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भोपाल – CAA व NRC का अनोखा विरोध, देश में अमन-शांति के लिए रखा व्रत

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के इक़बाल मैदान में 1 जनवरी 2020 से धरना प्रदर्शन हो रहा है। यह प्रदर्शन भारत सरकार द्वारा लागू किए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के खिलाफ हो रहा है। मंगलवार 21 जनवरी को यहां देश में अमन और शांति कायम करने के लिए रोज़ा और उपवास रखा गया। जिसे सभी धर्मों के लोगों ने मिलकर खोला। उपवास खोलने से पहले भारत में शांति बने रहने की दुआ मांगी गई। इस कार्यक्रम में 500 से भी अधिक लोग शामिल हुए। जिनमें औरतों की संख्या अधिक रही। सभी उम्र और धर्मों की औरतों ने इसमें बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।

कार्यक्रम में शामिल हुईं रानी यादव कहती हैं, ‘हम इसलिए व्रत रख रहे हैं कि देश में अमन, चैन, शांति बनी रहे। इस सीएए और एनआरसी का कोई मतलब नहीं है।’ वे सवाल करती हैं कि, ‘इससे क्या मिला है? क्या फर्क है हिन्दू और मुस्लिम में? कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। अगर खून काटोगे तो एक ही निकलेगा। हिन्दू और मुस्लिम के खून में कोई फर्क नहीं है, खून तो एक ही रहेगा और एक ही दिल रहेगा और एक ही जान है। चाहे जिस भी धर्म का व्यक्ति हो। हम सब भाई-भाई हैं।’
सत्याग्रह समिति के सदस्य और इंसानी बिरादरी संस्था से जुड़े हुए सैय्यद फैज़ बताते हैं कि, कुछ महिलाओं ने उनसे आकर भारत में अमन-शांति के लिए रोज़ा रखने की बात कही थी। जिसके बाद उन्होंने आपस में बात कर, सभी धर्मों के लोगों से अपील की कि वो इसमें शामिल हों। जिस भी तरह चाहें देश के लिए एक दिन व्रत रखें।

व्रत खोलने की व्यवस्था भी लोगों ने आपस में मिलकर ही की है। सत्याग्रह समिति की तरफ से एक डोनेशन बॉक्स रखा हुआ है। जिसमें लोग आर्थिक मदद पहुंचा रहे हैं। उससे, सत्याग्रह समिति और आम लोगों की मदद से इफ्तार और व्रत खोलने की व्यवस्था की गई।
कार्यक्रम में शामिल हुईं नफीसा बी कहती हैं कि, ‘कहां जाएंगे पूरे के पूरे परिवार? यहां कोई छोटा-मोटा परिवार तो है नहीं। सरकार क्या पागल हो गई है? सरकार बनी है तो क्या बर्बादी करने के लिए बनी है? अपन लोगों ने सरकार बनाई है। पूरी ज़िन्दगी से लोग यहां भाई-भाई की तरह रहे हैं तो वैसे ही रहना चाहिए क्यों ये फितूर पाल रहे हैं? ये फालतू फितूर पाल कर सरकार लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना रही है। हम चाहते हैं कि देश में अमन-चैन बना रहे है।’

दिल्ली के शाहीन बाग़ आंदोलन से मिली प्रेरणा

भोपाल में गैस राहत पीड़ितों के लिए सालों से काम करने वालीं रशीदा बी कहती हैं कि, “शाहीन बाग से सबको हिम्मत मिली है, हौसला मिला है। उन महिलाओं ने हिन्दुस्तान को जगाया है। जिस तरह से हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई मिलकर रहे हैं, वैसे ही हम मिलकर रहेंगे। किसी की ताकत नहीं है कि कोई हमें इससे हटा सके। इस बात को लेकर भोपाल में भी जागरूकता आई है और लोग आगे आ रहे हैं।”
रशीदा बी को साल 2004 में चम्पा देवी शुक्ला के साथ गोल्डमेन पर्यावरण पुरस्कार से नवाज़ा गया है। साल 1984 में हुई गैस त्रासदी में पीड़ित लोगों के लिए काम करने के लिए इन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे भोपाल की महिलाओं की हिम्मत की दाद देती हैं और कहती हैं कि, “भोपाल की महिलाएं गैस कांड की लड़ाई को 36 साल से लड़ रही हैं। वे अच्छी तरह जानती हैं संघर्ष करना, जेल में जाना, पदयात्रा करना, वे सब जानती हैं। अगर वक्त आया तो वे सब बाहर निकलकर आएंगी और मोदी को इसका जवाब देना ही होगा।”

पूर्व आईएएस कन्नन गोपिनाथन समेत कई सामाजिक कार्यकर्ता कर चुके हैं संबोधित

नए साल की शुरूआत से अनवरत चल रहे इस विरोध-प्रदर्शन में कई नामी लोग शामिल हुए तो वहीं सीएए और एनआरसी के इतर यहां कई और मुद्दों पर भी बातचीत की गई। जेएनयू में हुई हिंसा के खिलाफ सोमवार, 6 जनवरी को शहर के व्यस्ततम बोर्ड ऑफिस चौराहे पर लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। दोपहर करीब 3:30 बजे छात्रों, कई संस्थाओं से जुड़े लोगों और शहर के आमजनों ने बोर्ड ऑफिस चौराहे पर इकट्ठा होकर सरकार के खिलाफ नारेबाज़ी की। उन्होंने नारे लगाकर, गीत गाकर और पोस्टर्स के माध्यम से अपना विरोध दर्ज़ कराया।
भोपाल में हुए इस विरोध-प्रदर्शन में पूर्व-प्रशासनिक अधिकारी कनन गोपीनाथन भी शामिल रहे। उन्होंने जम्मू और कश्मीर से धारा-370 हटने के विरोध में अपने पथ से इस्तीफा दे दिया था। यह प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा। चौराहे पर स्थित बाबा साहेब अम्बेडकर की मूर्ति के आस-पास इकट्ठा होकर लोगों ने नारे लगाए। लोगों ने राष्ट्रगान गाकर इस प्रदर्शन को यहां समाप्त किया और इक़बाल मैदान में चल रहे सत्याग्रह की ओर बढ़े।

भोपाल में बोर्ड JNU  के समर्थन में प्रदर्शन को संबोधित करते हुए कन्नन गोपीनाथन ( फोटो क्रेडिट – द हिन्दू )

इक़बाल मैदान में कनन गोपीनाथन ने कहा कि, ‘जेएनयू के बच्चे आज़ादी की बात कर सवाल पूछते हैं तो उन्हें टुकड़े-टुकड़े गैंग बोलते हैं। कोई मध्यवर्गी पढ़ा-लिखा व्यक्ति सवाल करता है तो उसे अर्बन नक्सली कह देते हैं। कोई मुसलमान सवाल करता है तो उसे जिहादी, आतंकवादी कह देते हैं। कोई सिख सवाल पूछता है तो उसे खालिस्तानी करार देते हैं। कोई गरीब-आदिवासी सवाल करता है तो उसे नक्सली और माओवादी कहने लगे। अगर कोई हिन्दू सवाल करता है तो उसे देशद्रोही कह देते हैं। सरकार से कोई भी सवाल पूछे उसने उन्हें एक नाम दे दिया और देश का दुश्मन बता दिया है। उसने अपने समर्थकों को खुलेआम आज़ादी दे दी है कि वो इन लोगों पर हमला करें।’
उन्होंने यह भी कहा कि, ‘इस परिस्थिति को हमने बढ़ने दिया, कई मीडिया संस्थानों ने भी इसे बढ़ने दिया है। सरकार ने यह बताया कि सरकार से सवाल करना गलत है। अगर आप सरकार से सवाल करते हैं तो आप देशद्रोह कर रहे हैं। इमरजेंसी के दौरान भी किसी विश्वविद्यालय में ऐसा नहीं हुआ था जैसा कि अब हो रहा है। इससे हमें डरने की ज़रूरत है लेकिन जितना हमें डरने की ज़रूरत है उससे कहीं ज़्यादा उन्हें डरने की आवश्यकता है क्योंकि उनके एक काम से आज पूरे देश में विद्यार्थी सड़कों पर उतरे हैं। मुद्दों को समझना, सवाल करना, ज़रूरत पड़ने पर सड़कों पर उतरना हमारा लोकतंत्र है और जो आज़ादी की और लोकतंत्र की सांस है उसे लेना। एक बार हमने ये ले ली है तो अब हम ये छोड़ेंगे नहीं। अब मुझे इस देश के लोकतंत्र पर इतना भी शक नहीं है।’
बुधवार, 8 जनवरी को यहां जेएनयू में हुई हिंसा के विरोध में प्रदर्शन किया गया। इस प्रदर्शन में शामिल हुए राज्य के रंगकर्मियों ने केंद्र सरकार के संविधान विरोधी काले कानून का विरोध किया। कलाकारों ने जनगीत गाए और कविताओं के माध्यम से व्यवस्था पर सवाल उठाए। वरिष्ठ रंगकर्मी नज़ीर क़ुरेशी ने इस दौरान कहा कि, ‘देश धमाकों से नहीं, अच्छी नीतियों से चलता है। सरकार मुद्दों से भटकाना चाहती है, हमें बुनियादी उसूलों को समझना होगा। यह रंगकर्म को आंदोलन में समाहित करने का वक़्त है।’

इसके अगले दिन 09 जनवरी 2020 को कर्नाटक के आईएएस शशिकांत सेंथिल यहां हो रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में 10 दिसम्बर को इस्तीफा दिया था। वे भोपाल के इक़बाल मैदान में सत्याग्रह को समर्थन देने पहुंचे और उन्होंने कहा कि, ‘अब भारत की जनता  फिर से आज़ादी की लड़ाई लड़ रही है। देश मे छात्रों और जनता के हौसले बुलंद है। पूरे भारत मे अगर कोई हताश है तो वो मोदी सरकार है, जो कि नित नए-नए हिंसात्मक प्रयोग कर रही है। चाहे वो जामिया हो, जेएनयू या एएमयू या फिर भाजपा शासित प्रदेश।’
वे कहते हैं कि, ‘यह हिंसात्मक बर्बरता दिखाती है कि सरकार आंदोलनों से किस तरह डरी हुई है। मगर छात्र संगठन और जन संगठनों के साथ देश की जनता हिंसा का जवाब अहिंसा से दे रही है।’
शुक्रवार, 10 जनवरी को राष्ट्रीय शिक्षा निति के मसौदे पर यहां बातचीत हुई, दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के पूर्व डीन और अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच के सदस्य अनिल सद्गोपाल ने इस विषय पर विस्तार से बात रखी और शिक्षा निति के इस मसौदे को बेदखली का घोषणापत्र बताया। उन्होंने कहा कि, ‘मोदी सरकार द्वारा प्रस्तुत शिक्षा नीति का मसौदा देश की गरीब, वंचित मेहनतकश अवाम को तालीम से बाहर करने की साज़िश है। इस नीति के ज़रिए देश की शिक्षा व्यवस्था पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कब्ज़ा हो जाएगा। जिससे देश को बांटने वाली हिंदुत्ववादी ताकतें मजबूत होंगी और देश का संवैधानिक ढांचा खतरे में पड़ जाएगा। इसके अलावा, सरकारी स्कूलों को बड़े पैमाने पर बंद करने के लिए नीति में बकायदे इंतजाम किए गए है। यहां तक कि इस निति के चलते सरकार का इरादा देश की उच्च शिक्षा को भी कॉरपोरेट हाथों में देने का है।’

उनके साथ भारत ज्ञान विज्ञान समिति की सदस्य आशा मिश्रा ने भी इस बारे में लोगों से बात की। वहीं 11 जनवरी की शाम महिला कवियों ने सरकार के विरोध में अपनी कविताएं सुनाई। इस दिन यहां नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर भी पहुंचीं। सोमवार, 13 जनवरी को मोर्चे पर कविता नाम से पुरुष कवियों द्वारा रचना पाठ किया गया। जिसमें कुमार अम्बुज, शिवकुमार अम्बुज, बालेन्द्र परसाई, शैलेन्द्र शैली, तस्वीर, सचिन, सत्यम और लोकेश शामिल हुए।
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान सैकड़ों लोगों पर वैधानिक कार्रवाई भी की गई। मंगलवार, 14 जनवरी को यहां क़ैफ़ी आज़मी, अहमद फ़राज़ और जयशंकर प्रसाद को याद किया गया। इस दिन मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी और अहमद फ़राज़ की जयंती होती है तो वहीं हिन्दी साहित्य के महान लेखर जयशंकर प्रसाद की पुण्यतिथि।
सत्याग्रह के 15वें दिन शहर के डॉक्टर्स इक़बाल मैदान पहुंचे, डॉक्टर्स एसोसिएशन ने नागरिकता संशोधन कानून को संविधान विरोधी बताया तो वहीं सभी पेशे के लोगों से इसके विरोध में शामिल होने की अपील की। जिसके अगले दिन यहां प्रदेश के बड़े पत्रकार समर्थन देने पहुंचे। वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया ने कहा कि, भारत में सबसे ज्यादा उल्लंघन वर्किंग जॅर्नलिस्ट एक्ट का हुआ है। यह देश के सबसे महत्वपूर्ण और जनपक्षीय कानूनों में से एक था। इसे मौजूदा सरकार ने ख़त्म कर दिया। हमारे देश में सत्ता का उपयोग धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को ख़त्म करने में सबसे अधिक हुआ।
सत्याग्रह में इस दिन मीडिया और सत्ता के संबंधों पर चर्चा हुई। जिसमें वरिष्ठ पत्रकार चन्द्र कांत  नायडू, देशबंधु के संपादक पलाश सुरजन, राकेश दीवान, राकेश दीक्षित, वीरेंद्र जैन, पंकज शुक्ला, अनूप दत्ता, सचिन श्रीवास्तव आदि शामिल हुई।
भोपाल के भारत टाकीज़ चौराहे पर चल रहा धरना, जो 21 तारीख को बंद कर दिया गया

इस तरह राजधानी भोपाल में चल रहे सत्याग्रह में न केवल सीएए और एनआरसी बल्कि देश के तमाम मुद्दों पर बात की जा रही है। बेरोज़गारी से लेकर शिक्षा, दलित-आदिवासियों के अधिकारों, जलवायु परिवर्तन आदि अनेक मुद्दों पर बात कर लोगों को जागरूक करने की कोशिश हो रही है।
इक़बाल मैदान के इतर शाहीन बाग की तरह भारत टॉकीज़ पर भी एक धरना प्रदर्शन शुरू किया गया था। जिसे 21 जनवरी को समाप्त कर दिया गया। कहा जा रहा है कि सरकार के दबाव के चलते इसे निरस्त किया गया है। लोग प्रदेश की कांग्रेस सरकार से सवाल कर रहे हैं कि एक तरफ तो आप सीएए के विरोध में हैं और जब यहां लोग उसके विरोध में उतरे हैं तो उसे हटा रहे हैं।