October 26, 2020
देश

बाल दिवस विशेष- देश में बच्चे कितने सुरक्षित?

बाल दिवस विशेष- देश में बच्चे कितने सुरक्षित?

आज 14 नवम्बर है ‘बालदिवस’. वैसे भारत के  प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन. चाचा नेहरू के बच्चों से बेजोड़ लगाव था. इसलिए आज का दिन उन्हीं के संस्मरण में बालदिवस के रूप में मनाया जाता है. पर आज भी हमारे देश में प्रगति और और न्यू इंडिया के लम्बे चौड़े दावों के बावजूद बच्चों की स्थिति दयनीय बनी हुई है. उदाहरण के तौर पर हम गुरुग्राम के स्कूल में घटित प्रद्युम्न का मामला देखें या फिर उत्तरप्रदेश के एक सरकारी अस्पताल में कई बच्चों की मौत. कहीं न कहीं अपने देश में बच्चों की समस्या गम्भीर है.
भारत में हर साल अकेले कुपोषण से 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है. ‘सिक्षा के अधिकार’ के 8 साल बाद भी आज भी 10 करोड़ बच्चों को अब तक स्कूल जाना नसीब नहीं है. इसके साथ ही सामाजिक और नैतिक समर्थन के अभाव में स्कूली बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है. इसके अलावा खासकर बढ़ते एकल परिवारों की वजह से ऐसे बच्चे साइबर बुलिंग का भी शिकार हो रहे हैं. ‘सेव द चिल्ड्रेन’  की ओर से विश्व के देशों की एक सूची जारी की गई है जहां बचपन सबसे ज्यादा खतरे में है. भारत इस सूची में 116 वें स्थान पर है.  यह सूचकांक बाल स्वास्थ्य, शिक्षा, मजदूरी, शादी, जन्म और हिंसा समेत आठ पैमानों पर प्रदर्शन के आधार पर तैयार किया गया है.
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बहुत से बच्चों को गरीबी और गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के चलते स्कूल का मुंह देखना नसीब नहीं होता तो कइयों को मजबूरी में स्कूल छोड़ना पड़ता है. देश में फिलहाल एक करोड़ ऐसे बच्चे हैं जो पारिवारिक वजहों से स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम करने पर भी मजबूर हैं. स्वास्थ्य सुविधाओं की खस्ताहाली के चलते छह साल तक के 2.3 करोड़ बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं. डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन (डाइस) की वर्ष 2014-15 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि हर सौ में महज 32 बच्चे ही स्कूली शिक्षा पूरी कर पाते हैं. इसी रिपोर्ट के अनुसार देश के महज दो फीसदी स्कूलों में ही पहली से 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की सुविधा है.
बाल मजदूरी
देश में बाल मजदूरी की समस्या भी बेहद गंभीर है. दो साल पहले बच्चों के लिए काम करने वाली एक संस्था क्राई ने कहा था कि देश में बाल मजदूरी खत्म होने में कम से कम सौ साल का समय लगेगा. इससे परिस्थिति की गंभीरता का अहसास होता है. वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट में देश में पांच से 14 साल तक के उम्र के बाल मजदूरों की तादाद एक करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान लगाया गया था. अब तक यह तादाद और बढ़ गई होगी. देश के कुछ हिस्सों में तो बच्चों की कुल आबादी का आधा मजदूरी के लिए मजबूर है. मोटे अनुमान के मुताबिक देश में फिलहाल पांच से 18 साल तक की उम्र के 3.30 करोड़ बच्चे मजदूरी करते हैं. बच्चों के हित में काम करने वाले संगठनों का कहना है कि पूरे देश में बाल मजदूरों की तादाद और उन पर होने वाले अत्याचार के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

अन्य  समस्याएं

भारत में बच्चों को कई अन्य समस्याओं से भी जूझना पड़ रहा है.चाइल्ड एब्यूज, चाइल्ड ट्रैफिकिंग, चाइल्ड ड्रग्स  और चाइल्ड बेगर इत्यादि. अपने देश में लगभग 3 लाख बच्चे एसे है जिनको भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है. चाइल्ड बेगर की मुख्य वजहें भी अब्युजिंग, लेबर और गरीबी है. पब्लिक पैलेस ज्यादातर रेलवे स्टेशन पर या ट्रेन में बच्चे भीख मांगते है.  सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग आठ मिनट पर एक बच्चे का अपहरण हो जाता है. बीते एक दशक के दौरान बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में पांच गुनी वृद्धि हुई है. लेकिन कुछ एनजीओज का का दावा है कि यह आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है. परीक्षा में फेल होना बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की दूसरी सबसे बड़ी वजह के तौर पर सामने आई है. इसके अलावा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं होना भी बच्चों की मौत की एक बड़ी वजह है.
यूनिसेफ की ओर से जारी रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन, 2016 में कहा गया है कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी के बावजूद देश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर भयावह है. वर्ष 2015 के दौरान देश में पैदा होने वाले ढाई करोड़ में से लगभग 12 लाख बच्चों की मौत ऐसी बीमारियों के चलते हो गई जिनका इलाज संभव है.

रोकने के उपाय

इसके लिए केंद्र सरकार को कुछ कड़े एक्ट लागु करने होंगे. कानूनों में बदलाव के साथ-साथ सामाजिक तौर पर जागरुकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाना होगा. चाइल्ड एब्यूज को लेकर सरकार की जो वर्तमान पॉलिसीज है उनका प्रचार-प्रसार करना होगा. और यह सुनिश्चित करना होगा कि हर तबके के बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी मूलभूत सुविधाएं मुहैया हो सकें. कुछ गैर सरकारी संगठन भी इस दिशा में उम्दा कार्य कर रहे है. उदाहरण के तौर पर नोबल प्राइज विजेता कैलाश सत्यार्थी का ‘बचपन बचाओ’ आन्दोलन भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है.

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Ashok Pilania

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