मीडिया पर पसरे घृणित सामराज्य से नफरत होने लगी है। कुछ आईटी सेल के कपूतों के द्वारा विकास दुबे जैसे हत्यारे को ब्राह्मण वीर कहकर विभत्स्यता फैलाने की कोशिश भी की गई। शायद इसी छवि को भुनाने के लिए वह महकाल के दर तक आ गया। घृणित जातिगत समीकरण-राजनीति के बल पर बाहुबली बना विकास, भूल गया कि रावण भी ब्राह्मण ही था। उसके रास्ते पर चलने पर एक दिन भले ही महाकाल को पूज ले पर उन्हीं के बनाए काल के गाल में तो जाना ही पड़ेगा। लेकिन यहां सोचना यह भी है कि क्या इस विकास का पराभव रावण की तरह होगा, या यह बाहुबली गुंड़ा । एक और नेता नहीं चाहिए, बिलकुल नहीं चाहिए।

इससे पहले विकास दुबे 2017 में एसटीएफ के द्वारा लखनऊ में गिरफ्तार हुआ था। वहां से जमानत पर छूटा उसके बाद से आज तक तांडव चालू ही था। सोचकर देखिए कितने बड़ों के हाथ होंगे इस भस्मासुर के सिर पर जो यह कानपुर में आतंक का नंगा खेल खेल सका। आठ पुलिसकर्मी शहीद हुए इस विषबेल के कारण । जिसके उगने की जमीन उसके राजनैतिक आकाओं ने तैयार की थी। अभी बहुत से फोटो आए हैं, कई और आएंगे। बड़े चेहरे – बड़े नाम धीरे-धीरे धुंधले हो जाएंगे। फिर राजनीति के अखाड़े की काजनीति चालू हो जाएगी।

यूपी का इतिहास खंगाल कर देख लीजिए, ओकांरा जैसी कई फिल्मों के प्लॉट यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे नजर आएंगें। कई नेताओं के रिकॉर्ड खंगालने के बाद कांप जाएंगे । समझ आएगा उन पर अपराध के आरोप लगे हैं, सिद्ध नहीं हुए। बस सिलसिला चलता ही जा रहा है, जिसे रोकना अब जरुरी नहीं बेहद जरुरी हो गया है लेकिन रोकेगा कौन। इन भस्मासुर को भस्म करने के लिए विष्णु के मोहनी अवतार की कल्पना बेमानी सी नजर आती है। सभी आका अपने नीचे अनेक भस्मासुर पाले नजर आते हैं। जिन्हें सिर्फ वरदान दिया जा रहा है। अब आज का यह अभय दान, जीवन दान….

सोचकर देखिए विकास दुबे यूपी-एमपी की पुलिस को चकमा देकर आराम से उज्जैन पहुंचता है। महाकाल मंदिर के द्वार पहुंचता है। 9 बजे बकायदा दर्शन के लिए वीआईपी टिकिट कटवाता है। पर्ची पर अपना नाम लिखवाता है, अरोपी मारा-मारा-भागा-भागा फिर रहा है लेकिन यहां कोई छद्म नाम नहीं, कोई छद्म वेष नहीं । सच्चाई…परत दर परत, जब सिक्योरिटी गार्ड पुलिस को खबर देता है। पुलिस आती है, आरोपी को पकड़ती है तो वो चिल्ला-चिल्ला कर बोलता हैः मैं ही विकास दुबे हूं, कानपुर वाला और इस तरह के मेलोड्रामे के बाद आठ पुलिसकर्मियों की हत्या करने वाला दुर्दांत आरोपी पुलिस की गोली से बच जाता है।

आखिर सात दिन में विकास दुबे गैंग के कई लोगों का एनकाउंटर हो चुका है तो उसकी पहली चाल खुद को एनकाउंटर से बचाना था। अब वो एनकाउंटर के भय से दूर है, कल किसी तरह राजनीति के अखाड़े में फिर से खड़े होने की कोशिश करेगा। क्योंकि इतिहास गवाह है अपराधी एक दिन चिल्लाचिल्लाकर बोलकर है, हाँ मैं ही अपराधी हूं, कर लो जो कर सकते हो। पीड़ित के पास आंसुओं के संमदर के अलावा कुछ नहीं बनता.. गद्दी पर बैठे लोगों को अपनी कुर्सी के पाएं को टेका देना वाला एक सिर और मिल जाता है । विकास दुबे के घर नहीं उस जैसे हर एक के विचारों को जमीदोंज करने की आवश्यक्ता है।

बाकि शिव…यह सच है कि शिव ने अपने परम भक्त रावण की भी रक्षा नहीं की थी तो फिर माहकाल के दर पर पहुंचे इस अधर्मी की वे क्यों रक्षा करेंगे। विकास दुबे को अपनी गति पानी ही थी, लेकिन यह भी सच है कि रावण के अंत के लिए राम चाहिए…. यहां राम

( बाकी अपराधी सिर्फ अपराधी होता है उसका किसी धर्म या जात से कोई संबंध नहीं होता यह हर आम और खास को समझना ही चाहिए। जिस तरह बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे समझा रहे हैं। उनकी बातों को समझना जरुरी है)

 

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Shruti Agrawal