घर पर हूं, पापा और मैं दोनों एक ही टीवी देखते हैं। चैनल एक ही हैं, एंकर एक ही हैं। संबित पात्रा एक ही समय पर हर चैनल पर जाकर जनता को मिसएजुकेट नहीं कर सकता, इसलिए एबीपी न्यूज, आजतक, न्यूज18, रिपब्लिक टीवी, जी हिंदुस्तान, जी न्यूज पर भांति-भांति के एंकर टिके हुए हैं। बनावट में शहरी दिखते हैं, लेकिन जुबान से निहायत ठग। ये सब संबित प्रथम, संबित द्वितीय, संबित तृतीय, संबित चतुर्थ की भूमिका में हैं। आम नागरिक की पोलिटिकल ट्रेनिंग इन्हीं दो चार एंकरों के हाथ है।

जामिया या जेएनयू में जो किया जा रहा है वह इन विश्वविद्यालयों के लिए नहीं है, यकीन मानिए। बल्कि जामिया और अन्य विश्वविद्यालय देश की राजनीति के लिए राष्ट्रीय मंच भर हैं। यहां से पूरे देश में संदेश पहुंचाया जा रहा है। मुद्दे भले ही अलग हों 370, ट्रिपल तलाक, एनआरसी। लेकिन इन सबमें एक चीज कॉमन है, मुसलमान। पापा की समझ इन्हीं नाटकों द्वारा बुनी जा रही है। एक कॉमन दुश्मन तैयार किया गया है। मुसलमान। इसके बाद कुछ भी नहीं करना। बस मुसलमान साबित करना भर है। बाकी काम एंकर का।

पापा ही नहीं, टीवी चैनल और सोशल मीडिया के थ्रो भाजपा संघ की विचारधारा बैडरूम से लेकर बाथरूम तक पहुंच चुकी है। बीजेपी ऐसी पार्टी है जो हर वक्त चुनावी मोड में रहती है। अपने वोटरों की राजनीतिक एजुकेशन की पूरी व्यवस्था रखती है, उसे बिजी रखती है।

मुसलमानों के अलावा जामिया की वजह से हजार दो हजार पढ़े लिखे लोग ही नाराज होंगे जो हम आप सबकी टाइमलाइन में म्युचुअल फ्रेंड निकल आंएगे। जो आपस में वीडियो और फ़ोटो शेयर कर लेते हैं, सेक्युलर देश के स्वप्न गढ़ लेते हैं। इनके नाराज होने से सरकार को फर्क नहीं पड़ता। सरकार ने अपने वोटरों के लिए पूरा सिलेबस तैयार किया हुआ है। जिसके केंद्र में मुसलमान है।

शाम होते होते एक एंकर कमर कसा हुआ रहता है। जो एक पार्टी प्रवक्ता की भाषा बोलता है। और उस कॉमन दुश्मन यानी मुसलमान की और बार बार इशारा करता है। आंकड़ें गिनाता है, इतिहास पढ़ाता है। जामिया या जेएनयू एक घटना भर हैं लेकिन इस देश को स्थायी रूप से कौन नुकसान पहुंचा रहा है आप तय कर लीजिए।

मेरे पिता और गांव के सामान्य लोग कभी भी इतने साम्प्रदायिक नहीं थे। उनका “हिन्दू” कुछ ही दिन पहले जन्मा है। सन 62 के युद्ध से लेकर, नेहरू गांधी पर अधकचरा ज्ञान निरा नया है। मुसलमानों को लेकर अजीब तरह का भय है। शक है। शंका है। ये पहले भी थी। लेकिन अब यह अपने सबसे विद्रूप रूप में सामने आ रही है। पिता बहस करते करते कभी इतने गर्म नहीं हुआ करते थे।

एक लाठीचार्ज, एक आगजनी, एक आंसू गैस के गोले सामान्य बात है एक पूरी की पूरी पीढ़ी को मिसएजुकेट और साम्प्रदायिक बनाने का जो काम किया जा रहा है। वह जामिया, और जेएनयू की घटनाओं से भी खतरनाक है। लाइब्रेरियों में आंसु गैस छिड़कने की ताकत जो पुलिस को मिली है। उस पुलिस को स्टूडेंट्स पर लाठी भांजने का आर्डर देने की जो ताकत गृहमंत्री को मिली है वह मेरे पिता, मेरे गांव, मेरे जिले जैसे लोगों से ही मिलती है। अमित शाह या मोदी की ताकत यही भीड़ है। जो दिल्ली में नहीं बल्कि गांव में रहती है। जो सुबह से लेकर शाम तक फैक्ट्रियों में दम घिसती है और शाम होते ही टीवी देखती है। ये मिसएजुकेट, भ्रमित, ठगी हुई भीड़ ही मोदी शाह, और आरएसएस की ताकत का स्रोत है। और कुछ नहीं