नज़रिया – क्या अदालतों के अंदर मुस्लिमों को ज़मानत मिलने में समस्या होती है ?

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दो दिन पहले देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर एक भीड़ इकठ्ठी होती है जिसे ‘भारत जोड़ो आन्दोलन’ का नाम दिया जाता है, इस भीड़ को संबोधित करने वालों में सबसे बड़ा नाम भाजपा के नेता और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय का होता है, और इस भीड़ को बुलाने का उद्देश्य 1860 में बने इंडियन पीनल कोड, 1861 में बने पुलिस एक्ट, 1863 में बने रिलीजियस एंडोमेंट एक्ट और 1872 में बने एविडेंस एक्ट सहित सभी 222 अंग्रेजी कानूनों को खत्म करने की मांग थी।

लेकिन इससे अलग भीड़ द्वारा मुसलमानों के खिलाफ ज़हरीले नारे लगाये गए,जिसके बाद उस नारेबाजी का विडियो सोशल मीडिया पर घुमने लगा और लोगों द्वारा उनकी गिरफ़्तारी की मांग होने लगी! पहले दिल्ली पुलिस ने अज्ञात लोगों पर केस दर्ज किया जबकि विडियो में नारेबाजी करते लोगों को साफ देखा जा सकता था!

सोशल मीडिया के बढ़ते दबाव के बाद दिल्ली पुलिस ने अश्विनी उपाध्याय समेत 5 लोगों को गिरफ्त में लेकर पूछताछ करना शुरू किया और फिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन एक दिन बाद ही अश्विनी उपाध्याय को दिल्ली कोर्ट ने जमानत दे दी है।

अब देखिये ऐसे ही कुछ मिलते जुलते आरोप में मुस्लिम छात्रों, एक्टिविस्टों, पत्रकार, कॉमेडियन, डॉक्टर इत्यादि पर किस तरह कारवाई की गयी जिसके बाद उन्हें कोर्ट से जमानत लेने के लिए लम्बी जद्दोजहद करनी पड़ी,किसी को जमानत मिली तो कोई अब भी जेल में अपनी सुनवाई की अगली तारीख का इन्तेजार कर रहा है। इस को समझने के लिए आपको दो साल पीछे जाना होगा जब देश में नागरिकता कानून यानि CAA का विरोध अपने चरम पर था।

जिसका मुख्य बिंदु शाहीन बाग़ था जिसे शरजील इमाम ने खड़ा किया था,जिसके बाद देश के अलग अलग जगहों पर सैंकड़ों शाहीन बाद वजूद में आये। महज चक्का जाम की बात करने पर शर्जील इमाम को गिरफ्तार किया गया, जिसके एक महीने बाद दिल्ली की सड़कों पर “देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को” जैसे नारे गूंजने लगे, कपिल मिश्रा ने पुलिस की मौजूदगी में भड़काऊ भाषण दिया जिसके बाद दिल्ली में हिंसा की खबरे मीडिया में चलने लगी।

इस हिंसा के आरोप में उन मुस्लिम छात्रों और एक्टिविस्टों को चुन चुन कर UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया जो CAA प्रोटेस्ट का अहम चेहरा रह चुके थे। जिनमे खालिद सैफी, मीरान हैदर, आसिफ इकबाल तनहा, सफुरा जरगर, इशरत जहाँ, गुल्फिशा फातिमा, अतहर खान, उमर खालिद और शिफा उर रहमान इत्यादि लोग शामिल थे।

जहां सफुरा जर्गार की मेडिकल हालात को देखते हुए 6 महीने बाद जमानत पार रिहा किया गया और एक साल बाद आसिफ इकबाल तन्हा को जमानत पर रिहा किया गया, वहीँ बाकी लोग अब भी अपनी जमानत के लिए कोर्ट की तारीख का इन्तेजार कर रहे हैं।

इसी CAA आन्दोलन की कड़ी में एक भाषण को लेकर डॉक्टर कफील खान को भी गिरफ्तार किया गया, उनपर NSA लगाया गया जिसकी अवधि भी बढ़ाई गयी, और करीब 8 महीने जेल में रहने के बाद उन्हें जमानत पर रिहा किया गया।

कश्मीर का एक पत्रकार है आसिफ सुल्तान जो 1000 दिनों से अधिक से जेल में है, अबतक जमानत नहीं हुई है! केरल का एक पत्रकार है सिद्दीक कप्पन जिन्हें रेप पीडिता के परिवार से मिलने जाते समय गिरफ्तार किया गया था और करीब डेढ़ सालों से वो जेल में है। जेल में रहते हुए उनकी अम्मी इस दुनिया से चल बसी, कोरोना संक्रमित होने और बीमार होने के बावजूद उन्हें जमानत नही मिली।

एक कॉमेडियन है मुनव्वर फारुकी जिसे उस जोक के लिए गिरफ्तार किया गया था जिसके सबूत पुलिस को भी नहीं मिले, बावजूद इसके महीनो उसे जेल में रखा गया, जिसके बाद उसे जमानत पर रिहा किया गया।

बताने का मकसद ये है की बेगुनाह होते हुए भी एक तबके के लोगो को जमानत मिलना कितना मुश्किल होता है लेकिन सारे सबूत मौजूद होने के बावजूद एक तबके के लोगो पर कभी तो कारवाई नहीं होती जैसे दिल्ली हिंसा से पहले कपिल मिश्रा द्वारा दिया गया बयान हो या रागिनी तिवारी की ज़हरीली बातें।

फिर अगर कारवाई होती भी है तो उन्हें फ़ौरन जमानत मिल जाती है जैसे अश्विनी उपाध्याय और कुछ दिनों पहले हरियाणा में महापंचायत कर मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलने वाले रामभक्त गोपाल को मिली। हाँ बात रामभक्त गोपाल की निकली है तो आपको याद होगा की इस शख्स ने जामिया में बन्दुक लहराते हुए फाइरिंग की थी जिसमे एक छात्र घायल भी हुआ था और शाहीन बाग़ में कपिल गुज्जर नामी शख्स ने भी बन्दुक लहराई थी।

जिसके बाद दोनों की गिरफ़्तारी हुई थी, वहीँ दिल्ली हिंसा के दौरान शाहरुख़ पठान नामी युवक को भी हाथों में बन्दुक लिए देखा गया था! लेकिन जहा रामभक्त गोपाल और कपिल गुज्जर को जमानत मिल गयी वहीँ शाहरुख़ पठान की कई जमानत याचिका खारिज की जा चुकी हैं! और अब भी वो जेल में है जहा उसे अपने जमानत की अगली तारीख का इन्तेजार करना है!

ये नया भारत है जहां आये दिन मुसलमानों के खिलाफ अपशब्द बोले जाते हैं। लेकिन उनपर कारवाई ना के बराबर होती, उदाहरण सवरूप यति नरसिंहानंद सरस्वती और सूरजपाल अमु जैसे कई लोग हैं, जिनके विडियो आये दिन सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं, पुलिस द्वारा उनकी ऑनलाइन शिकायत भी की जाती है लेकिन कोई कारवाई नहीं होती है।

इसके अलावा आज ही घटना सुन लीजिए, कानपुर में एक 45 वर्षीय पुरूष को सड़क पर पीटा गया और उससे कथित तौर पर “जय श्री राम” का नारा लगाने को कहा गया वो भी तब जब उसकी बच्ची उससे बिलखते हुए रो रही थी। ये शख्स भी मुसलमान ही था।

आखिर इन लोगों की हौसला अफजाई कौन कर रहा है? देश के अल्पसंख्यक कानून और न्यायपालिका पर पूरा विश्वास रखते हैं और आगे भी रखेंगे, लेकिन अगर कानून और न्यायपालिका की तरफ से निराशा हाथ लगे तो वो कहाँ जाएँ?

दिन ब दिन मुसलमानों के खिलाफ नफरत फ़ैलाने वालों की तादाद बढ़ रही है जिस पर प्रशासन और न्यायपालिका को लगाम लगाने की ज़रूरत है, ताकि इसका शिकार कोई अखलाक पहलु आसिफ या जुनैद ना हो!