October 20, 2021

विधानसभा चुनावों से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश (west UP) में बीजेपी (bjp) को जाट चुनौतियों का सामना कर पड़ रहा है। पिछले साल से दिल्ली (delhi) की सीमाओं पर चल रहा किसानों का विरोध अब यूपी की राजनीति (politics) में सरगर्मी पैदा कर रहा है। ये सारा माजरा नए कृषि कानूनों (farm’s law’s) का है। इसके कारण ही पश्चिमी यूपी (UP) में बीजेपी का एकमुश्त “जाट वोट बैंक” अब खिसकता नज़र आ रहा है। हालांकि, अपने भाषणों और नई योजनाओं से बीजेपी “जाट वोट बैंक” को संभालने का हर सम्भव प्रयास कर रही है।


बता दें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगभग 18 प्रतिशत जाट आबादी है, वहीं ये आबादी विधानसभा की 40 से 50 सीटो पर निर्णायक भूमिका निभाती है। वर्तमान विधानसभा में 14 जाट विधायक है, जो बीजेपी के खेमे के हैं। पश्चिमी यूपी में अगर जाट, बीजेपी दामन छोड़ते हैं तो बीजेपी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

गौरतलब है कि, 2013 की मुजफ्फरनगर हिंसा (muzaffarnagar voilance) के बाद वेस्ट यूपी में बीजेपी को जाट समुदाय का बड़ा समर्थन मिला था। ये समर्थन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों (loksabha election 2019) में दिखा था। वहीं 2017 के विधानसभा चुनावों में भी वोट बैंक बरकरार था। लेकिन अब, कृषि कानूनों के विरोध में जाट समुदाय में बीजेपी के लिए खासा अलगाव सामने आ रहा है।

कृषि कानूनों पर है नाराज़गी:

The hindu की रिपोर्ट के मुताबिक, वेस्ट यूपी के किसानों को एमएसपी (MSP) से कम दर पर गेंहू और बाजरा बाज़ार में बेचना पड़ रहा है। वहीं कोल्ड स्टोरेज में आलू का पहले से भंडारण होने के कारण बाजार की दर किसानों की इनपुट लागत से काफी कम हो गयी।

दी हिन्दू से बातचीत में जाट किसानों के एक वर्ग ने कहा कि वेस्ट यूपी के क्षेत्रों (मुजफ्फरनगर, इगलास, अलीगढ़ और मेरठ) में छोटे किसान है, ये विरोध स्थलों पर नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं है कि इनकी पीड़ा बाकी किसानों से कम है। अगर सरकार इन किसानों को गारंटी पर MSP देती है तो ‘किसान क्रडिट कार्ड’ और ‘किसान सम्मान निधि योजना जैसी बैसाखियों की ज़रूरत इन्हें नहीं पड़ेगी।

इगलास बार एसोसिएशन का कहना है, कि चुनावों से पहले केंद्रीय नौकरियों में जाट आरक्षण की बात कही गयी थी। इसकी मांग भी लंबे समय से की जा रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर इसकी मांग को कमज़ोर कर दिया है।


कुछ लोग डबल इंजन सरकार से खुश हैं:

मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से, कुछ लोग ऐसे हैं जो डबल इंजन सरकार से खुश हैं। इनका कहना है कि सरकार ने मूलभूत सुविधाएं बिजली, सड़क और सुरक्षा मुहैया कराई हैं। वहीं कुछ लोगो ने सिर्फ हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी को वोट दिया था, अब ” राम मंदिर” बनने और 370 निरस्त होने पर संतुष्ट हैं और बीजेपी को वादे पर खरा भी पाते हैं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक युवा का कहना है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर बन रही यूनिवर्सिटी अन्य समुदायों और मुस्लिम समुदाय की बीच समानता की भावना को बढ़ावा देगी। हाल ही में जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर सपा नेता आज़म खान को जो झटका मिला है उसे बीजेपी की मुख्य सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

उन नेताओं को कृषि कानूनों में कोई समस्या नहीं दिखती, जो बीजेपी कि टिकट के दावेदार हैं। जाट समुदाय के एक वर्ग का कहना है की यूपी में मोदी का करिश्मा अभी भी बरकार है।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर यूनिवर्सिटी का निर्माण:

अपने जाट वोट बैंक को साधने को लिए, बीजेपी राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम विश्वविद्यालय निर्माण करा रही है। इसकी घोषणा मंगलवार (14 अगस्त) को पीएम मोदी ने अलीगढ़ की रैली में भी की थी। इस रैली में चुनावी एजेंडा साधते हुए जाट, ओबीसी (OBC) और मुस्लिम समुदाय को भाषण के केंद्र में रखा गया था। दरअसल, जाट समयदाय के लिए राजा महेंद्र प्रताप सिंह एक प्रेरणा स्रोत हैं। साथ जाट समुदाय से सम्बंध भी रखते हैं। यूनिवर्सिटी के निर्माण के लिए 101 करोड़ की राशि शिक्षा विभाग ने जारी कर दी है। वहीं यूनिवर्सिटी का निर्माण 92 एकड़ ज़मीन पर किये जाने की बात भी सामने आ रही है।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह 1915 में काबुल में भारत की पहली प्रोविजनल सरकार के राष्ट्रपति रहे थे। आज़ादी के दौरन भारत लौटकर शिक्षण संस्थानों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी। बीजेपी अब इसी नाम पर राजनैतिक दाव खेल रही है। बीजेपी का मानना है कि महेंद्र प्रताप के नाम पर बनी इस यूनिवर्सिटी का असर सीधे तौर पर उन 120 सीटों पर पड़ेगा जिन पर “जाट वोट बैंक” का प्रभाव है। बता दें कि 2017 के विधानसभा चुनावों में 136 में से इन्ही 102 सीटों पर बीजेपी ने बम्पर जीत हासिल की थी।

ज़मीनी स्तर पर बढ़ रहा है भ्रष्टाचार:

यूपी के अन्य क्षेत्रीय दलों के मुताबिक यूपी में ज़मीनी स्तर परभ्रष्टाचार बढ़ा है। बजरंग दल के सदस्य ऋषभ चौधरी ने अपनी शिकायत में कहा कि क्षेत्र में गोशालाओं का निर्माण तभी कराया गया था, जब सीएम क्षेत्र में मौजूद थे। वरना क्षेत्र की सड़कों पर गाय और बैलों को घूमते हुए देखा जा सकता था। इतना ही नहीं रात में इन्हें खेतो में फसलों को नष्ट करते भी देखा गया है।

ये बात और है कि कृषि श्रमिको के लिए मुफ्त राशन का प्रबंधन सरकार की प्रशंसा का विषय है, लेकिन इस आधार पर वोट मिलना मुश्किल है। किसान और आम जनता खुद तय करेगी कि उसे वोट किसे देना है, मुसीबत में मदद करने वाले को या मौसम के अनुसार अपना हित साधने वाले को।

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Sushma Tomar