भारत के सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह का 5  मई शनिवार को 102 वां जन्मदिन है. ज्ञानी जैल सिंह का जन्म 5 मई 1916 को संधवान गांव जिला फरीदकोट पंजाब में हुआ था.उनके बचपन का नाम जरनैल सिंह था. ज्ञानी ज़ैल सिंह की स्कूली शिक्षा पूरी नहीं हो पाई. उन्होंने उर्दू सीखने की शुरूआत की, फिर पिता की राय से गुरुमुखी पढ़ने लगे. इसी बीच में वे एक परमहंस साधु के संपर्क में आए.अढाई वर्ष तक उससे बहुत कुछ सीखने-पढ़ने को मिला. फिर गाना-बजाना सीखने की धुन सवार हुई तो एक हारमोनियम बजाने वाले के कपड़े धोकर, उसका खाना बनाकर हारमोनियम बजाना सीखने लगे.पिता ने राय दी कि तुम्हें गाना आता है तो कीर्तन करो, गुरुवाणी का पाठ करो. इस पर जरनैल सिंह ने ‘ग्रंथी’ बनने का निश्चय किया और स्कूली शिक्षा छूटी रह गई.वे गुरुग्रंथ साहब के ‘व्यावसायिक वाचक’ बन गए. इसी से ‘ज्ञानी’ की उपाधि मिली.
अंग्रेजों द्वारा कृपाण पर रोक लगाने के विरोध में ज़ैल सिंह को भी जेल जाना पड़ा था. वहां उन्होंने अपना नाम जैल सिंह लिखवा दिया. छूटने पर यही जैल सिंह नाम प्रसिद्ध हो गया.
ज्ञानी ज़ैल सिंह क्रांतिकारियों के भी संपर्क में रहे. उन्होंने ‘प्रजामंडल’ का गठन किया.वे मास्टर तारासिंह के संपर्क में आए, जिन्होंने उन्हें फिर पढ़ने के लिए भेज दिया. वहां वे अधिक समय नहीं टिके और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में नौकरी कर ली. स्वतंत्रता की भावना और राष्ट्रीय विचार उनके अंदर आरंभ से ही थे.
1946 में जब फरीदकोट में अफसरों ने तिरंगा झंडा नहीं फहराने दिया तो ज्ञानी जैल सिंह ने नेहरू जी को बुला लिया. इस अवसर पर पूरे फरीदकोट को ज्ञानी जी के पीछे खड़ा देखकर नेहरू जी ने उनके प्रभाव का अनुभव किया और ज्ञानी जी उनके निकट आ गए. 1969 में उनकी इंदिरा जी से राजनीतिक निकटता बढ़ी. 1972 से 1977 तक ज्ञानी जी पंजाब के मुख्यमंत्री रहे. 1980 में जब इंदिरा जी पुनः सत्ता में आईं तो उन्होंने ज्ञानी जी को देश का गृहमंत्री बनाया.
1982 में श्री नीलम संजीव रेड्डी का कार्यकाल समाप्त होने पर ज्ञानी जी देश के आठवें राष्ट्रपति चुने गए. 25 जुलाई, 1982 को उन्होंने पद की शपथ ली.
उनका कार्यकाल शुरू से आखिरी तक विवादों से घिरा रहा. उनके ही कार्यकाल में बहुत सी घटनाएं घटी, जिनमे मुख्य रूप से ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गाँधी की हत्या और 1984 में सिक्ख विरोधी दंगा भी शामिल है. राजीव गाँधी के पीएम बनने पर किसी विधेयक को लेकर दोनों में अनबन की खबरें भी सुनने में आई. इसके बावजूद उन्होंने अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा किया.25 जुलाई, 1987 में उनका कार्यकाल पूरा हुआ था.
29 नवम्बर 1994 को रोपर जिले के कितारपुर के पास से यात्रा करते समय ज्ञानी जैल सिंह दुर्घटना का शिकार हो गए. उनकी कार गलत साइड से आ रहे ट्रक से टकरा गई.इस हादसे में जैल सिंह को बहुत चोट भी लगी थी. कई बीमारियों से जूझ रहे इस पूर्व राष्ट्रपति का 25 दिसम्बर को 1994  को चंडीगढ़ में इलाज के दौरान निधन हो गया.इसके साथ ही एक दृढ निश्चयी,साहसी और समर्पित सिख के जीवन का अंत हो गया .उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में किया गया.उस जगह का नाम एकता स्थल रखा गया.

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Durgesh Dehriya

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