पटना यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव 2018 में लड़ाई अब प्रतिष्ठा की हो चुकी है। इस चुनाव के तमाम गोलबंदी में स्टेट पॉलिटिक्स के दिग्गजों का इन्वॉल्वमेंट बताता है कि ये चुनाव कितना महत्त्व्पूर्ण है। इस चुनाव में मुख्य रूप से एबीवीपी, छात्र जदयू, छात्र राजद-आइसा-एआईएसएफ़ गठबंधन, जन अधिकार छात्र परिषद, एनएसयूआई और छात्र युवा संघर्ष समिति भाग ले रही है। लेकिन समीकरण इतना भी सरल नहीं है।

जिस तरह से जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने इस चुनाव में सक्रियता दिखाई है, उससे तो स्पष्ट है कि लड़ाई धमाकेदार होने वाली है और सभी दल अपना सब कुछ लगाने को तैयार है। लेकिन अब ये लड़ाई हिंसात्मक रूप ले चुकी है, एबीवीपी, जन अधिकार छात्र परिषद और छात्र जद यू एक दूसरे पर कई बार हमला कर चुके हैं।

ज्ञात रहे के बिहार की मौजूदा सरकार में जदयू और बीजेपी के गठबंधन की सरकार है, एक तरफ़ जहां राज्य के मुख्यमंत्री जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार हैं वहीं उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भाजपा के नेता हैं, और जदयू में युवाओं को जोड़ने के उद्देश्य से राजनीतिक गुरु प्रशांत किशोर को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया, ताकि इस से पार्टी में युवाओं की भागीदारी हो और पार्टी को बल मिले। लेकिन प्रशांत किशोर का दांव उल्टा पड़ता दिखाई पड़ रहा है। जिस तरह से जदयू छात्र नेताओं पर हमले हो रहे हैं और वे दूसरों पर हमला कर रहे हैं, वो छात्र राजनीति की गरिमा को कहीं ना कहीं ठेस पहुंचाने वाली है।

अब यह लड़ाई यूनिवर्सिटी तक सीमित ना हो कर पार्टी विशेष की हो गई है, और हर पार्टी के दिग्गजों की दिलचस्पी इस बात का संकेत है कि अब लड़ाई नाक की हो गई है, फिर उसके लिए किसी को जान से ही क्यूँ ना मार दिया जाए।

प्राप्त सूत्रों के अनुसार जद यू छात्रसंघ चुनाव जीतने के लिए पैसे भी बांट रही है, जिससे मुख्यमंत्री के उस नारे के कलई खुलती नज़र आती है जिसमें वह भ्रष्टाचार से समझौता नहीं करने पर ज़ोर देते हैं। उनका यह कहना कि हम सुशासन की सरकार में विश्वास करते हैं, खोखले दावे साबित हो रहे हैं।

किसी भी समाज में युवाओं की भागीदारी तरक्की का प्रतीक माना जाता है, लेकिन वह यहां छात्र राजनीति में ही भ्रष्टाचार जैसी गतिविधियों में लिप्त हैं, जिस से देश की राजनीति में अंधकार जैसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका है। इस चुनाव का ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो नतीजा आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इस यूनिवर्सिटी चुनाव में राज्य स्तरीय नेताओं का दख़ल इस बात का प्रमाण है के हालात ठीक नहीं है, छात्र संघ चुनाव में ऐसी हिंसात्मक प्रवृति का जन्म देश की राजनीति खोखला कर देगा और एक ऐसे समाज का उदय होगा जहां जीत से कम कुछ नहीं और हार से मतलब जान कि क्षति।

ऐसी परिस्थिति में राज्य के मुख्यमंत्री की ख़ामोशी बहुत से सवाल खड़े करती है, जिसका जवाब हर हाल में राज्य के मुखिया नीतीश कुमार से जनता जानना चाहेगी, क्यूंकि डेमोक्रेसी में सरकार जनता के प्रति जवादेह होती है। ये समझना बेहद जरूरी है कि छात्र राजनीति में रक्तनीति के चलन से किसी का भला नहीं होने वाला है।