इतिहास के पन्नो से

जलियांवाला बाग़ हत्याकांड में, 10 मिनट तक 1650 राउंड गोलियां बरसाई गईं थी

जलियांवाला बाग़ हत्याकांड में, 10 मिनट तक 1650 राउंड गोलियां बरसाई गईं थी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिस घटना ने देशवासियों पर सबसे ज्यादा असर डाला, वह है जलियांवाला बाग का सामूहिक हत्याकांड. 13 अप्रैल 1919  को पंजाब के अमृतसर शहर में स्तिथ जलियांवाला बाग भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की सबसे खूनी दास्तां का गवाह है.
इस दिन ब्रिटिश लेफ्टिनेंट जनरल रेगिनाल्ड डायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में बैसाखी के मौके पर रॉलेट ऐक्ट  का विरोध करने के लिए इकट्ठे हुए हजारों निहत्थे मासूम भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दी थीं. इस गोलीबारी में 1000-2000 भारतीय मारे गए थे. वहीं इससे कहीं ज्यादा गंभीर रूप से घायल हुए थे.
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क्या था रॉलेट ऐक्ट

रॉलेट ऐक्ट मार्च 1919 में भारत की ब्रितानी सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से निर्मित कानून था.

  • इस एक्ट के तहत अंग्रेज सरकार जिसको चाहे जब तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद रख सकती थी.
  • यह जनता की सामान्य स्वतंत्रता पर प्रत्यक्ष कुठाराघात था.
  • इस एक्ट को बिना अपील बिना वकील तथा बिना दलील का कानून भी कहा गया इसे काला अधिनियम एंव आतंकवादी अपराध अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है.
  • इस क़ानून के तहत अपराधी को उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम जानने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया था.
  • इस कानून के विरोध में देशव्यापी हड़तालें, जूलूस और प्रदर्शन होने लगे.
फ़ोटो – जलियांवाला बाग़ मेमोरियल

रॉलेट ऐक्ट के विरोध में आयोजित की गयी थी सभा

13 अप्रैल 1919 को अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास जलियांवाला बाग में बैसाखी के दिन रोलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी,जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे.
शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे.
जब नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे तभी डायर ने बाग से निकलने के सारे रास्ते बंद करवा दिए. बाग में जाने का जो एक रास्ता खुला था जनरल डायर ने उस रास्ते पर हथियारबंद गाड़ियां खड़ी करवा दी थीं.
डायर करीब 100 सिपाहियों के सीथ बाग के गेट तक पहुंचा. उसके करीब 50 सिपाहियों के पास बंदूकें थीं. वहां पहुंचकर बिना किसी चेतावनी के उसने अंधाधुंध गोलियां चलवानी शुरु कर दी. गोलियों से बचने के लिए लोगों में भगदड़ मच गई और कइयों ने जान बचाने के लिए बाग में स्थित एक कुएं में छलांग लगा दी.
गोलीबारी के बाद कुएं से 200 से ज्यादा शव बरामद हुए थे. 10 मिनट तक 1650 राउंड गोलियां बरसाई गईं थी, यही नहीं बल्कि दीवारों पर गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं.
इस घटना का बदला लेने के लिए सरदार उधमसिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ डायर को गोली चला के मार डाला. उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया था.

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Durgesh Dehriya

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