कोई भी इमारत तब तक खड़ी नहीं होती, जब तक नींव की ईंटें मज़बूती से न डाली जाएं। लेकिन तेरे बिन लादेन वाले अभिषेक शर्मा की ‘परमाणु’ भारत के पूर्ववर्ती परमाणु अभियानों पर मिट्टी डालते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के वक़्त 1998 में किये गये पोखरण विस्फोटों का नारा बुलंद करती है। यह उस इतिहास को डिस्क्रेडिट (बदनाम) करना है, जिसमें होमी जहांगीर भाभा के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े तमाम प्रयास शामिल हैं। यह परमाणु हथियारों के निर्माण में अपनी तमाम ज़िंदगी दे देने वाले भौतिक शास्त्री राजा रामन्ना के उस विश्वास को ख़ारिज़ करना है, जिसमें भारत के परमाणु शक्ति संपन्न देश होने का सपना शामिल था।

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नेहरू को बदनाम करने के मौजूदा राष्ट्रवादी अभियान में यह फ़िल्म भी शामिल हो जाती है, जब इस तथ्य को भुला दिया जाता है कि DAE (परमाणु ऊर्जा विभाग) की शुरुआत आज़ादी के फ़ौरन बाद हो गयी थी और 1959 से रक्षा बजट का एक तिहाई हिस्सा DAE को मिलना शुरू हो गया था। बेशक पोखरण की घटना को भारतीय इतिहास के गौरव का एक अध्याय कहें, लेकिन उस अध्याय की प्रतिष्ठापना इतिहास के पुराने पन्नों को फाड़ कर नहीं की जा सकती।

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‘परमाणु’ एनडीए की पहली पूर्णकालिक सरकार का विज्ञापन करने के उद्देश्य से बनायी गयी फ़िल्म है। फ़िल्म पसंद की जा रही है अपने क्राफ्ट के कारण, जो निस्संदेह अच्छा है। बहरहाल, ‘परमाणु’ एक और ख़तरनाक ग़लतफ़हमी पैदा करती है कि पोखरण जैसी महत्वपूर्ण घटना के पीछे नौकरशाही की इच्छाशक्ति थी। साथ ही भारत की ओर से पाकिस्तान के ख़िलाफ़ युद्ध युद्ध का शोरगुल इसलिए मचाया गया ताकि पोखरण (दो) की गोपनीयता को सुरक्षित रखा जा सके।

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कल्पनाशीलता में रोमांचक लगने वाली यह स्थितियां राजनीतिक रूप से हास्यास्पद हैं। दरअसल, कर्नल गोपाल कौशिक के नेतृत्व में भारतीय सेना के 58 इंजीनियर रेजीमेंट ने मिल कर इस महत्वपूर्ण अभियान को पूरी गोपनीयता से पूरा किया था, लेकिन फ़िल्म में इस सफलता का सेहरा तत्कालीन प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी और एक आईएएस अधिकारी के सिर बांधा गया है। सच्चाई और कल्पना के ऊटपटांग घालमेल से बनी ‘परमाणु’ सटीक और बेहतर हो सकती थी, अगर पोखरण विस्फोटों पर राज चेंगप्पा की किताब ‘वेपंस ऑफ़ पीस’ की मदद ली गयी होती।

पहले दृश्य से ही साफ हो जाता है कि ‘परमाणु’ का उद्देश्य अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से पहले की सरकारों का मज़ाक उड़ाना है, जिसमें नरसिंहा राव की सरकार के वक़्त प्रधानमंत्री कार्यालय को निकम्मे और अदूरदर्शी अधिकारियों से भरा हुआ बताया गया है। निर्देशक अभिषेक शर्मा को यह मालूम होना चाहिए कि वाजपेयी सरकार पोखरण परमाणु विस्फोटों का क्रेडिट इसलिए ले पायी, क्योंकि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये थे।

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18 मई 1974 को पहला परमाणु विस्फोट किया गया, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। इसके बाद लगातार पोखरण में परमाणु अभियान पर काम होते रहे हैं। 1998 का ऑपरेशन सफल होने के बाद चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल वीपी मलिक कहते भी हैं कि सालों-साल हमारे लड़कों ने वहां रेत में बेहतरीन काम किया, पर अभी तक हम इसके बारे में कभी बात नहीं कर सकते थे। इन तमाम उपलब्ध तथ्यों के बाद भी ‘परमाणु’ 11 मई 1998 को हुए पोखरण विस्फोटों का सारा श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को देती है, जबकि वाजपेयी को प्रधानमंत्री बने हुए अभी दो महीने ही हुए थे। अगर यह फ़िल्म सीआईए की विफलता के विवरण और नज़रिये से बनायी गयी होती, तो बेशक मेरे लिए बहुत मायने रखती।

दो हफ़्ते पहले रीलीज़ हुई इस फ़िल्म ने अब तक 70 करोड़ से अधिक का कारोबार कर लिया है। रविवार को जिस तरह की भीड़ मैंने हॉल में देखी, उससे यह अंदाज़ लगाया जा सकता है कि फ़िल्म अभी और कारोबार करेगी। एजेंडा फ़िल्में भी दर्शकों को भरमाने में सफल होती हैं और ‘दर्शकों का सामूहिक विवेक’ जैसी कोई चीज़ नहीं होती, जबकि समीक्षकों ने भी इस फ़िल्म की कोई तारीफ़ नहीं की है और बहुत मामूली स्टार दिये हैं।

नोट :  यह आलोचना लेखक अविनाश दास जी की फ़ेसबुक वाल से ली गई है