क्या कभी ऐसा सोचा गया था कि मीटू की सुनामी आएगी और उसमें बड़े-बड़े लोगों का तथाकथित माज़ी इस तरह सामने आएगा कि वे जिन्हें हम अपने-अपने क्षेत्र के ‘हीरो’ की तरह देखते हैं, ‘विलेन’ नजर आने लगेंगे? किसने सोचा था कि पत्रकारिकता के क्षेत्र का मजबूत पिलर माने जाने वाले एमजे अकबर पर एक-एक कर 16 महिलाएं यौन उत्पीड़न का आरोप लगा देंगी?

एमजे अकबर, जो बरास्ता पत्रकारिता राजनीति में आए और मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री बने, को इस्तीफा देना पड़ेगा? यही बात नाना पाटेकर और आलोकनाथ के बारे में कही जा सकती है। नाना पाटेकर न सिर्फ एक बेहतरीन अभिनेता हैं, बल्कि सामाजिक सरोकारों के लिए जाने जाते हैं, को भी मीटू की सुनामी बहा ले गई। सिने पर्दे पर ‘संस्कारी बाबूजी’ आलोकनाथ का बुढ़ापा इसलिए खराब हो गया कि उन पर कुछ अभिनेत्रियों ने शराब पीकर यौन शोषण के आरोप लगाए।

जिन लोगों को मीटू की सुनामी ने डसा, उनकी फेहरिस्त लंबी है। लेकिन क्या यह अजीब बात नहीं है कि मीटू की टेढ़ी नजर सिर्फ बॉलीवुड और पत्रकारिता के क्षेत्र पर ही पड़ी? क्या दूसरे क्षेत्रों में सब कुछ पाक साफ है? कॉरपोरेट जगत इससे अछूता क्यों रहा? क्या कॉरपोरेट जगत में सब साधु संन्यासी हैं?

मीटू अभियान कई सवालों को जन्म देता है, जिनके जवाब भी सामने आने चाहिए। जैसे यौन उत्पीड़न के 15 से 30 साल पहले के मामले सामने आने का क्या मतलब है? एमजे अकबर पर प्रिया रमाणी और ग़ज़ाला वहाब ने लगभग डेढ़-दो दशक बाद यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। इन दोनों ने सोशल मीडिया के जरिए जिस तरह के आरोप लगाए हैं, क्या उनके चलते किसी को भी एक पल के लिए भी एमजे अकबर के साथ काफी दिनों तक काम करते रहना चाहिए था? जाहिर है इसके पीछे कॅरियर का सवाल रहा होगा। ग़ज़ाला वहाब ने कहा भी है कि उन्होंने उस वाकये का जिक्र उस वक्त इसलिए नहीं किया था कि परिवार वाले घर बैठा लेते, जिससे कॅरियर चौपट हो जाता। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि ग़ज़ाला वहाब ने अपने कॅरियर की खातिर एक गलत इंसान को दूसरी लड़कियों का शोषण का रास्ता साफ कर दिया था? अब ग़ज़ाला वहाब और प्रिया रमानी ने अपने परिवार की सहमति से सब कुछ उजागर किया है, तो इसके कुछ मायने नहीं हैं। कॅरियर सही चल रहा है। सेलिब्रेटी बन गए हैं या आपका कॅरियर खत्म हो चुका है।

अब चूंकि सवाल कॅरियर का नहीं है, इसलिए सब कुछ कहा जा सकता है। कॅरियर का सवाल था तो चुप्पी लगा ली गई। क्या उन्हें इस बात का एहसास है कि उनकी उस वक्त की चुप्पी ने कितनी लड़कियों की जिंदगी तबाह की होगी? अगर ये दोनों तभी चुप्पी तोड़ देतीं तो क्या एमजे अकबर इतने आगे बढ़ जाते कि किसी लड़की के मुंह में अपनी जबान डाल देते, उसकी छातियों को मसलते?

अगर प्रिया रमानी या ग़ज़ाला वहाब के परिजन आज भी अपनी यौन शोषण की कहानी उजागर करने को मना करते तो क्या दोनों परिजनों से बगावत करके ऐसा करतीं? अगर नहीं करतीं तो क्या यह भी दूसरे तरह का शोषण नहीं होता? ये सवाल ग़ज़ाला वहाब और प्रिया रमानी से ही नहीं हैं, तनुदत्ता समेत उन लड़कियों महिलाओं से भी है, जो 15 से लेकर 30 साल बाद मुंह खोल रही हैं। कोई फिल्मकार निष्ठा जैन हैं। उन्होंने पत्रकार विनोद दुआ पर आरोप लगाया है कि दुआ ने 1989 में उनके साथ यौन दुर्व्यहार किया। निष्ठा जैन के चंद शब्दों ने विनोद दुआ के कॅरियर पर पानी फेर दिया। अब ‘द वायर’ ने पांच लोगों की एक समिति बना दी है, जो दुआ पर लगे आरोपों की जांच करेगी।

हम यह नहीं कहते कि एमजे अकबर, नाना पाटेकर, विनोद दुआ या वे लोग जिन पर यौन शोषण के आरोप लगे हैं, पाक साफ ही होंगे। सवाल तो यह है कि किसी महिला के 20-30 साल बाद आरोप लगाते ही सामने वाला बंदा फौरन ही गुनहगार क्यों मान लिया जाता है? एमजे अकबर ने इस्तीफा दे दिया, नाना पाटेकर को फिल्म ‘हाउस फुल 4’ से निकाल दिया गया, अनुराग कश्यप ने फैंटम कंपनी बंद कर दी। क्यों भाई, किस लिए? एक महिला ने 20-30 साल बाद आरोप लगाया, इसलिए?

मीटू अभियान एक तरफा क्यों है? जिस पर आरोप लगा है, उसकी सफाई सुनी जाएगी क्या? एक अहम सवाल यह है कि मीटू में अतीत के मामले ही सामने क्यों आ रहे हैं? जो मामले सामने आए हैं, क्या उनमें कोई एक मामला ऐसा भी है, जो महीने-दो महीने या साल-डेढ़ साल पुराना हो? क्या नए दौर के लोग साधू बन गए हैं?

सच तो यह कि सेक्सुआल हैरसमेंट के मामलों में आज के दौर में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है। क्या आज भी कोई महिला या लड़की यौन शोषण सहकर अपना कॅरियर सेव कर रही होगी? क्या आज की शोषित महिला 15-20 साल बाद प्रिया रमानी या ग़ज़ाला वहा बनकर सामने आएंगी? ये भी ध्यान दीजिए कि जितनी भी महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाएं हैं, सभी सेलेब्रिटी हैं। उनका एक मुकाम है। ऐसा मुकाम जहां पहुंचकर उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता।

जरा सोचिए, उन मध्यम और निम्न वर्ग की महिलाओं के बारे में जो सब कुछ सहकर भी मौन रहने पर मजबूर हैं। उनके मौन में एक बेबसी छुपी है। अगर भूले से भी किसी को पता चल जाए कि जिस फैक्टरी या ऑफिस में महिला काम करती है, उसके मालिक या ठेकेदार ने उसका यौन शोषण किया है, तो समाज में वह चरित्रहीन घोषित कर दी जाती है। क्या ऐसी महिलाएं सामने आकर अपने यौन शोषण की कहानी बता सकती हैं? हिम्मत करके बता भी दी तो क्या उसकी कोई सुनेगा? कोई चैनल उस पर प्राइम टाइम करेगा? नहीं करेगा। क्यों कि आरोप लगाने वाली महिला प्रिया रमानी, ग़ज़ाला वहाब या तनुश्री दत्ता नहीं होगी। न ही जिन पर आरोप लगेगा, वे एमजे अकबर, नाना पाटेकर या आलोकनाथ होगा।

दरअसल, मीटू अभियान सेलिबे्रटी का सेलिब्रेटी के लिए है। इसमें आम महिलाएं शामिल नहीं हैं। जिस अभियान में आम महिलाएं शामिल नहीं हैं, उस अभियान के कोई मायने नहीं है। बहुत लोग मेरी बात से इत्त्तेफाक नहीं करेंगे, बहुत लोग मुझे महिला विरोध ठहरा देंगे। किसी भी अभियान के कुछ साइड इफेक्ट भी होते हैं। कहीं ऐसा न हो कि हम मीटू के समर्थन में इतने आगे चले जाएं कि कोई बेगुनाह अपने, और अपने परिवार की नजरों में गिर जाए। उसकी नौकरी चली जाए, वह सड़क पर आ जाए। अगर किसी के साथ कुछ गलत होता है, तो उसे फौरन रिएक्ट करना चाहिए। कॅरियर की खातिर चुप्पी लगाना खतरनाक है। याद रखिए ऐसा करना दुष्कर्मी की हिम्मत को बढ़ाना होगा।