राजस्थान में एक सिरफिरे मुस्लिम युवक द्वारा अपनी ही बच्ची की हत्या की खबर आपने सुने होंगे. बेहद ही चौंकाने वाली इस घटना में हत्यारे ने जिस प्रकार से ये कहा है, कि उसने अपनी बच्ची की रमज़ान में बलि दी है. उसका ये दावा चौंकाता है, क्योंकि नर बलि जैसा कोई मामला इस्लाम के किसी भी धार्मिक कार्य में नहीं होता.
यही वजह है, कि इस्लाम में तांत्रिक गतिविधियाँ हराम ( invalid ) हैं. बल्कि जहाँ भी इस्लामिक क़ानून लागू होता है. वहां ऐसी गतिविधियों में संलिप्त पाए जाने वाले लोगों को सज़ाए मौत का दंड दिया जाता है. इसी से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, कि यह कार्य कितना गैरिस्लामिक है.

एक तबका है, जो खुदको प्रगतिशील कहता है, नास्तिकता से जोड़ता है. पर उस तबके का काम होता है. कि इस्लाम और क़ुरानी शिक्षा को अपने नज़रिए से गलत तरीके और मतलब के साथ प्रस्तुत करना. वो तबक़ा राजस्थान की घटना को धर्म के साथ जोड़कर इस्लाम और मुस्लिम समुदाय को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है.

क्या आपको लगता है, कि कोई मुस्लिम व्यक्ति या संस्था इस कृत्य का बचाव करेगा या कर रहा है. बिलकुल नहीं. न कर रहा है और नाहि आप ऐसे किसी व्यक्ति को ऐसे कृत्य का समर्थन करते पायेंगे. कर भी कैसे कर सकते हैं, इस्लामी नज़रिए से ये दो तरह का गुनाह है. पहला गुनाह तो हत्या है, वहीं दूसरा गुनाह अपनी लड़की की हत्या. दोनों ही प्रकार के गुनाह में इस्लाम सज़ाए मौत की बात करता है.

सोशलमीडिया में एक तबक़ा है, जो इस बच्ची की हत्या पर ये कहता हुआ पाया जा रहा है, कि कहाँ हैं वो लोग जो #JusticeForAsifa का नारा बुलंद किये हुए थे . अब खामोश हैं, क्या कोई #JusticeForRizwana नारा बुलंद नहीं करेगा. साथ भी वो ये भी कहते पाए जा रहे हैं, कि नहीं करेंगे . क्योंकि क़ातिल तो मुसलमान है. दरअसल ऐसी बात करने वालों की पहली लाईन पढ़कर लगता है, कि आखिर ये इस केस की तुलना आसिफा के केस से क्यों कर रहे हैं. जबकि दोनों ही केस वीभत्स हैं, दोनों ही केस इंसानियत के लिए कलक है.

ये बात सही है, कि राजस्थान की बच्ची को भी इंसाफ दिलाने के लिए आवाज़ बहुत बड़े स्तर पर उठाना चाहिए. पर उसकी तुलना आसिफ़ा केस से बिलकुल नहीं की जा सकती, आसिफा के साथ जो हुआ वो एक समुदाय से नफ़रत की बिना पर उन्हें डराने के लिए रेप के बाद की गई हत्या थी. ताकि बकरवाल गुर्जर समुदाय के लोग कठुआ छोड़कर चले जाएँ. वहां धार्मिक अंधत्व था. वहां समुदाय विशेष से नफ़रत की बिना पर की गई हत्या थी.

राजस्थान में मुस्लिम बच्ची की उसके पिता द्वारा की गई वीभत्स हत्या कि तुलना आसिफा से नहीं. बल्कि उन तांत्रिक घटनाओं और तांत्रिक गतिविधियों में संलिप्त लोगों के कृत्य से की जा सकती है. जो अपनी बच्ची और बीवियों की हत्या सिर्फ इसलिए कर देते हैं. ताकि उनके देवी देवता खुश होकर उन्हें तांत्रिक शक्तियों से नवाज़ दें.

दरअसल ऐसी बात करने वाले इस तरह की वीभत्स घटनाओं में हत्या का विरोध नहीं करते. उन्हें मरने वाले से कोई सहानुभूती नहीं होती. वो तो बस अंधत्व में लीन होकर ख़ास विचारधारा के लोगों द्वारा किये गए गुनाहों का बचाव कर रहे होते हैं. उनका कार्य बस इतना होता है, कि किसी तरह दूसरे किसी के द्वारा किये गए गलत कार्य से तुलना करते हुए अपने ख़ास के गलत कार्य को सहीह ठहराया जाये. इनके फेर में कई ऐसे लोग आ जाते हैं, जो इनकी कुटिलता को परख नहीं पाते हैं.

समाज में हर दस क़दम में और सोशलमीडिया में हर भक्त प्रजाति का व्यक्ति आपको इस बीमारी से ग्रस्त मिलेगा. पर हमारा और आपका काम है समाज को जागृत करना. गलत को गलत बोलना और सच को डिफेंड करना.
फिर मिलेंगे फिर किसी नए विषय के साथ.

जय हिन्द , जय भारत की एकता