चीन ने मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने के प्रस्ताव को फिर वीटो कर दिया. यह चौथा अवसर है जब चीन ने पाकिस्तान के समर्थन में इस प्रस्ताव के विरोध में अपने विशेषाधिकार वीटो का प्रयोग किया. यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी कूटनीतिक असफलता है, पुलवामा के बाद और इसमें मोदी सरकार का बड़ा हाथ है – आरोप जैश पर है, करने वाले को कश्मीरी बता रहे, मुख्य मास्टर माइंड को भी. फिर फ़र्ज़ी या सही पर एयर स्ट्राइक का जुमला दाग पाकिस्तान सीमा उल्लंघन कर चीन को ‘मित्र’ देश के साथ खड़े होने का कारण और मुहैया करा रहे हो. ड्रम बजाने से कूटनीति चलती तो मंगोलिया महाशक्ति होता.

भारत चीन संबंधों पर समर अनार्य कहते हैं  ” प्रधानमंत्री बनते बनते चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अहमदाबाद बुला के झूले पर बैठ के प्यार की पींगे लिये. अरुणाचल प्रदेश से आने की वजह से अपने गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू को उस कार्यक्रम में बुलाया भी नहीं, फिर भी चीन उसी समय अरुणाचल में घुसपैठ कर रहा था. उसके बाद चीन के 5 दौरे किये; 4 तो पठानकोट हमले के बाद के बाद भी चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के मसूद अज़हर को आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव के विरोध में वीटो के बावजूद.

पूंजीपति मित्रों के लिये विदेश जा जा कर उनके व्यापार की संभावनाएं ढूंढना और बात है पर व्यापक देशहित और जनहित के लिये अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन हासिल करना अलग बात है. गिरोहबंद पूंजीवाद ( Crony Capitalism ) से यही प्राप्त होगा. 1971 की भारत पाक जंग सैन्य सफलता तो थी ही पर वह देश की एक उल्लेखनीय कूटनीतिक सफलता का परिणाम भी थी कि रूस जैसा भरोसेमंद मित्र हमारे साथ था और उसने कदम कदम पर हमारा साथ दे अमेरिका की हर साज़िश विफल कर दिया था. अमेरिका ने सातवाँ जंगी बेड़ा तक (यूएस सेवंथ फ्लीट) तक मोड़ के भारत की तरफ भेज दिया था जिसके जवाब में सोवियत यूनियन ने अपनी फ्लीट घुमा दी. आज वही रूस पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास कर रहा है और नेपाल चीन के साथ. अमेरिका, तिलमिला कर रह गया था पर न हमारा कुछ बिगाड़ सका और न ही पाकिस्तान को कोई मदद पहुंचा सका. आज भारत के साथ अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक जगत में ऐसा कोई भी विश्वसनीय मित्र नहीं है, यहां तक कि अमेरिका भी नहीं, जो वक़्त पड़ने पर हमारे लिये वीटो लेकर खड़ा रहे. अमेरिका के लिये हम बस कूचा ए बाज़ार है. जब तक हैं तब तक हैं. उसकी नज़र बस एक खरीददार की तरह ही उठती है.

गिरीश मालवीय के अनुसार संगठन जैश-ए-मोहम्मद के चीफ मसूद अजहर को एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में  वैश्विक आतंकी घोषित नहीं किया जा सका क्योकि चीन ने फ्रांस, अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा मसूद के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लाए गए प्रस्ताव के खिलाफ बुधवार को वीटो लगा दिया.

मोदी सरकार की यूएन में यह लगातार तीसरी नाकामी है, सरकार ने सबसे पहले 2016 में मसूद को वैश्विक आतंकी मानने का प्रस्ताव रखा चीन ने पहले मार्च 2016 ओर फिर अक्तूबर 2016 में भारत की कोशिशों को नाकाम कर दिया.  2017 में एक बार फिर अमेरिका ने ब्रिटेन और फ्रांस की मदद से प्रस्ताव रखा लेकिन इस में चीन ने वीटो लगा दिया.

मोदी चार साल में चीन के चार चक्कर लगा चुके हैं तो आखिरकार क्या यह पूछा नही जाना चाहिए कि मोदी जब बार बार चीन दौरे करते हैं उसका क्या फायदा हुआ? चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अति महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट रोड इनिशिएटिव पर हमने क्या कड़े कदम उठाए हैं?

चीनी कम्पनियों को जो हर तरह की सुविधा दी जा रही हैं वह क्यो दी जा रही हैं? आज मोबाइल का मार्केट पूरी तरह से चीन के कब्जे में जा चुका है जहाँ देखिए वहाँ बाज़ार ओप्पो वीवो जैसे चाइनीज ब्रांड का माल मिलता है. लावा माइक्रोमैक्स सरीखी कंपनियां बंद जैसी ही हो गयी हैं, आज यही से पैसा जाता है और बदले में चीन हमे आँखे लाल कर के दिखाता है.

अब मोदीजी चीन के लिए ऑटोमोबाइल सेक्टर भी  खोल रहे है, चीन से आयात रिकार्ड हाई पर पुहंच गया है और निर्यात कम होता जा रहा है चीन के साथ व्यापार घाटा देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत भारी पड़ रहा है, उसके बावजूद भारत चीन पर प्रेशर नही डाल पा रहा है तो यह मोदीजी की विदेश नीति की असफलता क्यो नही मानी जाए ?

इसी विषय पर प्रसिद्ध पत्रकार प्रशांत टण्डन की यह टिप्पणी बेहद सारगर्भित है.

चीन ने कल दोबारा जैश – ए- मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का विरोध कर के इसे निरस्त कर दिया. ये मोदी सरकार की बड़ी कूटनीतिक विफलता है जब विश्व के तमाम देश पुलवामा में हुये आतंकवादी हमले की निंदा कर चुके हैं.

मोदी सरकार आने के पहले भारत-चीन-रूस की तिकड़ी पश्चिम के लिए सर दर्द बनी हुयी थी. इसी तिकड़ी ने BRICS (ब्राज़ील, रूस, इंडिया, चाइना और साउथ अफ्रीका) का जलवायू परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पर अमेरिका और पश्चिमी देशो के खिलाफ मोर्चे बंदी के लिए प्रेशर ग्रुप बनाया जिसका बाद में इन देशो के बीच व्यापारिक और सामरिक हितों तक विस्तार हो गया. पश्चिम और खासकर अमेरिका इस तिकड़ी को तोड़ना चाहता था. मनमोहन सरकार के वक़्त ओबामा ने इस बावत कई बार कोशिश की पर उसे कामयाबी नहीं मिली.

मोदी अमेरिका के बुने हुये इस जाल में फसते चले गए और इस विदेश नीति को ऐसा मोड़ा कि भारत उसकी बड़ी कीमत चुका रहा है. पहले चीन ने भारत की न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप की सदस्यता पर अड़ंगा लगाया. मोदी ने एनएसजी की सदस्यता को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया पर कामयाब नहीं हुये. फिर चीन के डोकलाम में सैनिक कार्यवाही कर के भारत के लिये मुसीबत खड़ी की जो अभी भी पूरी तरह से सुलझी नहीं है.

इसके पहले चीन और रूस ने ब्रिक्स के प्रस्ताव में पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी गुटों का ज़िक्र नहीं लाने दिया. भारत की विदेश नीति की एक बड़ी कामयाबी रही है कि आतंकवाद पर वो विश्व समुदाय मे पाकिस्तान को अलग थलग करने में कामयाब रहा है. चीन का ये रुख भारत की मूहिम को धक्का है.

चीन एक बड़ी ताकत है, भारत और चीन की 4000 किलोमीटर लंबी सीमा है और व्यापरिक रिश्ते हैं लेकिन उससे सूझबूझ से इंगेज करने के बजाय मोदी नेपाल और श्रीलंका को चीन के पाले में धकेल चुके हैं. भारत की विदेश नीति का उद्देश्य भारत के हितों की रक्षा करना होना चाहिए ना कि अमेरिका के। क्या हम चीन के खिलाफ भी कुछ करेंगे या करने की सोचेंगे ?

( विजय शंकर सिंह )