विनायक दामोदर सावरकर से प्रेरित हम उम्र युवा मदनलाल धींगरा ने अंगरेज अधिकारी कर्नल वाइली की लंदन में सरेआम हत्या कर दी। इस पर गांधी का लिखा विवरण इस तरह है ‘‘वे काफी समय तक लन्दन में रहे। यहां उन्होंने भारत की आजा़दी के लिए एक आन्दोलन चलाया। वह एक वक्त में ऐसी हालत में पहुंच गया कि सावरकर पेरिस से भारत को बन्दूकें आदि भेजने लग गए थे। पुलिस की निगरानी से भाग निकलने की उनकी सनसनी फैला देने वाली कोशिश और जहाज के झरोखे से उनका फ्रांसीसी समुद्र में कूद पड़ना भी हुआ। नासिक के कलेक्टर श्री ए.एम. टी. जैक्सन की हत्या के सिलसिले में उन पर यह आरोप लगाया गया था कि जिस पिस्तौल से जैक्सन की हत्या की गई, वह सावरकर द्वारा लन्दन से भेजी गई पिस्तौलों में से एक थी। सन् 1857 के सिपाही विद्रोह पर उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी, जो जब्त कर ली गई है। सन् 1910 में उन पर मुकदमा चलाया गया और 24 सितम्बर, 1910 को उन्हें वही सजा दी गई जो उनके भाई को दी गई थी। सन् 1911 में उन पर लोगों को हत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया। लेकिन इनके विरुद्ध भी किसी प्रकार की हिंसा का आरोप सिद्ध नहीं हो पाया।‘‘
राजनीतिक घटनाक्रम जनयुद्ध के योद्धा गांधी की माइक्रोस्कोपिक और टेलीस्कोपिक नजरों से ओझल नहीं होता था। कभी कभार पार्टी की सदस्यता और पद पर नहीं रहकर भी कांग्रेस के सलाहकार की भूमिका में सक्रिय गांधी का फैसला संगठन को अमूमन कुबूल होता था। काफी अरसा तक ब्रिटिश हुकूमत द्वारा सावरकर को रिहा नहीं करने को लेकर गांधी ने राजनीतिक सयानेपन, संवैधानिक प्रतिबद्धता और भविष्यमूलक इशारों में एक इबारत यंग इंडिया में 26 मई 1920 को लिखीः ‘‘दोनों भाइयों ने कहा है उनके मन में किसी प्रकार के क्रान्तिकारी इरादे नहीं हैं। अगर उन्हें छोड़ दिया गया तो वे 1919 के रिफाॅर्म्स आदेशों के तहत काम करना पसन्द करेंगे। दोनों को लगता है कि भारत की किस्मत ब्रिटेन के साथ रहकर ही सबसे अच्छी तरह गढ़ी जा सकती है। मेरा ख्याल है कि उन्होंने जो इरादे सार्वजनिक किए हैं, उन्हें ज्यों का त्यों सही मान लेना चाहिए।
अंग्रेजों की नीयत, कानूनों की मंशा और भारतीय संघर्षकथा में सावरकर की भूमिका तथा सजा को लेकर इतिहास की नजर से गांधी हर मकड़जाल निकाल देते हैं। सरल हृदय लेकिन कम्प्यूटरनुमा दिमाग के गांधी दो टूक कहते हैं – सावरकर बंधुओं ने ब्रिटिश हुकूमत को बिना शर्त समर्थन दिया। गांधी मनुष्य की स्वायत्तता और उसकी आजादी पर किसी भी तरह की गैरकानूनी सरकारी बंदिश लगाए जाने की गुलाम भारत में भी संवैधानिक भाषा में मुखालफत करते हैं। वह भले ही सावरकर बंधुओं की कथित हिंसात्मक गतिविधियों को लेकर ही क्यों नहीं रहा।
गांधी ने यह भी लिखा ‘‘दोनों भाइयों की रिहाई पर आगे रोक लगाए रखने का इकलौता सबब ‘सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा‘ ही बताया जा सकता है। अगर उन्हें आगे कुछ समय के लिए भी कैद में रखना है, तो उसका औचित्य ठहराते हुए एक पूरा बयान जारी करना जनता के प्रति सरकार का कर्तव्य है। ये दोनों भाई राजनीतिक अपराधी हैं, इसमें तो कोई सन्देह हो ही नहीं सकता। जनता को यह लेकिन जानने का अधिकार है कि ठीक ठीक वे कौन से कारण हैं जिनके आधार पर माफी दे सकने संबंधी सम्राट की घोषणा के बावजूद दोनों भाइयों की रिहाई पर रोक लगाई जा रही है। गांधी के वक्तव्य में द्वैध और श्लेष की कूटनीतिक रॉकेटनुमा प्रहारशक्ति दोनों पढ़ी जा सकती है। गांधी के मुताबिक जनता को भी सावरकर भाइयों की आरोपित हिंसात्मक या अन्य कानूनतोड़क कार्यवाहियों की पूरी जानकारी होने का जनतांत्रिक अधिकार है। गांधी की समझ में इसके बावजूद सावरकर बंधुओं और जनता दोनों के नैसर्गिक अधिकारों को रहस्यमयता का कानूनी लबादा ओढ़कर अंगरेज कुचल रहे थे।
ताजा इतिहास को एक बात और मालूम होना चाहिए। सावरकर की रिहाई के लिए दिए जाने वाले माफीनामे के समर्थन में अनुरोध पत्र पर गांधी ने दस्तखत करने से इंकार किया। सयानेपन तथा मनुष्यता की उदारता के चलते अपना सचनामा गांधी ने 27 जुलाई 1937 के बॉम्बे क्रानिकल में लिखा ‘‘सावरकर मानते होंगे कि मैंने उनकी रिहाई के लिए भरसक कोशिश तो की थी। वे यह भी मानेंगे कि मेरे और उनके बीच लंदन में हुई पहली मुलाकात के वक्त आत्मीय रिश्ते थे।‘‘
गांधी के मन में हिंदू महासभा और सावरकर को लेकर कभी भी सियासी पूर्वग्रहित धारणाएं नहीं थीं। उन्होंने हिन्दू महासभा और सावरकर आदि के संवैधानिक किस्म के अधिकारों की खुलेआम बार बार पैरवी भी की। बिहार सरकार ने हिंदू महासभा के 1 दिसंबर 1941 से 10 जनवरी 1942 तक चलने वाले सालाना सम्मेलन की इजाजत नहीं दी। उसी दरमियान बकरीद का त्यौहार पड़ने से सरकारी समझ में सांप्रदायिक तनाव की हालत हो सकती थी। सावरकर ने हिंदू महासभा के अध्यक्ष तथा बंगाल के वित्त मंत्री श्यामाप्रसाद मुखर्जी वगैरह ने अधिकारियों को लिखित आश्वासन दिया था। गांधी ने साफ कहा हिंदू महासभा को इजाजत दे देने से बिहार की सरकार को एक मौका मिला है। वह मनुष्य और नागरिक आजादी के अर्थ में हिंदू और मुसलमान को एक ही मंच पर लाने का मौका हाथ से नहीं जाने दे।
गांधी सांकेतिक भाषा में मुस्लिम लीग से भी अपील करते हैं कि लीग हिन्दू महासभा अर्थात अपने ‘भगिनी संगठन‘ को वह आजादी मिलने दे जिसकी उसे खुद भी जरूरत होती रहती होगी। ‘भगिनी संगठन‘ जैसा शब्द लीग-हिन्दू महासभा के बार बार गलबहियां करते सियासी रिश्ते के रहस्यमहल में लगे ताले को ‘खुल जा सिमसिम‘ कहती कुंजी ही तो है। सिंध, बलूचिस्तान और बंगाल में हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग की संयुक्त सरकारों में छोटे भाई की तरह सत्ता का प्रसाद ग्रहण किया ही। गांधी के पास शब्दों के कई ‘घाव करें गम्भीर‘ की नस्ल के विनम्र हथियार रहे हैं। यही उन्हें द्रष्टा और कालजयी बनाता है। यह तोहमत नहीं लगाई जा सकती कि हिंदू महासभा और सावरकर से असहमति के बावजूद गांधी का उनकी भी मानवीय आजादी के मूल सिद्धांतों के प्रति दुराव रहा।