जब मुग़लों से दिल्ली की गद्दी छीन ली गई

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मध्यकालीन भारत की शुरुआत से लेकर अंत तक जो जो भी युद्ध हुए हैं उन युद्धों के खत्म होने के बाद ये तय हो गया है कि आगे क्या होने वाला है,यानी आगे हुक़ूमत किसकी होगी। इसकी शुरुआत होती है 1192 में जब पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गोरी के बीच लड़ा गए “तराइन” का दूसरे युद्ध से ,जिसने भारत के इतिहास को बदल कर रख दिया।

इसी तरह से पानीपत का पहला युद्ध जो मुग़ल सल्तनत के संस्थापक बाबर और लोधी सल्तनत के आखिरी सुल्तान इब्राहिम लोधी के बीच हुआ था। बाबर ने इस युद्ध में न सिर्फ जीत हासिल की थी बल्कि लगभग 300 सालों से चली आ रही दिल्ली सल्तनत को मिटा कर रख दिया था और मुग़ल साम्राज्य स्थापित किया था।

लेकिन ये तो प्रकृति का नियम है “जो आया है उसको जाना भी होगा” मुग़लों के साथ भी यही हुआ । एक वक्त ऐसा था जब वो काबुल के पहाड़ी इलाकों से लेकर दक्षिण भारत के आखर तक अपनी हुक़ूमत चलाया करते थे। उनका डंका विश्व भर में बजता था।

लेकिन वक़्त बदल गया और मुगलों के हाथों से हुक़ूमत चली गयी। आज हम मुग़लों के हाथ से हुक़ूमत जाने के दिन 12 अगस्त 1765 की बात कर रहे हैं। जब मुग़ल शासक शाह आलम ने “इलाहाबाद की संधि” पर मुहर लगाते हुए अंग्रेज़ों को बंगाल,ओड़िसा,झारखंड के दीवानी और राजस्व (टेक्स) अधिकार दे दिए थे और सरकार अंग्रेज़ों के हाथों में आ गयी था।

कैसे हुआ और क्या हुआ?

1707 में मुग़ल साम्राज्य के शासक बादशाह औरंगजेब की मौत हो गई और इसी दिन के बाद से एक एक करके विरोधी राज्यों ने अपने अपने राज्यों का परचम बुलन्द कर दिया, इनमें मराठे,जाट और सिख साम्राज्य थे। इन्होंने खुद को आज़ाद करते हुए अपने शक्ति प्रदर्शन की घोषणाओं का ऐलान कर दिया।

वहीं मुग़लो के साथी रहे या उनके दीवानी राज्यों से लेकर उनके साम्राज्य के मज़बूत स्तम्भ बंगाल,हैदराबाद और अवध भी 1761 तक आते आते और दिल्ली में लगातार बदलते हुए मुग़ल शासकों और 1739 में हुए नादिर शाह के भयंकर हमले के बाद से खुद को अलग करने की और बढ़ रहे थे इसी बीच मे दिल्ली में काबिज़ मुगल सरकार की जड़े बहुत कमज़ोर हो गयी थी।

लेकिन असल खेल अभी शुरू होना था,वो होने वाला था विदेशी शक्ति अंग्रेजों के हाथों से,बहुत बहुत हल्के हल्के अपने व्यापार को मजबूत करने वाले अंग्रेज़ दिल्ली से लेकर दक्षिण तक हो रहे घटनाक्रम पर नज़र बनाये हुए थे,और ऐसे वक्त का इंतज़ार कर रहे थे जब उनके लिए ठीक समय होगा।

बक्सर के युद्ध ने लिखी थी ये कहानी

अंग्रेज़ जो भारत मे व्यापार करने आये थे वो अब मज़बूत हो चुके थे इतने मज़बूत की वो अपना हस्तक्षेप भारत के प्रशासन में चाहते थे और इस कदम को मज़बूत करते हुए ही अंग्रेज़ों ने कछुए की चाल से अपना व्यापार मज़बूत करना तो शुरू ही किया बल्कि अस्थिर सरकारों और कमज़ोर मुग़ल साम्राज्य पर एक साथ प्रहार किया।

इसी कोशिश में 22/23 अक्टूबर को 1764 को बक्सर का युद्ध हुआ था,इस युद्ध में मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम की संयुक्त सेना का मुक़ाबला अंग्रेजी कम्पनी से था।

अब आप सोच रहे होंगे कि इतनी सारी सेनाओं के मुकाबले अंग्रेज सेना कैसे मज़बूत हो सकती है। लेकिन इतिहास में युद्ध सिर्फ सैनिकों की गिनती से नहीं,रणनीति से भी लड़ा जाता है।

बहरहाल युद्ध हुआ और शाह आलम द्वितीय का संयुक्त मोर्चा बुरी तरह हारा,नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। वहीं मुग़ल शासक ने शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेजों के साथ इलाहाबाद में 12 अगस्त 1765 को यानी आज ही के दिन संधि कर ली। इसे ही इलाहाबाद की संधि कहा गया ।

इस संधि ने वैसे तो सिर्फ एक युद्ध हराने की कहानी लिखी थी मगर इस संधि के बाद मुग़ल शासन और उसका दबदबा बस नाममात्र का रह गया था। हद तो ये हो गई थी कि इलाहाबाद और कड़ा ज़िलें की रियासत मुग़ल बादशाह को दे दी गई और वही मुग़ल जिनका झंडा पूरे भारत पर फहराया करता था वो बस दो ज़िलों में सिमट कर रह गए थे।

इसके अलावा अंग्रेजी कंपनी ने मुग़ल शासक शाह आलम द्वितीय को 26 लाख की सालाना पेंशन देना भी इस संधि में तय कर दिया गया था। इस रकम से बादशाह अपनी “शान” बरकरार रख सकता था,वो शान जो अब सिमट कर दो ज़िलों में रह गई थी। लेकिन थी तो थी, इसलिए निभाई भी जा रही थी।

लेकिन इस सन्धि ने ये तय कर दिया था कि अब मुग़लों की हुक़ूमत बस औपचारिकता है और उनके शानदार और मज़बूत काल का अंत होने के करीब था। वहीं अंग्रेज़ों को अब कोई रोकने वाला नहीं था,होता तो कैसे,मराठे जो अंग्रेज़ों की जड़े उखाड़ सकते थे,वो ज़ख्मी थे अब्दाली के दिये ज़ख्मों से..

और उसके बाद…

वैसे तो अभी मुगल सल्तनत को अपने आखिरी दौर पर पहुंचना था जहां उसके आखिरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र अंग्रेज़ों के खिलाफ हुई बग़ावत के नेता बनते हुए नज़र आने बाकी थे,लेकिन अभी उस वक़्त में 90 साल का वक़्त था और जब तक भारत के तमाम राज्यों को आपस मे लड़ कर खुद को “ग़ुलाम” भी बनाना था।

लेकिन आज का दिन इतिहास में दर्ज हो गया था जिसे हमेशा याद रखा जाना था और याद भी रखा जाना चाहिए। क्यूंकि इतिहास हमें सबक़ देता है,मौके देता है ज्ञान देता है और बताता है कि संभलते हुए चलिये, रणनीति से चलिये। वरना आप ढह जायेंगें…

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