जब न्यायपालिका कहा जाता है तो उसका आशय केवल सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई ही नहीं बल्कि मैजिस्ट्रेट से होती हुयी, ऊपर तक का पूरा न्याय तंत्र है। क्या यह खंभा, भ्रष्टाचार, या घूसखोरी, पक्षपातवाद आदि अन्य व्याधियों, जो कार्यपालिका के अन्य विभागों के गहरे तक जड़ जमा चुकी हैं, से मुक्त हैं ?

अगर आप समझते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नहीं है तो यह सवाल आप के लिये अप्रासंगिक है। लेकिन, यदि आप मानते हैं और आप का अनुभव है कि न्यायपालिका भी देश के अन्य प्रशासनिक विभागों की तरह उपरोक्त व्याधियों से ग्रस्त है, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि

  • न्यायपालिका ने अपने अंदरूनी तंत्र में भ्रष्टाचार न हो सके, इसके लिये क्या उपाय किये हैं ?
  • न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों पर क्या कार्यवाही होती है और जनता ऐसे लोगो के खिलाफ़ कहां, किसके पास किस फोरम में शिकायत कर सकती है ?
  • क्या न्यायपालिका की सर्वोच्च प्रशासनिक इकाई सुप्रीम कोर्ट या राज्यो में हाईकोर्ट के पास ऐसा कोई आंकड़ा है कि हर साल, कितने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ करप्शन की शिकायतें आयीं, कितनो के खिलाफ कार्यवाही हुयी और कितने दंडित किये गए ? ऐसा आंकड़ा आप को सरकार के सभी विभागों से मिल जाएगा।
  • शिकायत आमंत्रित करने और फिर जांच करने का, जो मेकेनिज़्म सरकार के अन्य विभागों के लिये, विजिलेंस, एन्टी करप्शन विंग के रूप में सभी राज्यो में, सभी सरकारी कॉर्पोरेशन में विजिलेंस अधिकारी और शीर्ष पर, मुख्य सतर्कता आयुक्त के रुप में है, के प्रकार का क्या कोई तंत्र न्यायपालिका में भी गठित है ?

अगर है तो कोई मित्र ज्ञानवर्धन करें और नहीं है तो इसके बारे में क्यों नही सोचा गया ? न्यायपालिका में भी मनुष्य ही हैं। वे भी काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसी मानवीय प्रवित्तियों से अलग नहीं है। वे भी देश के कानून से ऊपर नहीं है। फिर क्यों नहीं न्यायपालिका को भी अपने अधिकारियों और जजो के विरुद्ध शिकायत आमंत्रित करने, जांच कराने, और दोषी पाए जाने पर उनके विरुद्ध कार्यवाही करने के संबंध में एक इन हाउस तंत्र का गठन और विकास नहीं किया जाना चाहिए ?