सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की जांच सीबीआई करेगी। इससे बहुत लोग खुश हैं। आइए देश की इस मशहूर और सम्मानित जांच एजेंसी और उसके संचालकों से संबंधित कुछ तथ्यों पर गौर करें। लपेटने – फंसाने वाली सीबीआई का उपयोग इंदिरा गांधी से लेकर अमित शाह, बीएसएफ के मौजूदा डीजी राकेश अस्थाना और पी चिदंबरम तक को फंसाने के लिए किया गया है। तमाम मामले अंत तक नहीं पहुंचे। अधिकारियों के मनमाने तबादले पर रोक नहीं लगी फिर भी सीबीआई की साख बनी हुई है। मेरा बहुत पुराना आईडिया है अपराध सीरियल बनाने का – सीबीआई की कब्रगाह से।

सीबीआई के एक मामले में इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने वाले उस समय के सीबीआई डायरेक्टर, आईपीएस अधिकारी (अब रिटायर) निर्मल कुमार सिंह ने अपनी पुस्तक द प्लेन ट्रुथ (1996) की भूमिका में लिखा है, “…. 10 वर्ष के अंतराल पर मैं जब दुबारा सीबीआई में आया तो मुझे लगता था कि इतिहास शायद न दुहराया जाए और मैं आराम से काम कर पाउंगा। पर होना कुछ और ही था। दस वर्ष की अवधि में स्थितियां काफी बदल गई थीं। ….. कुल मिलाकर पात्र तो बदल गए थे पर मूल मुद्दे वही थे। इस बार मुझे वीपी सिंह के बाद प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर और विधि मंत्री डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी से असुविधा हुई खासकर चंद्रस्वामी से संबंधित मामले में। मुझे सीबीआई से निकाल दिया गया। ….. मैंने कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया। ….. जो लंबी कानूनी लड़ाई चली उसका अपना नुकसान हुआ ….. बेशक यह लड़ाई लड़ने लायक थी।“ लेकिन सीबीआई या सरकार में कुछ नहीं बदला है। कोई 24 साल बाद भी।

1997 से पहले सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति और उन्हें हटाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास सुरक्षित था। केंद्र सरकार कभी भी डायरेक्‍टर को हटा सकती थी। यही वजह है कि सीबीआई पर सरकार की कठपु‍तली होने के आरोप लगते रहे। विपक्ष ने कई बाद सरकार सीबीआई के दुरुपयोग के भी आरोप लगाए हैं। विनीत नारायण मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक के कार्यकाल को कम से कम दो साल का कर दिया, ताकि डायरेक्टर केंद्र सरकार के दबाव से मुक्त हो सके।

अब सीबीआई के कुछ काम

9 मार्च 2011 को सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति फर्जी एनकाउंटर केस में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीबीआई ने कहा था कि अमित शाह धमकी देने और जबर्दस्ती करने वाला गैंग चलाते हैं। बाद में सीबीआई कोर्ट ने अमित शाह को इन मामलों में राहत दे दी। तब सीबीआई ने कहा था कि शाह का गैंग नेताओं, पुलिस और क्रिमिनल का गठजोड़ है। सीबीआई ने तब जस्टिस पी. सदाशिवम और जस्टिस बीएस चौहान की बेंच के सामने कहा था कि शाह गुजरात में राजनीति, पुलिस और अपराधी के गठजोड़ से जबरन वसूली और धमकी देने का रैकेट चलाते हैं। तब अमित शाह के वकील राम जेठमलानी ने सीबीआई की इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई थी। (30 दिसंबर 2014, navbharattimes.indiatimes.com)

जज को ईनाम

विपक्ष के तमाम एतराजों के बावजूद केंद्र सरकार ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी. सदाशिवम को केरल का राज्यपाल नियुक्त कर दिया। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में यह सूचना दी गई कि केरल की राज्यपाल शीला दीक्षित का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है और उनकी जगह सदाशिवम को यह जिम्मेदारी दी जा रही है। 65 वर्षीय सदाशिवम देश के पहले मुख्य न्यायाधीश हैं जिन्हें राज्यपाल के पद पर नियुक्ति दी गई है। इसके अलावा वर्तमान एनडीए सरकार की ओर से राज्यपाल बनाए गए वह पहले गैर राजनीतिक व्यक्ति हैं। (03 सितंबर 2014, amarujala.com)

भाजपाई गृहमंत्री की कार्यशैली

उच्च स्तर पर हुई बैठकों के बाद भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव लोक रंजन ने एक ऑर्डर जारी किया जिसमें सीबीआई में ज्वाइंट डायरेक्टर के पद पर काम कर रहे एम. नागेश्वर राव को तुरंत प्रभाव से एजेंसी के डायरेक्टर का कार्यभार संभालने का आदेश दिया गया। यानी सीबीआई के डायरेक्टर रहे आलोक वर्मा की छुट्टी। वही आलोक वर्मा जिनके कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘ब्लू-आइड बॉय’ बताए जाने वाले राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ साज़िश और भ्रष्टाचार के मामले में केस दर्ज हुआ था और मामले की जांच हो रही थी। राकेश अस्थाना हाल तक सीबीआई में नंबर टू पर थे। ( bbc.com, 24 अक्तूबर 2018 )

सरकारी कार्रवाई भी जारी

सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मुकदमे से नेता, व्यापारी और बड़े अफसरों पर आरोप भले ही खारिज हो चुके हैं लेकिन जांच से जुड़े अधिकारी अब भी अपनी जांच के तथ्यों पर कायम हैं और अदालत में बाकायदा अपना बयान भी दर्ज करवा रहे हैं। ऐसे ही एक जांच अधिकारी आईपीएस संदीप तामगड़े ने अदालत में बताया कि सोहराबुद्दीन और तुलसी फर्जी मुठभेड़ राजनेता और अपराधियों की साठगांठ का परिणाम था। संदीप तामगड़े ने अदालत में अपनी जांच में पाए गए तथ्यों को दोहराया. सुबह 11 बजे से शाम साढ़े सात बजे तक चली सुनवाई में जांच अधिकारी ने यह भी बताया कि बीजेपी नेता अमित शाह, आईपीएस डीजी वंजारा, राजकुमार पांडियन, दिनेश एमएन पूरे हत्याकांड के मुख्य साजिशकर्ता थे। जांच में मिले सबूतों के आधार पर ही इन सभी के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था। (22 नवंबर 2018, khabar.ndtv.com)

फिर भी बाजी पलट गई

2010 में जिस सीबीआई ने अमित शाह को तड़ीपार किया था, गुजरात में घुसने का अधिकार छीन लिया था, उस अमित शाह के आगे अब सीबीआई ही क्या देश की हर शीर्षस्थ जांच एजेंसी के बड़े से बड़े शूरमा नमस्तक होंगे। इसे लोकतंत्र की ताकत कहें या हिंदू मानसिकता वाली राजनीति की माया, पर जो भी सच यही है कि आज से अमित शाह देश के सबसे ताकतवर मंत्री होंगे। गौरतलब है कि अमित शाह सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी क़ौसर बी के फर्जी एनकाउंटर मामले में आरोपित रह चुके हैं। जज लोया की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत मामले में भी शक की सुई अमित शाह की तरफ घूमी। इसके अलावा भी कई अन्य मामलों में वे आरोपी रहे हैं। हालांकि अब उन्हें सारे मामलों में क्लीनचिट मिल चुकी है। 2010 में सीबीआई ने चार्जशीट में अमित शाह पर आरोप लगाया था कि वह गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख के साथ वे एक फ़िरौती रैकेट में शामिल थे। (31 मई 2019, janjwar.com)

बाजी पलटने का विस्तार

9 साल में इतिहास ने ऐसी करवट ली है कि जो जेल में था वह आज गृहमंत्री है और जो गृहमंत्री था वह आज सीबीआई के शिकंजे में। वो साल था 2010 और ये साल है 2019…तब के गृहमंत्री आज गिरफ्तार हैं और तब के गिरफ्तार गुजरात के गृहमंत्री आज देश के गृहमंत्री हैं। चिदंबरम 29 नवंबर 2008 से 31 जुलाई 2012 तक देश के गृह मंत्री रहे थे। उस वक्त सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर का मामला चरम पर था और इसी मामले में गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह पर कार्रवाई की गई थी। 25 जुलाई 2010 को सीबीआई ने अमित शाह को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। (indiatv.in, 22 अगस्त 2019)

राजनीतिक बदले की कार्रवाई ?

पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को सीबीआई ने आखिरकार गिरफ्तार कर लिया है। देर रात उन्हें सीबीआई मुख्यालय ले जाया गया। चिदंबरम को आईएनएक्स मीडिया मामले में गिरफ्तार किया गया है। उन्हें सीबीआई कोर्ट में पेश किया जाएगा। सीबीआई उनकी तलाश में तीन बार उनके घर गई। इसके पहले चिदंबरम कांग्रेस मुख्यालय में मीडिया से मुखातिब हुए। चिदंबरम ने प्रेस कॉन्फ्रेस कर खुद को निर्दोष बताया और वहां से अपने घर निकल गए। इसके बाद सीबीआई की टीम भी उनके घर पहुंची। दरवाजा न खुलने पर टीम ने दीवार फांदकर अंदर घुसी। (economictimes.indiatimes.com, 22 अगस्त 2019 )

चिदंबरम को 105 दिन बाद जमानत मिली। मामला जो है सो है पर सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर कर जमानत पर पुनर्विचार करने की अपील की जिसे खारिज कर दिया गया। आईएनएक्स मीडिया मामला रिश्वत देने का मौखिक आरोप है। मामले में दम होता तो जमानत याचिका पर सुनवाई होती, जमानत खारिज भी हो सकती थी। पर …. (मेरी टिप्पणी)

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें आईएनएक्स मीडिया मामले में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की जमानत पर पुनर्विचार करने की अपील की गई थी। ( amarujala.com, 04 जून 2020)

सीबीआई अमित शाह के मामले में या तो पहले गलत है या बाद में गलत है। एनके सिंह ने पनी किताब में 10 साल बाद सरकार बदलने पर स्थिति बदलने की उम्मीद जताई थी पर स्थिति और खराब हुई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निदेशक की नियुक्त से लेकर अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें बचाने के मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप साफ नजर आ रहा है। इसके बाद भी लोगों को उम्मीद है कि सीबीआई जांच करती है और वह भी निष्पक्ष। कहने की जरूरत नहीं है कि लोगों की राय मीडिया बनाता है। जिस सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की थी अब उसकी हत्या की गई है और उसके जो रिश्तेदार उसके वैसे करीबी नहीं थे उन्हें फर्जी वीडियो के जरिए करीबी बताया जा रहा है जो बिना शादी किए उसके साथ रहती थी उसपर हत्या का शक है और इस पूरे मामले में किसका जीवन, किसका कैरियर, किसका चरित्र, और किसे परवाह। समझने वाले समझते हैं कि सब बिहार चुनाव को प्रभावित करने के लिए है। सच राम जानें।