ये जो ख़बर आ रही है, कि बीएचयू में लड़कियों पर लाठीचार्ज हुआ है. वो भी उन लड़कियों पर, जो विरोध कर रही थीं. उनके साथ होने वाली छेड़छाड़ का. वो लड़कियाँ उस घटिया मानसिकता का विरोध कर रही थीं. जो मानसिकता बीएचयू की कुंठित मानसिकता वाले कुछ लड़को को गर्ल्स होस्टल के सामने हस्तमैथुन करने के लिये प्रेरित करती थी. बताईये क्या इस घटिया सोच का विरोध करना गलत था क्या?

अब आप तरह-तरह के तर्क गढ़ने लगेंगे, उन छात्राओं के विरोध में राजनीति का पहलू निकाल लाएंगे. विपक्षी दलों की साज़िश करार दे जाएंगे. आप सिर्फ़ इसलिए उन छात्राओं का साथ देने से इंकार करेंगे,क्योंकि उन छात्राओं के समर्थन में विपक्षी दल आ खड़े हुये हैं. पूरी डीबेट का रुख आप सिर्फ़ इसलिये बदल देंगे क्योंकि विपक्षी दल के लोग समर्थन मे हैं. आप ये क्यों भूल जाते हैं, कि आप एक लोकतान्त्रिक देश में रहते हैं. और किसी भी लोकतंत्र की मज़बूती के लिये विपक्ष और विरोध किसी सन्जीवनी से कम नही है.

बनारस में पिछले दो-तीन दिनों में जो कुछ भी घटित हुआ है, वह न सिर्फ़ बनारस और यूपी बल्कि देश को कलंकित करने वाली घटना है. हो सकता है, मेरे शब्द आपको आपत्तिजनक लगेंगे. पर ये बताईये कि यदि इन लड़कियों के स्थान पर हम और आपके परिवार की महिलाएं छेड़छाड़ का विरोध कर रही होती, तो क्या आप इस तरह का लाठीचार्ज करते और विपक्षी दलों के समर्थन का विरोध करते. सुनिये प्रधानमंत्री जी एवं मुख्यमंत्री महोदय उत्तरप्रदेश, देश की बेटियों की अस्मिता का सवाल है. आखिर देश की इन बेटियों के साथ ये पक्षपात क्यों किया जा रहा है. क्या उनका विरोध प्रदर्शन इस तरह की लाठीचार्ज से दबाकर आप भारत की करोड़ो बेटियों को ये संदेश देना चाहते हैं, कि बेटियों की अस्मिता और इज़्ज़त की बात आपके लिये सिर्फ़ एक चुनावी जुमला है.

क्या बेटियों की अस्मिता की बात आप और आपकी पार्टी में सिर्फ़ और सिर्फ़ तब की जाती है. जब आपको इस बुनियाद पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण गारंटी हो. जिससे आपका वोट बैंक आसानी से बढ़ सके.ये सभी जानते हैं, मुज़फ़्फ़रनगर दंगे से लेकर लव जिहाद नाम का फ़र्ज़ी प्रोपेगेन्डा कर आपकी पार्टी से जुड़े लोगों ने महिलाओं की अस्मिता के नाम पर किया.दो साल पहले राजस्थान से आपकी पार्टी के एक विधायक महोदय तो जेएनयू से कन्डोम की गिनती कर आये थे.

बड़ी ही विडम्बना है, कि महिलाओं के हक़ में बात करने वाले संगठन भी चुप्पी जमाये बैठे हैं. चुनिन्दा घटनाओं को छोड़ दिया जाये ,जिनमें देश भर में एक विरोध की लहर चली थी. पर अधिकतर घटनाओं में या तो विरोध को दबा दिया जाता है. या फिर वितोध किया ही नहीं जाता. आप पिछले कुछ साल पर नज़र दौड़ाईये. आप ये बात मानने पर मजबूर होंगे. कि स्कूल व कालेज की लड़कियाँ हों, या शादी शुदा महिलाएं. सभी बेतहाशा सेक्सुअल एब्यूज़ की शिकार हो रही हैं. पर आवाज़ उठायेगा कौन?

निर्भया केस सभी को याद है, पर क्या आपने वैसा हल्ला बाद की घटनाओं पर देखा है

एक गैंग सोशलमीडिया पर बैठी है, जिसके ऑनलाईन गुन्डे अपने विरोधी विचारधारा से संबंध रखने वाली महिलाओं को रेप की धमकी देने में ज़रा भी संकोच नहीं करते,कुछ तो इस देश की बेटियों को कुतिया और न जाने किस -किस तरह की गालियों से नवाज़ते हैं.

आप बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की छात्राओं के साथ हुई छेड़छाड़ को इन घटनाओं से अलग नहीं कर सकते. ज़रा सोचियेगा, कि BHU की छात्राओं ने अपने प्रदर्शन का बेस छेड़छाड़ को बनाया था. क्या सरकार इतनी बेबस है, कि उन छात्राओं को मनचलो से न बचा सके. आखिर किस मानसिकता के साथ उन छात्राओं के विरोध प्रदर्शन को कुचलने की कोशिश हुई?

क्या उन्होंने प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में सुरक्षा मांगकर बहुत बड़ी गलती कर दी. ये मेरे देश की बेटियाँ हैं, जो ये नहीं समझ पा रही हैं. कि उन्हें सुरक्षा मांगने पर लाठियाँ क्यों मिली.

क्या यही है, “बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ” की सरकारी नीति.

अंत में एक सवाल है, क्या वीसी की संघ से निकटता और ABVP के छात्रों और कार्यकर्ताओ की हरकतो का विरोध करना इस देश की बेटियों को भारी पड़ गया?