रैपिड एंटी बॉडी टेस्ट की खरीदी में बहुत बड़ा घपला पकड़ा गया है और यह घपला कांग्रेस या अन्य किसी विपक्षी दल ने नही पकड़ा है। बल्कि तीन कंपनियों के आपसी विवाद को कोर्ट में ले जाने, ओर वहाँ सुनवाई होने के दौरान पकड़ा गया है। हम शुरू से ही कहते आए है, कि यह न खाऊँगा ओर न खाने दूँगा कहने वाली की सरकार नही है। बल्कि तू भी खा ओर मुझे भी खिला वालो की सरकार है। आज यह बात साबित हो गयी है।

अब पूरा मामला आसान शब्दों में समझिए – दरअसल ICMR जो कोविड 19 से लड़ रही सबसे प्रमुख सरकारी नोडल एजेंसी है। उसने कोरोना की रैपिड टेस्ट किट खरीदने के लिए रेयर मेटाबॉलिक्स से 30 करोड़ का समझौता किया। यानी पहले ही ICMR ने अपने आपको बाँध लिया कि जो भी टेस्ट किट आएगी रेयर मेटाबॉलिक्स के जरिए ही आएगी।

अब रेयर मेटाबॉलिक्स ने एक और कम्पनी को अपने साथ मे मिलाया जिसका नाम है आर्क फार्मास्यूटिकल्स । इन दोनों कंपनियों ने मिलकर कोविड 19 टेस्ट किट को भारत में लाने के लिए एक तीसरी कम्पनी मैट्रिक्सलेब को ठेका दिया, मैट्रिक्स लैब ने कुल 7 लाख 24 हजार कोविड-19 टेस्ट किट चीन से मंगा ली।

दोनों के बीच समझौता यह हुआ था कि रेयर मेटाबॉलिक मैट्रिक्सलेब को शुरुआती 5 लाख किट के पैसे का भुगतान करेगी। 5 लाख किट की कुल कीमत बनी 12 करोड़ 25 लाख। रेयर मेटाबॉलिक के मुताबिक उन्होंने किट की कुल कीमत के बराबर यानी 12 करोड़ 25 लाख की कीमत मैट्रिक्स लैब को अदा भी कर दी है। मैट्रिक्स लैब का कहना है कि उसके मुताबिक रेयर मेटाबॉलिक 5 लाख किट की पूरी कीमत जो 21 करोड़ होती है, वह पहले उपलब्ध कराए।

रेयर मेटाबॉलिक का कहना था, करार के मुताबिक किट की कीमत का पैसा पहले देना था और बाकी जो मुनाफे का पैसा था, वह जब आईसीएमआर जिसको कि रेयर मेटाबॉलिक्स को सप्लाई करनी थी, उससे पैसा मिलने के बाद में दिया जाना था। लेकिन मैट्रिक्स लैब का कहना है, कि उनको पूरा 21 करोड़ रुपए शुरुआत में ही मिलना था जो अब तक रेयर मेटाबॉलिक्स नहीं दे रही है।

यहाँ से इन दोनों पक्षों मे विवाद हो गया और मामला दिल्ली हाईकोर्ट के सामने आ गया। सुनवाई में सारे तथ्य सामने आ गए और पता चला कि मैट्रिक्स लैब ने 3 डॉलर की कीमत वाली रैपिड टेस्ट किट मंगाई है, जिसकी लगभग 225 रुपये होती है । और इस हिसाब से उसे 75×3× 5 लाख= 11 करोड़ 25 लाख, और इसमें अगर भारत तक लाने का खर्चा भी जोड़ दिया जाए जो कि 5 लाख किट का करीब 1 करोड़ रुपये बनते हैं तो भी कुल कीमत बनती है 12 करोड़ 25 लाख। जो रेयर मेटाबॉलिक्स ने मैट्रिक्स लैब को दे दिए है, लेकिन उसे अब 21 करोड़ रुपये ही चाहिए।

दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अब यह तथ्य भी आ गया कि भाड़ा मिलाकर जो कि लगभग 245 रुपये की पड़ रही है, उसे रेयर मेटाबॉलिक्स 600 रु की ICMR को बेच रहा है। चूंकि आईसीएमआर ने रैपिड टेस्ट किट की जांच पर सवाल उठने के बाद फिलहाल के लिए रैपिड टेस्ट पर रोक लगा दी। इस वजह से अभी आईसीएमआर से कंपनी को जो पैसा मिलना था वह नहीं मिला। यही कारण है कि अभी तक मैट्रिक्सलेब को उसके मुनाफे का करीबन 8.75 करोड़ रुपए नहीं दिए जा सके हैं, इसलिए यह सारा झगड़ा शुरू हुआ।

इस घटनाक्रम से इस बात की पोल खुल गयी कि आईसीएमआर रैपिड टेस्ट किट की मूल कीमत से करीबन ढ़ाई गुना की कीमत में ये किट भारतीय कंपनियों से ही खरीद रहा है। अब यह कितना बड़ा घोटाला है, आप स्वंय समझिए।

कुछ लोग यह भी तर्क दे सकते हैं कि ऐसा तो व्यापारी करता ही है। लेकिन यहाँ मौका व्यापार वाला नही था किसी की जान बचाने वाला था ।  कुछ दिनों पहले ऐसे ही जब थर्मल स्कैनर की बड़े पैमाने पर काला बाजारी होने लगी और सरकार को भी व्यापारी यह स्कैनर महंगे में सप्लाई करने लगे, तब गुरुग्राम के जिला ड्रग कंट्रोलर और पुलिस ने छापेमारी कर 11 अप्रैल को 5800 थर्मल स्कैनर पकड़े ,कंपनी संचालक को मजबूरन आयात के दस्तावेज दिखाने पड़े, तो जिला उपायुक्त के आदेश पर इन्हें प्रिंट रेट पर सरकार ने ही अपने लिए खरीद लिया गया। अब सरकार स्वास्थ्य विभाग के जरिए जिलों में इनका वितरण कर रही है।

यानी वहाँ ड्रग कंट्रोलर काम कर सकता है, लेकिन यहाँ नही कर सकता क्योंकि उसके हाथ सरकार ने ही उसके बाँध रखे होंगे? तीन कंपनियों में डिस्प्यूट नही होता तो यह सब हमे पता भी नही चल पाता। अब तो मानेंगे कि यह घोटालेबाज सरकार है?

चीन से आयातित रैपिड टेस्ट किट में हुई मुनाफाखोरी सामने आ गयी, तीन कम्पनियो के बीच डिस्प्यूट हुआ और लेन देन की सारी तहे खुल गयी। दिल्ली हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के जरिए सारा मामला अब पब्लिक डोमेन में आ गया है। मैंने अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में यह पूरा किस्सा लिखा तो एक कमेन्ट करने वाले ने लिखा कि कोई खास बात नही है बस 15-20 करोड़ का ही घोटाला था, देश ने तो UPA सरकार में बहुत बड़े बड़े घोटाले देखे है। मोटे तौर पर बात सही है, कि पैसे का नुकसान बहुत बड़ा नही है। लेकिन जिस बात का नुकसान हुआ है उसे शायद हम ठीक से समझ नही पाए हैं।

सबसे बड़ा नुकसान हुआ है समय का, और वो भी बेहद महत्वपूर्ण समय का, हम कोविड 19 के बीच भँवर में फंसे हुए हैं। मान लीजिए कि अगर यह 10 लाख किट सही निकल जाती तो अब तक आराम से 2 से 3 लाख टेस्ट हो गए होते और रैपिड टेस्ट किट से हम हॉट स्पॉट में बीमारी के फैलाव का ठीक ठीक अंदाजा लगा चुके होते, इससे बीमारी से लड़ने में हमे बहुत मदद मिलती। लेकिन अब उन किटो के दोषपूर्ण निकलने से बीच बीमारी के बहुत कीमती समय बर्बाद हो गया।

दूसरा सबसे बड़ा नुकसान हुआ है इज्जत का । कल तक तमाम नेता और मीडिया चैनल चीन को खराब सामान भेजने का दोषी बता रहे थे, आज दूध का दूध और पानी का पानी हो गया, कि हमारी ही कम्पनी ने कमीशनबाजी के चक्कर मे हल्के स्तर की किट मंगवाई। अगर हम 600 रु का माल खरीद रहे हैं, तो असल मे कमीशनखोर व्यापारी हमे 225 का माल टिका रहे हैं। अब आप कैसे दावा कर सकते हो कि आपको 600 रु वाली क्वालिटी मिलेगी?

आखिर बात तो चीन के राजदूत की ही सही निकली न ! जिसने मेडिकल सप्लाई के खराब निकलने पर टका सा जवाब दिया था, कि ‘जो मँगाओगे वही तो भेजेंगे चीन वाले’, इस घटना से हमे अंतराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है। तीसरा सबसे बड़ा नुकसान हुआ है हिम्मत टूटने का, किटों के खराब निकलने से हमारे मन मे टेस्ट के प्रति शंका ने ही जन्म ले लिया है। अब शायद नयी ओर बेहतर किट मिलने पर भी स्वास्थ्य कर्मी उतने उत्साह से काम नही कर पाए, ICMR तो इतना निराश हुआ है कि उसने रेपिड टेस्ट किट के इस्तेमाल पर ही रोक लगा दी है। जनता की भी हिम्मत टूटी है, क्योंकि टेस्ट के नतीजे हमे देर से ही मिल रहे हैं। तो कुल मिलाकर नुकसान तो हमे बहुत ही ज्यादा हुआ है, इसे सिर्फ नोटो के बंडलों से नही आंका जा सकता।