हिना जुनी पंडित

16 मई 2014 बुरी तरह हार कर, गोरखपुर की दूसरी सीट बांस गांव से एक असफल चुनाव लड़वाकर अन्ततः में दिल्ली वापस आ गयी। वह वर्ष कई बुरी यादों को सहेजे है। जिनमें सबसे बुरी थी मेरी वजूद के बीस वर्षों में हो रहे ‘‘ध्रुवीकरण’’ को देखना और झेलना। इस ‘‘ध्रुवीकरण’’ का असर न सिर्फ चुनावी नतीजों पर पड़ा वरन् हमारे समाज में, हमारे आस-पास भी ऐसे तुफान उठने लगा जैसे हम कभी एक भारतीय थे ही नहीं।

2014 के चुनावी नतीजे इतने बुरे नहीं थे जितना बुरा उस नतीजे को पाने के लिए किये गये प्रयास थे। आज़ाद भारत में पहली बार चुनाव जीतने के लिए एक धढ़े ने ध्रुवीकरण किया, भारत के संविधान की आत्मा जो ‘‘अनेकता में एकता’’ की बात कहती है पर चोट की। उन्होंने एक राष्ट्र, धर्मनिपेक्षता की बात को नकारते हुए ‘‘हिन्दु राष्ट्र’’ के विचार को भुनाया उनका विचार बिकाऊ तो था पर ग्रहणात्मक (रोका जा सकने वाला ) था। पर वो सफल हुए।

देखा जाए तो यह स्वतंत्र भारत में हुआ एक बहुत बुरा और दुखद घटनाक्रम है। क्योंकि यह भारत के मूल विचार को नकारता  है। अर्धम है यह, हमने अपनी आजादी की लड़ाई उन लोगों के खिलाफ लड़ी जो हमें बांट कर राज करते थे और 2014 में आये सत्ताधारी, अंग्रजों की यही नीति अपना रहे हैं। वो हम भारतवासियों को लड़वाकर हमें बांट कर सत्ता पर काबिज हुए और रहना चाहते हैं। ये भारत गणराज्य के बिल्कुल खिलाफ है।

इन्होंने लोगों में इतनी नफरत भड़काई कि आम जनता आपस में लड़ने – मारने पर उतारू हो गई। पिछले पांच वर्षों में हमारे सामने ‘‘ मोब लिचिंग’’, घेराव, प्राण निकलने तक हिंसा करने के अनगिनत मामले सामने आये हैं।

इस नफरत और घृणा ने हमें इतना घेर लिया है कि हर कोई किसी न किसी स्तर पर ये झेल रहा है। लोग ‘‘भिन्नता’’ को स्वीकार भी नहीं कर पा रहे हैं। मैं खुद इस नफरत का शिकार हो रही हूँ। खास कर मेरे नाम को लेकर। मेरे पहले नाम से लगता है कि मैं कोई मुसलमान हूँ । दूसरे से लगता है कि कोई इसाई या मराठी और आखिरी से लगता है हिन्दु ब्राह्मण, पूरे नाम से लगता है कि शायद में कश्मीरी पडिंत हूँ। कुछ समझते है मैं कोई धर्म परिवर्तित मुसलमान हूँ जिसने किसी हिन्दु से शादी की है। इन ‘‘ गल्प’’ के तर्कों से, पिछले पांच वर्षों से गाली-गलौज और नफरत का शिकार हो रही हूँ। पर ये सिर्फ मेरी समस्या नहीं है ऐसा सबके साथ हो रहा है जो भी सत्ता धारियों के ‘‘ ऐजन्डे’’ को नहीं मान रहा उसके साथ, फिर चाहे वो कोई आम मजदूर हो, पत्रकार हो, स्कूल के प्रोफेसर हो या पुलिस वाले ही क्यो न हों। गत वर्षां में हमने देखा व सुना कि पत्रकार गौरी, लंकेश को उनके घर के दरवाजे पर गोलियो से भून दिया गया। गरीब को शक के बिना पर मार दिया, प्रसिद्ध हस्तियों जैसे कलाकार नसुरुद्दीन शाह को बुरा भला कहा गया। सेम पित्रोदा को सवाल पूछने के लिए टार्गेंट किया। उनके देश के प्रति किये गये योगदान को भुलाकर, उन्होंने धर्म, जाति आदि के बारे में झूठ फैलाया गया। जो भी सच साथ दे, सवाल करें उसे देश द्रोही के प्रमाणपत्र बाटें जा रहे है।

उम्मीद की किरन

ऐसे में किससे उम्मीद लगाई जाये? भारत के एक आम नागरिक के लिए क्या रास्ते बचते है? उम्मीद की एक किरन नजर आती है, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के वक्तव्यों में । देश और पूर्ण स्वराज जो हमें अनेको कुर्बानियों से, प्यार और सदभावना से सौपा गया था महात्मा गांधी जी के अहिंसा के रास्ते पर चल कर हमने जो आजादी पाई थी उसे अब एक गांधी ही पुनः स्थापित कर सकता है. राहुल वही गांधी है।

उम्मीद की ये पहली किरण हमे दिखाई दी 20 जुलाई 2018 को भारत की संसद में। अमेठी के सासंद राहुल गांधी देश के विभिन्न मुद्दों पर सवाल कर रहे थे‘‘ साथ ही अपनी पार्टी पर सत्ताधारियों द्वारा लगाये जा रहे बेबुनियाद इल्जाम का भी ज़िक्र कर रहे थे, जैसे सत्ता में आज भी कांग्रेस पार्टी ही है। पर सारे देश को अचमंभित करने वाला पल आया तब जब राहुल ने भरी संसद में सब के सामने संसद की कार्यवाही का लाइव प्रसारण होते समय अपने भाषण को खत्म करने के तुरन्त बाद आगे बढ़ कर देश के प्रधानमंत्री और Rahul Gandhi के खिलाफ एक संवैधनिक पर पर रहते हुए सबसे ज्यादा ज़हर उगलने वाले, बनारस के सांसद श्री नरेंद्र मोदी को गले लगाया।

सारा देश, संसद भवन, दर्शक अचभिंत हुए पर कोई खुद को ताली बजाने से नहीं रोक पाया। किसी को राहुल गांधी कि  ये हरकत अच्छी लगी, कुछ को नहीं। राजनीतिक पंडितों ने अपनी अपनी तरह से इसके मायने निकाले, व्याख्या की लेकिन उस दिन Rahul के व्यक्तित्व की खूबसूरती किसी से छिपी नहीं। नफरत की आग में झुलसते देश के संसद भवन से ये घटना एक पल को अविश्वसनीय अकाल्पनिक परन्तु बहुत सुखद महसूस हुई। घृणा के बीच देश के राजनेता को प्यार और ममता की ऐसी मिसाल पेश करते देखना सुकून दे गया। कांटो के बीच फूल खिलना वीरता और एश्वर्यता का प्रतीक है। राहुल  ने वीरता और एश्वर्यता दोनों दिखा दी।

सहज-सरल गांधी

किंतु ये पहली बार नहीं है जब राहुल ने ऐसा कुछ किया हो। हालांकि उनके द्वारा किये गये नेक काम कभी ज्यादा सामने आते नहीं और न ही चर्चा का विषय बनते पर उनकी सहज सरल स्वभाव की झलक पहले भी देखने को मिलती रही है।

साल 2015 में असम में कुछ यूवा विद्यार्थियों के साथ चर्चा में एक विद्यार्थी चन्दना ने पूछा ‘‘ मेरे साथ के सभी युवा राजनीति को बुरा समझते है राजनीति से घृणा करते है। आपको नहीं लगता ऐसा होना सही है? क्या कारण है इसका और क्या निवारण है? ’’ राहुल  ने चन्दना से कहा कि ‘‘ राजनीति को आम जिन्दगी से अलग नहीं कह सकते आपके हिसाब से राजनीति क्या है?’’ मेरे हिसाब से राजनीति लोगों की सेवा करने का, समाज और देश के विकास करने का माध्यम है. अगर आप राजनीति में सिर्फ और सिर्फ जीतने की मंशा से आते हैं, तो ये गलत है। राजनीति सत्य के लिए लड़ने को माध्यम होना चाहिए। सत्य का पालन के लिए होने चाहिए इस तरह जो भी युवा सत्य के लिए लड़ रहा है. सत्य के धर्म का पालन कर रहा है, वो राजनीति कर रहा है।

इन वक्तव्यों से पता चलता है कि राहुल कोई सत्ता के लिए लालची इन्सान नहीं बल्कि समाज के देश वासियों के लिए विकास के लिए खुद धन्य मानते है।

राहुल के खुद को साल 2012 में दिल्ली में हुए भयावाह ‘निर्भया’ काण्ड के कई सालों बाद खबर सुनने को मिली कि ‘ निर्भया’ के एकलौते भाई कि पढ़ाई कि सारी जिम्मेदारी राहुल ने ली थी और आज वो एक सफल पायलट है।

मजबूत नेता

इस सबका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि RG कोई कमजोर नेता हैं, समय-समय पर उन्होंने आतंक वाद और हिंसा का कड़ा रुख अपनाने की बात साफ की है जनवरी 2019 में दुबई में हुए एक सम्मेलन में उन्होंने कहा  ‘‘मैं अहिंसा में विश्वास करता हूँ पर मैं भारत के आम नागरिकों के खिलाफ हो रहे आंतकवाद को बिल्कुल नहीं सहूंगा।

RG ( राहुल गांधी) ने अक्सर आतंकवाद की निंदा करते हुए राजनीतिक रूप से उसका हल निकालने की वकालत की है, न कि सिर्फ खोखले प्रयास करने की। आतंकी घटनाओं को रोकने में 100 प्रतिशत सफलता तो नहीं मिल सकती पर इस समस्या का समाधान अवश्य किया जा सकता है, जरूरी ये है कि हम इन घटनाओं पर क्या प्रतिक्रिया देते है। मुम्बई आतंकी हमले के बाद हमारी सरकार ने पाकिस्तान को विश्वपटल पर अकेले कर दिया था। ये एक बड़ी राजनीतिक रणनीति थी इससे आतंकी हमलो में कमी भी आई। कश्मीर के हालात सुधर रहे थे। पर अभी की सरकार, आतंकवाद  को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाती. ए०डी०- होक रुख अपनाती है।

स्वतंत्रता और मूल सिद्धांतों के रक्षक

इसी साल जनवरी में एक बार फिर कश्मीर में जाने माने अखबार ‘‘राइनिंग कश्मीर’’ निकालने वाले और आवाम की आवाज़ के मुद्दों को उठाने वाले पत्रकार सुजात बुखारी को इफ्तार में जाते हुए दहशतगर्दों ने गोली मार कर उनकी जान ले ली। सारे देश के नेताओं में से सिर्फ राहुल ने इस घटना पर दुख प्रकट किया इससे पता चलता है कि RG अपने सिद्धांतों को लेकर अटल हैं और आतंकवाद की घटनाओं को लेकर रुख कड़ा है। और वो ‘‘ बोलने की आजादी की वकालत करते हैं।

इसी तरह साल 2018 में एक वेब सीरीज आई थी ‘‘ सेक्रेड गेम्स’’  नाम की जिसमें पूर्व दिवंगत प्रधानमंत्री  और राहुल गांधी के पिता को कुछ विवादस्पत तरीके से पेश किया गया था, इस बात से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में बहुत रोष था और वो लगातार इस वेब सीरीज़ को बन्द करने की मांग कर रहे थे। इसी समय RG ने ट्वीट करते हुए कहा कि ‘‘बी०जे०पी० और आर०एस०एस० अभिव्यक्ति की संवैधानिक आजादी को नियंत्रित करना चाहती हैं, हम एैसा नहीं करेंगे मेरे पिता देश के लिए जिये और मरे थे इसी फिल्म का कोई काल्पनिक चरित्र इस सत्य को नहीं बदल सकता’’ इस घटना क्रम से साबित होता है कि राहुल को संविधान और अधिकारों की रक्षा करने के लिए उन पर विश्वास किया जा सकता है।

आधी आबादी पूरा हक़

ये शब्द पहली बार जब राहुल गांधी  से सुने तो ठीक से मतलब भी नहीं समझ आया, कैसे आता ? पुरुष प्रधान इस समाज में न अभी तक महिलाओं को इस बात का ज्ञान हुआ, कि वो भारत की कुल आबादी का आधा हिस्सा है न ही इस बात का अहसास हुआ कि उनके अधिकार भी होने चाहिए। एक पुरुष प्रधान देश और समाज में पता नहीं कैसे राहुल ने महिलाओं अधिकार की आवाज बनने की हिम्मत जुटाई।

राहुल गांधी के कहने के बाद ही ये विचार आया जिस देश बनाने में सवारने में हम आधा और कई बार उससे भी ज्यादा योगदान दे रहे है। उस देश के संसद भवन की 545 सीट में से 33 प्रतिशत हमारे लिए क्यों नहीं आरक्षित होनी चाहिए। एक बार फिर 2015 के  के राहुल के बयानों पर नजर डालें तो उन्होंने कहा था कि महिलांऐ इस देश की रीढ़ है, और उन पर गैस सिलिंडर के अतिरिक्त बड़े दामों का बोझ नहीं डालना चाहिए। देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के सबसे बड़े नेता को महिलाओं की इतनी छोटी पर बहुत महत्वपूर्ण जरूरत को समझते हुए पहले किसी नेता को नहीं देखा। महिला नेत्रियों को भी नहीं।

दूरदर्शी

भारत देश की आज की सबसे बड़ी समस्या है – बेरोजगारी, वर्ष 2018 के शुरुआत में आई रिपोर्ट और खबरो के मुताबिक पिछले 45 सालों में भारत में सबसे अधिक जरूरी है। लेकिन RG इस बात को 2015 से ही पूरज़ोर तरीके से उठा रहे हैं। हर मंच, हर रैली, हर सभा में RG ने इस बात को बार-बार  दोहराया है ‘‘ चाइना हर 24 घंटे में 4500 नौकरियां दे रह है, इंडिया में 400 भी नहीं निकल पा रही हैं।’’  राहुल ने अनेकों  तरीकों से ये बात कही है।

2015, 16, 17, 18 से 2019 तक भी राहुल  ने सीधे-सीधे प्रधान मंत्री मोदी जिन्होंने हर साल 2 करोड़ रोज़गार देने का वादा किया था लगातार सवाल पूछे हैं। मोदी हर साल सिर्फ 1 लाख नौकरिया दे पा रहे हैं। मोदी जी भारत में किसी भी युवा से पूछिये  क्या करते हो तो कहता है कुछ नहीं, ऐसा बेरोजगार भारत देश दिया है मोदी ने।

वो बात करते थे मेक इन इंण्डिया, स्टार्ट अप इंण्डिया, सिट डाउन इंण्डिया, लुक लेफ्ट इंण्डिया, लुक राइट इंण्डिया पर सच्चाई ये है कि सिर्फ 1 लाख यूवाओं को भी हर साल नौकरियां दे पा रहे है। राहुल ने कहा इस समस्या के लिए कांग्रेस  का फार्मूला तय है, कि यदि 2019 में उनकी सरकार आती है तो वो उन सभी कल्याण कारी योजनाओं को फिर शुरू करेंगे जिन्हे मोदी सरकार ने बंद कर दिया है। साथ ही कई नए रोजगार के अवसर पैदा करेंगे। कांग्रेस के घोषणा पत्र ‘‘ हम निभायेंगे ’’ में भी वादा किया गया है कि यदि 2019 में कांग्रेस की सरकार आती है, तो मार्च 2020 तक सभी रिक्त सरकारी पदों को भर दिया जायेगा। साथी ही कांग्रेस किसानों को ऋण मुक्त, महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण, 3 साल तक युवाओं को स्वरोजगार करने के लिए कर से मुक्ति और सरल जी०एस०टी० कि बात करती है।

राहुल का भारत

ये बताना भी जरूरी है कि कांग्रेस के ‘‘गरीबी पर वार, 72000 हर परिवार’’ जैसी महत्वाकांक्षी व मूल जतनो तक फायदा पहुंचाने वाली योजना भी राहुल गांधी के ही अपनी सोच है जो वो इस देश के लिए रखते है।

एक बार राहुल से किसी ने पूछा भारत के बारे में उनकी क्या सोच है? उन्होंने कहा, ‘‘ मेरे लिए भारत अलग-अलग रंग, खुशबू और सुंदर सहज हुए एक गुलदस्ता है।, जिसका महत्व ही उसकी अनेकता में एकता से है। यदि कोई एक फूल ही पूरा गुलदस्ता बनाना चाहे तो ये गुलदस्ता (भारत देश) ही बेमानी हो जायेगी’’।

मौजूदा खतरों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि राहुल जैसा नेक दिल, सही सोच, दूरदर्शी इन्सान को आगे बढ़कर नेतृत्व करने की जरूरत है इसी में देश की भलाई है।