दो में से एक बात हो सकती है। या तो ये मूर्ख हैं या फिर दूसरों को मूर्ख मानते हैं। कल फलों के ठेले की तस्वीर लगाई थी। एक उग्र दक्षिणपंथी संगठन ने उस ठेले पर अपना पोस्टर लगाकर सर्टिफिकेट जारी किया था कि ये “हिंदू” ठेला है। बहुत से लोगों को ऐसा करना नाग़वार गुज़रा। इसकी वजह यही थी कि फल और ठेला दोनों ना हिंदू हो सकते हैं और ना मुसलमान। ये वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति भले हिंदू या मुसलमान हो जाए मगर उसके पहने हुए कपड़े, इस्तेमाल की जानेवाली कार और खाया जानेवाला खाना उस धर्म का नहीं हो सकते जिसका वो है। ख़ुशक़िस्मती या बदक़िस्मती से अभी धर्म इंसानों पर ही लागू हो रहा है ना कि उसके द्वारा बरते जानेवाली निर्जीव वस्तुओं पर।

इसके बाद एंट्री हुई विद्वानों की। तस्वीरें दिखाने लगे कि “मुस्लिम होटल” भी तो लिखा जाता है। वो ये करते हुए भूल गए कि “वैष्णव ढाबा” और “ हिंदू होटल” भी उतना ही लिखा जाता है। यहां तक कि ये चलन काफी पुराना है। निश्चित ही ठेलों पर “हिंदू दुकान” लिखने से तो काफी पुराना है और वजह भी चाहे जितनी उचित-अनुचित जान पड़े मगर चिंदी भर तार्किक है (निजी तौर पर सहमत नहीं) कम से कम ठेले वाले की तुलना में तो है।

पक्षपात क्यों?

हिंदू या मुस्लिम अथवा वैष्णव ढाबा लिखने में मज़हबी हिकारत का भाव कम है, बल्कि खान पान की आदत का अधिक है। कई लोग नॉन वेज खाते हैं। कई नहीं खाते हैं। उन्हें उस प्लेट में खाने से भी परहेज़ होता है जिसमें परोसा गया हो। उनकी सहूलियत के लिए बोर्ड पर ही लिखा जाने लगा कि ये होटल नॉन वेज परोसता है या कतई नहीं परोसता। भोजन की शाकाहारी शुद्धता का भाव इतना गहरा है कि कई लोग उसके आगे जैन भोजनालय भी लिखते हैं। ये भी जोड़ा जाता है कि “हमारे यहां प्याज़-लहसुन का इस्तेमाल नहीं होता”। फिर वीगन्स की तो अपनी ही एक दुनिया है जो उससे भी आगे कहीं बसती है, लेकिन ये सभी किसी समुदाय विशेष के आर्थिक बहिष्कार के लिए ऐसा नहीं करते। इसके ठीक उलट ठेले पर लगा पोस्टर सिर्फ धार्मिक पहचान सुनिश्चित कराता है और उसके आधार पर अपेक्षा करता है कि लोग सौदा ख़रीदें या ना ख़रीदकर ठेले वाले को भूखा मारें।

अब असल बात। विश्व स्वास्थ्य संगठन, प्रसिद्ध बुद्धिजीवी युवा नोआल हरारी और भारत के प्रधानमंत्री समझा चुके हैं कि कोरोना कोई धर्म विशेष की बीमारी नहीं, और ये किसी को भी हो सकती है। बावजूद इसके कुछ लोगों ने ये प्रचार जारी रखना फर्ज़ समझा है कि मुसलमान इसे योजना के साथ जानबूझकर फैला रहे हैं। ऐसे वॉट्सएप मैसेज और फेसबुक के कई पोस्ट्स हमारी नज़रों से गुज़रते रहे हैं।

असल बात ये है कि इनमें से कुछ गोबर हैं और वो इस थ्योरी पर यकीन करते हैं कि कहीं कोई साज़िश रची गई है जिसके तहत “कोरोना जिहाद” हो रहा है। कुछ गोबरों के सरदार हैं जो जानते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है, बल्कि ये प्रचार ग़ैर हिंदू व्यापारियों और दुकानदारों के उस आर्थिक बहिष्कार की योजना का ताज़ा हिस्सा है जो आम दिनों में कामयाब नहीं हो पा रही थी। आम आदमी अपने लिए फल-सब्ज़ी वहीं से खरीदेगा जहां बेहतर हो या कम दाम में मिले। उसे इस संबंध में धर्म के आधार पर भेदभाव सामान्य लॉजिक की तौहीन लगेगा मगर कोरोना की भयावहता के सामने वो देर सवेर क्या करेगा? वही करेगा जिसका सालों से प्रयास जारी है। दो चार रुपये बचाने का लालच छोड़ वो उसी से सामान ख़रीदेगा जो “फल में थूक लगाकर” कोरोना नहीं फैला रहा।

– नितिन ठाकुर