिए।

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