मोदी सरकार ने टॉप ब्यूरोक्रेसी में प्रवेश पाने का अब तक सबसे बड़ा बदलाव कर दिया, डीओपीटी की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार विभिन्न मंत्रालयों में 10 जॉइंट सेक्रटरी के पद पर नियुक्ति होगी। इनका टर्म 3 साल का होगा और अगर अच्छा प्रदर्शन हुआ तो 5 साल तक के लिए इनकी नियुक्ति की जा सकती है।

इसे लैटरल एंट्री कहा जाता है मोदी शुरू से ही ब्यूरोक्रेसी में लैटरल एंट्री के के हिमायती रहे हैं सरकार चाहती है कि निजी क्षेत्र के कार्यकारी अधिकारियों को लेटरल एंट्री के ज़रिये विभिन्न विभागों में उप सचिव, निदेशक और संयुक्त सचिव रैंक के पदों पर नियुक्त किया जाए अब जब इस तरह की नियुक्ति पर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं तो इसे प्रशासनिक सुधार की पुरानी अनुशंसा से जोड़ा जा रहा है

दरअसल UPA सरकार ने 31 अगस्त, 2005 को कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया जिसमें इस तरह के प्रावधान की बात की गयी थी लेकिन उस आयोग की अन्य सिफारिशो को नजरअंदाज कर सिर्फ लैटरल एंट्री के प्रावधान को तवज्जो देना जंच नही रहा है

आयोग ने सूचना का अधिकार, ई-प्रशासन, लोक व्यवस्था, स्थानीय शासन, आपदा प्रबंधन, मानव पूंजी को मुक्त करना, सामाजिक पूंजी, भारत सरकार की संगठनात्मक, वित्तीय प्रबंध व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण, राज्य एवं जिला प्रशासन, कार्मिक प्रशासन का पुर्नपरिस्कार, शासन में नैतिकता, नागरिक केंद्रित प्रशासन और आतंकवाद प्रतिरोध आदि विषयो पर अपनी संतुस्तिया प्रस्तुत की थी

आयोग की ने जो सबसे महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे वह लैटरल एंट्री के नही थे अपितु लोकपाल को संवैधानिक मान्यता देने सिविल सेवा में नैतिक संहिता का निर्माण करने, राज्यों में केंद्रीय बलों की नियुक्ति के संबंध में स्पष्ट प्रावधान किए जाने ओर राजनीतिक दलों के लिए आचार संहिता का निर्माण किये जाने संबंधित थे जब 2013 में पुलिस सुधार से सम्बंधित इसके सुझावों को लागू करने की बात की गयी थी तो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चौहान और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने केन्द्र पर आरोप लगाया कि वह उनके क्षेत्रधिकार में हस्तक्षेप कर रही है है

आयोग ने सुझाव दिया है कि सरकारी कर्मचारियों को जवाबदेह बनाने के लिए कार्यकाल के 14 साल पूरे होने ओर 20 वर्ष पूरे होने पर व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए लेकिन इस पर कोई ध्यान नही दिया गया

2013 में 80 प्रसिद्ध और अनुभवी नौकरशाहों की एक याचिका के जवाब में सर्वोच्च न्यायालय ने ब्यूरोक्रेसी के संबंध में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया
अपने निर्णय में कोर्ट ने तीन प्रमुख बातें कही थी…….

(1) मंत्रियों के सारे आदेश लिखित होने चाहिए। कोई भी नौकरशाह मौखिक आदेशों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं होगा
( 2 ) नौकराशाहों का मनमाना स्थानंतरण नहीं होगा। उनकी अवधि तय करनी होगी
( 3 ) केंद्र और राज्य सरकारों के सारे बड़े अफसरों की नियुक्ति, पदोन्नति और स्थानांतरण आदि के लिए एक सिविल सर्विस बोर्ड नियुक्त किया जाए

लेकिन ये निर्णय भी मोदी सरकार ने नही माना आज जब यह प्रशासनिक सुधार के नाम पर लैटरल एंट्री के बहाने अपनी विचारधारा से जुड़े लोगो को बैक डोर से अंदर लेना चाहते हैं तो शक का उभरना लाजिमी ही है

सिविल सेवा में लेटरल एंट्री देना तभी अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है, जब चयन प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाया जा सके ओर मोदी सरकार के चार सालों के रिकॉर्ड को देखते हुए यह सम्भव नही लग रहा।