ग़ज़ल – जाउंगा कहाँ ऐ दिल तुझको छोड़ कर तन्हा

ग़ज़ल – जाउंगा कहाँ ऐ दिल तुझको छोड़ कर तन्हा

जाउंगा कहाँ ऐ दिल तुझको छोड़ कर तन्हा कैसे मैं करूं बढ़ती उम्र में सफर तन्हा   भीड़ में या मेले में मैं रहा जहाँ भी हूँ  ढूंढती रही खुद को ये मिरी नज़र तन्हा   हम सफर था जो मेरा हमकदम था जो मेरा वो चले गया मुझको आज छोडकर तन्हा   कानाफूसी करते […]

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 कविता- बेटी से माँ तक का सफर

कविता- बेटी से माँ तक का सफर

बेफिक्री से फ़िक्र का सफर रोने से खामोश कराने का सफर बेसब्री से तहम्मुल का सफर पहले जो आँचल में छुप जाया करती थी आज किसी को आँचल में छुपा लेती है पहले जो ऊँगली जल जाने से घर सर पर उठा लेती थी आज हाथ जल जाने पर भी खाना बनाया करती है पहले […]

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 ग़ज़ल- मुसव्विर हूं सभी तस्वीर में मैं रंग भरता हूं

ग़ज़ल- मुसव्विर हूं सभी तस्वीर में मैं रंग भरता हूं

हमेशा ज़िन्दगानी में मेरी ऐसा क्यूं नहीं होता जमाने की निगाहों में मैं अच्छा क्यूं नहीं होता उसूलों से मैं सौदा कर के खुद से पूछ लेता हूँ मिरी सांसे तो चलती हैं मै ज़िंदा क्यूं नही होता हरिक को एक पगली बेटा कह कर के बुलाती है मगर उस भीड़ में तब कोई बेटा […]

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 कविता – दिल का समंदर

कविता – दिल का समंदर

तेरे दिल का समंदर है गहरा बहुत पर डुबाने को मुझको ये काफी नहीं कल फिर तुम तोड़ोगी वादा कोई फिर कहोगी गलती मैंने की माफ़ कर दो मुझे और आगे से गलती फिर होगी नहीं तेरे दिल का समंदर है गहरा बहुत पर डुबाने…. कुछ कहता हूँ मैं तुम सुनो ध्यान से तोड़ा अब […]

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 कविता – ये दुनिया आखिरी बार कब इतनी खूबसूरत थी?

कविता – ये दुनिया आखिरी बार कब इतनी खूबसूरत थी?

ये दुनिया आखिरी बार कब इतनी खूबसूरत थी? जब जेठ की धधकती दुपहरी में भी धरती का अधिकतम तापमान था 34 डिग्री सेलसियस। जब पाँच जून तक दे दी थी मानसून ने केरल के तट पर दस्तक, और अक्टूबर के तीसरे हफ्ते ही पहन लिए थे हमने बुआ के हाथ से बुने हॉफ़ स्वेटर… ये […]

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 कविता – मुझे कागज़ की अब तक नाव तैराना नहीं आता

कविता – मुझे कागज़ की अब तक नाव तैराना नहीं आता

तुम्हारे सामने मुझको भी शरमाना नहीं आता के जैसे सामने सूरज के परवाना नही आता ये नकली फूल हैं इनको भी मुरझाना नही आता के चौराहे के बुत को जैसे मुस्काना नही आता हिजाबो हुस्न की अब आप क्यों तौहीन करते हो किसी को सादगी में यूँ गज़ब ढाना नहीं आता फकीरों की जमातों में […]

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 कविता: नील में रंगे सियार, तुम मुझे क्या दोगे ? – सतीश सक्सेना

कविता: नील में रंगे सियार, तुम मुझे क्या दोगे ? – सतीश सक्सेना

अगर तुम रहे कुछ दिन भी सरदारी में , बहुत शीघ्र गांधी, सुभाष के गौरव को गौतम बुद्ध की गरिमा कबिरा के दोहे , सर्वधर्म समभाव कलंकित कर दोगे ! कातिल, धूर्त, अंगरक्षक , धनपतियों के नील में रंगे सियार, तुम मुझे क्या दोगे ? दुःशाशन दुर्योधन शकुनि न टिक पाएं ! झूठ की हांडी […]

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