कोई कंही से पूरा नहीं चला जाता, जँहा से आये वँहा अपना कुछ छूट गया और उनका कुछ साथ आ गया, नहीं समान नहीं ! अमरीका में रहते हुए भारत की याद बेतरह सताती थी सो अमरीका में भारत खोजते थे। चाव तो आता था की घर भी विदेशियों संग बांटे लेकिन दो दिन में पता चल जाता है की घर वही मुफीद है जँहा लौटने पर अपना सा लगे, अनजानी और औचक तो पूरी दुनिया है।

घर ढूंढने के सिलसिले में एक साइट काम आयी जो अमरीका में साउथ एशियनस की लाल बुझक्कड़ वाली पोटली है। सिर्फ साऊथ एशियन्स की, बाकि लोक से उसकी छिप्पी है।बाकी लोक भी हमें ऐसे ही देखता है कि साउथ एशियन्स हैं, ज़्यादा भारत – पाकिस्तान – बांग्लादेश में बाँटों तो मुस्कुराते हुए पूछते हैं – फर्क क्या है ? हमें तो एक से ही लगते हो ! इस साईट की बाबत पता चला की यँहा अपनी बिरादरी में ठौर मिल जाता है, माने पाकिस्तानी, हिंदुस्तानी, श्रीलंकाई, बांग्लादेशी दरवाजों के पते लिखे थे- एक घर खुला, जँहा जूते दरवाजे के किनारे खोल कर अंदर घुसना था, तमन्ना जन्हा रहती थी, वो बांग्लादेश से है और डॉक्टर है। मैंने उसे बताया की जँहा हूँ वँहा ठीक से नहीं हूँ और आज कहो तो आज ही बोरिया-बिस्तरा ले आऊं। इतनी जल्दी? हाँ इतनी ही! मैं शक्तिमान की तरह गोल घूम कर तमन्ना के घर में थी। अमरीका में आने के हफ्तों बाद ये पहली मर्तबा हो रहा था, मेरे सारे कपडे एक साथ अटैची से आज़ाद हैं, तह खुल रही है, वो हैंगर में झूलते हुए पहली बार अमरीकी साँस ले रहे हैं।

मैं अपना बिखरा समान और खाली अटैची देख निहाल थी, मेरे पास घर था। तमाम अमरीकी शूं शा के बाद लौटने को एक घर! अब अमरीका और भारत के बीच एक दरवाजे भर का फासला है, घँटी बजाने पर तमन्ना दरवाज़ा खोलती और मैं अपने देस लौट आती जँहा गर्म मसाले, देसी घी, पापड़,सेवइयां,चीवड़ा,आचार, दूध वाली चाय, यँहा तक की पकोड़ियों तक की खुशबु आती है। मैं ने ये सब नहीं संजोया,मैं बस कुछ जीन्स टॉप लेकर विदेश आ गयी थी लेकिन तमन्ना अपने संग कुछ बांग्लादेश(ख़ुशबुए और स्वाद) भर कर लायी, उस ही में से मैंने अपना भारत पा लिया बल्कि सख्त ज़रूरत पड़ने से पहले तमन्ना अपना देस सजा कर (कभी साड़ी, चुन्नियाँ और कुर्ते) मेरे सामने रख देती और मुझे मेरे देस का सुख मिल जाता। अब तमन्ना के लाये स्वदेस से हम दोनों गुज़ारा करते, कभी कभी तमन्ना नाराज़ भी होती की, “काश तुम में अक्ल होती !अपने संग कुछ भारत लायी होती तो चाय के 2 कप हर रोज़ और बन जाते,पकोड़ों पर चाट मसाला पड़ जाता और पापड़ की सब्जी बना पाते”।

एक बार दोस्तों की एक महफ़िल जमी जेरेको ताइवान से, लारा दुबई, एड्रिआना पैरागुऐ, मार्र स्पेन,जेक अमरीका बहरहाल 8 -9 देशों के लोग, न जाने क्या धुन चढ़ी की एक के बाद एक अपने अपने देश का संगीत सुनवाया जा रहा है,होड़ है अच्छे से अच्छा सुनाएँगे, इतिहास भी बता रहे हैं उस संगीत का। मिस्सी अदीवा को मैं जानती नहीं थी उसने अपना गाना स्पीकर से कनैक्ट किया -आपे ज़ाहिर आपे बाँटी आपे लुक लुक बेंदा है … अर्रे ये तो नुसरत है ! बुल्लेशाह है !! क्या बात करते हो यारों, बेहद रमज़ा दसदा मेरा ढोलण माही सुनते हुए तो मेरी रातें गर्द हुई हैं तुम कैसे इसे चुन सकते हो ?ओहो ! मैं अदीवा से लिपट जाना चाहती थी पर ऐसा प्यार जताते मुझे अटकन होती है, मन मेरा लिपट लिया था। नहीं भई ये मेरा संगीत है विकिपीडिया को क्या मालुम कौन जी हलकान करता है किसके पीछे और गूगल का दिल नहीं है जो समझे ये क़व्वाली हिंदुस्तानी कैसे न हुई और पाकिस्तानी क्योंकर हुई। अदीवा की मुस्कान मेरी बेचैनी पर सहमत थी आखिर एक ज़माने उसने लता के गीत गुनगुनाये थे।

बात दो कदम भी क्या बढ़ी थी की पता चला अदीवा की माँ बनारस से हैं। मैं जब पहली दफा घर में दाखिल हुई तो वो समोसे तल रहीं थीं। समोसों और हरी चटनी के साथ बनारस ! ड्रॉइंग रूम की बड़ी खिड़की से पीठ करके बैठ जाओ तो भारत में हो,ज्यूँ खिड़की के बाहर देखा तो पाम ट्री लॉस एंजल्स ले आते। उनके माँ पिताजी बनारसी थे लेकिन खुद कभी फुरसत न हो पाई पर ख्वाब हैं कोई मंसूबें बस बाँध दे तो देख लें वो गालियां जँहा से बचपन भर गुज़री। बनारस के रिक्शे,गलियों, घाटों, पुलों और इंसानों की तस्वीर कहानियों से खींच रही थीं,मैंने उन्हें चाची बोला क्योंकि वँहा बैठे परिवार के कुछ बच्चे चाची ही कह रहे थे।मेरे मेंटर लीएंडर का सवाल कान के पर्दे पर मृदंग बजाता -फर्क क्या है ?

अर्टएशिया में घुमते हमे तो हमें क्या सैकड़ों लोगों को भी नहीं लगता था की फर्क है ! क्योंकि जब भी समोसे खाने का मन होता तो चटनीज़ घुस जाते। दिल्ली,असम,केरल के खाने में फर्क होगा लेकिन जनाब लाहौर के कुक अमरीका में ठीक वैसा ही समोसा छानते जैसा दिल्ली में मेरी गली की किनारे वाली दुकान पर तला जाता है। गंगादीन की दुकान जिस पर बड़ा बड़ा लिखा है इंडियन एंड पाकिस्तानी फ़ूड, मेज़बान बिरयानी और अनारकली इन सबने क्या कुफ्र फैलाया है की अपने नामों के नीचे लिखा रखा है इंडिया ,पाकिस्तान फ़ूड,(साथ साथ ! लिखा ) यँहा भारतीय,पाकिस्तानी,श्रीलंकाई,बांग्लादेशी बहुतायत में मिल जाते , उन्ही का बाज़ार वही खरीदार, हर दूकान पर दो नाम तो साथ साथ अरूर ही मेनशन हैं-भारत, पाकिस्तान। ये सब दुकाने हमे यूँ बुलाती जैसे हम एलिस हों, यकीनन हमारा वंडरलैंड इन्ही दुकानों के पीछे था।