मुझे याद है कि उस रात मैं एक कविता लिख रही थी,जामिया और एएमयू की हवा इंक़लाबी नारों से बहुत गरम थी। तभी अचानक सोशल मीडिया पर शोर उठा कि जामिया पर हमला हुआ है, इतनी देर में हम कुछ भी समझ पाते वट्सअप भर गया,फेसबुक पर जामिया की बर्बरता की वीडियो चलने लगीं,फोन भूकम्प की तरह हिलने लगा। यह क्या देख रहे थे हम। सब बदहवास से एक दूसरे से जुड़ने लगे। लाइब्रेरी में घुस कर निहत्थे पढ़ते छात्रों पर बेतहाशा लाठियां बरसाई जा रही थीं जैसे कोई युद्ध का मैदान हो।

लाइब्रेरी पर हमला,यह तो कभी नहीं सुना था। नाम विश्वविद्यालय का था पर ज़मीन पर बिखरा ख़ून कुछ और ही कहानी कह रहा था। डरना छोटा और कायरता से भरा लफ्ज़ है। एएमयू में लोग सदमे में आ गए। जामिया में किसी के बच्चों को पीटा जा रहा था,किसी के लाडलों की आंखों को फोड़ा जा रहा था, किसी के सपनों को तोड़ा जा रहा था। यह सब देख कर आंखे रोने लगीं। एएमयू में इस बर्बरतापूर्ण हमले के खिलाफ सुना कि स्टूडेंट्स इकट्ठे होने वाले हैं पर यह क्या पानी पीकर किचन से लौटी तो एक भयानक खबर से सामना हुआ कि एएमयू के मेन गेट पर पुलिस भूखे शेरों की तरह टूट गयी और जामिया में एक घण्टे पहले जो हुआ उसका भयावह रूप एक घण्टे बाद एएमयू में दोहराया जाने लगा।

जो जामिया में हो रहा था अब वैसा मंज़र एएमयू में हो गया। सब बदहवास से एक दूसरे को कॉल करते रहे, अपने लोगों की फ़िक्र खाये जा रही थी जो अपने नहीं थे वो भी तो अपने ही थे…..खबर आई कि लड़कियों के हॉस्टल में पुलिस घुस गई, तस्वीरें वायरल होने लगीं, पुलिस केम्पस में घुस कर दमन का नंगा नाच कर रही थी। सर सैयद की ज़मीन को पहली बार इस तरह लहुहान देखना बहुत तकलीफ़देह था। कुछ अफवाह थीं कुछ डर भी था पर कुल मिला कर सब बदहवास थे. उन चीखों को, उस हाहाकार को मैंने उस रात कानों से सुना, अपने जामिया का दर्द लोगों तक पहुंचा। पर पूरी दुनिया यह जान पाती की एएमयू में चल रही बर्बरता का आलम क्या है उससे पहले ही अलीगढ़ को पूरी दुनिया से काट दिया गया। सब कुछ अचानक हो रहा था। इंटरनेट सेवाएं अचानक बन्द कर दी गईं जो लगातार 6 दिन बन्द रहीं। साधारण मेसेज भी जाना बंद हो गए कॉल लगना बन्द हो गयी। अब हम उस जगह थे जहां हमारी खबर दुनिया को नहीं पहुंच सकती थी और उस मंज़र का सामना हमें अकेले करना था। दिल में एक बार आया कि मर गए तो लोगों को पता कैसे चलेगा और फिर हंस दिए।

रात के 12 बज रहे थे और बेहद ज़ोरदार शोर सा मोहल्लों से उठा सब अपने घरों से बाहर आ गए। मर्द चीख रहे थे कि हमारे एएमयू पर हंमला हुआ है। हमारे बच्चों पर हमला हुआ। जानकार बता रहे थे कि ऐसा मंज़र एएमयू में पहले कभी नहीं हुआ। रात के 12 बजे अपने घरों से बाहर और छतों पर लोग डरे बैठे थे यह सब मैंने पहले कभी नहीं देखा था। बस वो हाहाकार की आवाज़ें जो शायद स्टूडेंट्स की थीं और स्थानीय लोगों की भी कानों में गूंज रही थी।

बुज़ुर्ग बता रहे थे कि यह 91 जैसा मंज़र है,यह ख़ौफ़ 91 जैसा है। मैंने 91 तो नहीं देखा था पर वो डर आज मैंने महसूस किया था, जैसे तैसे सुबह हुई थी तो पता चला कि अलीगढ़ शहर की औरतों ने तमाम सड़को को घेर लिया है। उत्तेजक प्रदर्शन हो रहे थे,एक ही डिमांड के साथ कि जिन स्टूडेंट्स को पुलिस मारते हुए गिरफ्तार करके ले गयी है उन्हें छोड़ा जाए। एएमयू पर जो भयानक हंमला हुआ है उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। औरतें ,बुज़ुर्ग बच्चे सड़कों पर लेट गए थे। यह संख्या हज़ारों में थी…पुलिस प्रशासन आंदोलनकारियों को समझाने की नाकाम कोशिश करता रहा पर मांगो में कोई कमी नहीं आयी, जनता के आंदोलन ऐसे ही होते होंगे शायद जिन्हें क्रांति की परिभाषा तो नहीं पता होती पर दुनिया मे इंकलाब होते उन्हीं के बल पर हैं। खबर मिली कि शहर के कई इलाकों में पुलिस महिलाओं से हार गई है , वो उन्हें समझाने में पूरी तरह नाकाम है।

हमारी पीढ़ी ने अलीगढ़ में ऐसा कभी नहीं देखा था…मुझे याद है कि 16 दिसम्बर को लोगों के घरों में खाना उस तरह नहीं बना जिस तरह सामान्य दिनों में बनता है, तभी अम्मा ने मेरा कुछ समान पैक कर दिया और कहा कि मैं खाला के घर चली जाऊं,मैं हंसने लगी और डांटने भी लगी कि क्या हुआ है आपको ऐसा। सब तो अपने घरों में ही हैं आप क्यों इतना डर रही हैं। तो उन्होंने अचानक कहा तुम्हें नहीं पता मैंने 91 देखा है। मैंने 91 में देखा था, बस सुना था, पढा था पर उस दिन अम्मा की आंखों में वो देख भी लिया। कमोबेश यही हाल तमाम लोगों का था, नई पीढ़ी नहीं डर रही थी पर गुजरी पीढ़ी अजीब से सदमे में थी।

पूरा शहर आंदोलन की ज़द में था। ज़्यादातर इलाकों में लोग सड़कों पर उतर गए थे।देखते ही देखते सीएए आंदोलन एक दिन के अंदर एएमयू और जामिया पर हमले के ख़िलाफ़ खड़ा हो गया था। सँघर्ष चला पुलिस ने शर्तें मानीं । पर 6 दिन लगातार यह गहमा गहमी बनी रही और 6 दिन तक लगातार अलीगढ़ को दुनिया से काट कर रखा गया। हालात को काबू करने के लिए यह ज़रूरी रहा होगा शायद…

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Deeba Niyazi