मंदिर के चढ़ावे, मठ की ज़मीनों की भूमाफियाओं को बिक्री औऱ संदिग्ध मौतें

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अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेन्द्र गिरि के तथा कथित आत्म हत्या का प्रकरण आज कल चर्चा में है। बात 2008 की है। उस समय मैं प्रयाग में आई जी, जी आर पी था। नरेंद्र गिरि भू माफ़ियों को मठ की ज़मीन बेच रहे थे। संगम नागरिक समाज के लोग जिसमें संगम क्षेत्र से जुड़े हुए अन्य लोंगो के साथ मैं भी था, प्रति दिन संगम पर श्रमदान के साथ निः शुल्क तीर्थ यात्रियों के लिए अन्न क्षेत्र चला रहे थे जो कि आज भी अनवरत चल रहा है।

श्रमदानियों को जब पता लगा कि नरेन्द्र गिरि संगम क्षेत्र के बड़े हनुमान मन्दिर के मठ के ज़मीन और सम्पत्तियों को अपने ऐयाशी के लिए भू- माफ़ियाओँ को बेच रहे हैं तो श्रमदान के बाद प्रति दिन हनुमान जी से प्रार्थना करते थे कि नरेंद्र गिरि को वे सदबुद्धि दें और बाघम्बरी गद्दी मठ की रक्षा करें।

एक दिन नरेंद्र गिरि के लोंगो ने पुलिस की मौजूदगी में एक श्रमदानी को पीट दिया। श्रमदानी लोंगो ने आवश्यक क़ानूनी कार्यवाही के लिए पुलिस अधिकारियों से अनुरोध किया। कार्यवाही का इन्तज़ार हनुमान मंदिर के सामने किया जा रहा था। यहाँ न एक शब्द भाषण हुआ न नारेबाज़ी। किसी ने मीडिया से भी कोई बात नहीं की।

केवल पुलिस कार्यवाही के लिए इन्तज़ार को नरेन्द्र गिरि ने षड्यंत्र पूर्वक मीडिया से अपने ख़िलाफ़ धरना प्रचारित करवा दिया तथा शासन द्वारा मुझे निलम्बित कर दिया गया। श्रमदानियों को उनके विरुद्ध धरने की ज़रूरत ही नहीं थी। उनको सदबुद्धि देने और मठ की रक्षा के लिए तो हनुमान जी से प्रार्थना की जा रही थी।

पुलिस के द्वारा मारपीट के सम्बंध में मुक़दमा दर्ज कर लिया गया होता तो वहाँ किसी के रुकने की आवश्यकता ही नहीं थी। पुलिस की मौजूदगी में घटना हुई थी। उसे स्वयं हस्तक्षेप करना चाहिये था। बाद की विभागीय जाँच में भी धरने की बात साबित नहीं हुई तथा मुझे निर्दोष घोषित किया गया।

निलम्बन की घटना के कुछ दिनो पूर्व ही वरिष्ठ पत्रकार श्री अच्युतानन्द मिश्र प्रयाग पत्रकारों के एक कार्यक्रम में आए थे। उनका आशीर्वाद हमेशा से मेरे ऊपर रहा है। उस समय वे मेरे आवास पर भी आए थे। उनको पूरे पृष्ठ भूमि की जानकारी थी। उन्होंने मुख्यमंत्री को वस्तु स्थिति से अवगत कराया। लगभग डेढ़ माह बाद निलम्बन वापस हो गया।

नरेंद्र गिरि के आत्म हत्या का प्रकरण हिंदू समाज के अखाड़ों और सार्वजनिक मंदिरो के चढ़ावे के तथा मठों की सम्पत्तियों के दुरुपयोग और अव्यवस्था का ज्वलन्त प्रश्न खड़ा करता है। जिन आखड़ो की व्यवस्था आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए किया उनकी वर्तमान स्थिति के संदर्भ में गम्भीर मंथन की आवश्यकता है।

बाघम्बरी गद्दी प्रयाग का महत्वपूर्ण स्वतन्त्र मठ रहा है। यह किसी अखाड़े का मठ नहीं था। विचारानन्द जी इसके अंतिम स्वतन्त्र मठाधीश थे। गुरु शिष्य परम्परा से उत्तराधिकार हस्तांतरित होता था।विचारानन्द जी के लखनऊ यात्रा के दौरान रास्ते में अचानक मृत्यु के समय उनके एक मात्र शिष्य शिवानन्द जी, जो मूलतः गुजराती ब्राम्हण थे, गुजरात प्रवास पर थे। निरंजनी अखाड़े ने मठ को क़ब्ज़े में लेकर अपना महन्त नियुक्त कर दिया।

शिवानन्द जी वापस आने पर स्वाभाविक उत्तराधिकारी के नाते मठ पर अपने अधिकार का प्रयास किया परंतु निरंजनी अखाड़े के जन बल और धन बल के सामने टिक नहीं पाए। उनका मुकदमा प्रयाग उच्च न्यायालय में लम्बित ही रह गया। श्री फ़ौज दार राय उनके वकील थे। विगत वर्ष शिव नन्द जी का निधन झूँसी में हो गया।

नरेंद्र गिरी के पूर्व श्री भगवान गिरी महन्त थे। कैंसर से उनकी मृत्यु के बाद निरंजनी अखाड़े के पंचों से साँठ-गाँठ कर नरेन्द्र पूरी महन्त बन गए। नरेन्द्र पूरी, भगवान गिरी के कभी शिष्य नहीं थे और वे मठ की व्यवस्था के तहत महन्त बनने के अधिकारी नहीं थे। उनका पूर्व का बंदूक़ का लाइसेन्स भी नरेंद्र पूरी के ही नाम से था। वे हर गोविन्द पूरी के शिष्य थे। पंचों की मिलीभगत से वे पुरी से गिरी हो गए और भगवान गिरी के शिष्य न होने के बाद भी वे महन्त हो गए।

वे मूलतः प्रयाग के हंडिया तहसील के रहने वाले राजपूत परिवार से थे। उन्हें बड़े हनुमान जी मंदिर के चढ़ावे और कुम्भ में उसके महत्व का पता था। पंचों और अखाड़े को महन्त बनाने के एवज में वादा की गयी पूरी धनराशि न मिल पाने के कारण नरेन्द्र को निरंजनी अखाड़े से निकाल दिया गया। वे लम्बी अवधि तक निरंजनी अखाड़े से निष्कासित रहे। धीरे- धीरे बड़े हनुमान मंदिर के भारी चढ़ावे तथा मठ की तमाम सम्पत्तियों को बेंच कर प्राप्त धन से सत्ता समीकरण का उपयोग करते हुए पूरे अखाड़ा व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए.

नरेंद्र गिरी के गुरु हर गोविन्द पूरी निरंजनी अखाड़े के मुल्तानी मढ़ी के महन्त थे। उनको हटा कर २०१३ में नरेंद्र गिरी मुल्तानी मढ़ी के महन्त भी हो गए। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष होने के लिए किसी मढ़ी का महन्त होना ज़रूरी था। गुरु हर गोविन्द पूरी जी आज भी राजस्थान में निर्वासित जीवन जी रहे हैं।
तमाम संदिग्ध घटनाओं और अस्वाभिक मौतों की एक लम्बी शृंखला का ज़िक्र आज कल समाचारपत्रों में भी हो रहा है।

आनंद गिरि उनके सबसे आत्मिक शिष्य थे। जब नरेंद्र गिरी महन्त बने उस समय आनन्द गिरी बड़ौदा में एक हनुमान मंदिर के पुजारी थे। वहीं से एका एक वे ग़ायब हो गए। नरेंद्र गिरी उनके वियोग में विक्षिप्त से हो गए। उनके अनुरोध पर मैंने अपने बैच मेट से पता कराने के लिए कहा। पता लगा मंदिर आने वाली कोई कन्या भी उसी समय कहीं ग़ायब हैं।

कुछ समय बाद आनन्द गिरि वापस आ गए। नरेंद्र गिरि का यह विश्वास कि आनंद उन्हें छोड़ कर नहीं जा सकता सही साबित हुआ।कुछ महीने पूर्व जब नरेंद्र गिरि और आनंद गिरि का विवाद आगे बढ़ा तो भी मुझे लगा कि शायद अब इसका न्याय पूर्ण समाधान हो जाय। परन्तु आनन्द गिरि ने माफ़ी माँग ली।

वास्तव में पूरी अखाड़ा व्यवस्था और मंदिर के चढ़ावे के दुर्पयोग को रोकने के दिशा में मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है। जुलाई के मध्य,प्रयाग में स्वांत रंजन जी से मिलने गया था।उनसे और अन्य लोंगो से अखाड़ों और मंदिरो में भक्तों के चढ़ावे के दुरुपयोग तथा हिंदू समाज के हित में इसमें मूलभूत सुधार के सम्बंध में विचार विमर्ष हुआ।उनसे मिलने के बाद, १५ साल के अन्तराल पर बड़े हनुमान जी के दर्शन को संगम नागरिक समाज के लोंगो के साथ गया। हनुमान जी से मठ और सनातन धर्म की रक्षा के लिए प्रार्थना किया।

नरेंद्र गिरि के आत्म हत्या, उनके द्वारा लिखे गए तथा कथित सुसाइड नोट, उसके पूर्व हुई आशीष गिरि की तथा कथित आत्म हत्या तथा अन्य संदिग्ध मौतों और मठ के तमाम ज़मीनों की माफ़ियाओँ को बिक्री, बड़े हनुमान मंदिर के चढ़ावे के दुरुपयोग, नरेंद्र गिरि द्वारा कई लोगों को कई करोड़ की सम्पत्तियों को दिए जाने की सीबीआई जाँच उच्च न्यायालय के पर्यवेक्षण में होना आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि बाघम्बरी गद्दी तथा बड़े हनुमान मंदिर की व्यवस्था निरंजनी अखाड़े से हटा कर हिंदू समाज के भक्तों और आचार्यों को सौंपी जाय।

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