कविता – मुझे कागज़ की अब तक नाव तैराना नहीं आता

कविता – मुझे कागज़ की अब तक नाव तैराना नहीं आता

तुम्हारे सामने मुझको भी शरमाना नहीं आता के जैसे सामने सूरज के परवाना नही आता ये नकली फूल हैं इनको भी मुरझाना नही आता के चौराहे के बुत को जैसे मुस्काना नही आता हिजाबो हुस्न की अब आप क्यों तौहीन करते हो किसी को सादगी में यूँ गज़ब ढाना नहीं आता फकीरों की जमातों में […]

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 गज़ल – गुज़र गई है मेरी उम्र खुद से लड़ते हुए – "ख़ान"अशफाक़ ख़ान

गज़ल – गुज़र गई है मेरी उम्र खुद से लड़ते हुए – "ख़ान"अशफाक़ ख़ान

गुज़र गई है मिरी उम्र खुद से लड़ते हुए मुहब्बतों से भरे वो खतों को पढ़ते हुए धुएं की तरह बिखरता रहा फज़ाओं में के उम्र बीत गई हवा संग उड़ते हुए बिखर गए हैं मिरे ख्वाब सह्र होते ही मैं देखता हूं सभी ख्वाब यार जगते हुए खुदा ए बंद से इतनी दुआ है […]

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