इन दिनों पाकिस्तान में बड़ी बड़ी वरैलियां और विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. वहां की सरकार इन दिनों एक 25 साल के युवक और उनसे जुड़े विरोध प्रदर्शनों से परेशान है. इस युवा का नाम है- मंजूर पश्तून.

मंज़ूर पश्तून ताहफुज मूवमेंट (पश्तून रक्षा आंदोलन) नाम से आंदोलन कर रहे हैं. इनकी मांग है कि पिछले 10 साल में चरमपंथ के खिलाफ कार्रवाई में जो लोग गायब हुए हैं, उन्हें सामने लाकर कोर्ट में पेश किया जाए.

सरकार के तमाम अवरोधों के बावजूद ये आंदोलन लगातार बढ़ रहा है, और हजारों की तादाद में लोग इसमें शामिल हो रहे हैं.

 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कराची में एक कबायली युवक के एनकाउंटर के बाद ये आंदोलन शुरू हुआ था. पहले एनकाउंटर करने वाले पुलिस अफसर की गिरफ्तारी की मांग की गई. लेकिन बाद में आंदोलन बढ़ता चला गया.

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार ने आंदोलन पर मीडिया को रिपोर्टिंग नहीं करने की हिदायत दी है.

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इस आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगे कुछ इस प्रकार हैं-

  • पिछले 10 वर्ष में चरमपंथ के ख़िलाफ़ जंग के दौरान जो सैकड़ों पाकिस्तानी शहरी ग़ायब हुए हैं उन्हें ज़ाहिर करके अदालत में पेश किया जाए.
  • अफ़ग़ान सीमा से लगे क़बायली इलाक़ों में अंग्रेज़ों के दौर का काला क़ानून एफ़सीआर ख़त्म कर वहाँ भी पाकिस्तानी संविधान लागू कर वज़ीरिस्तान और दूसरे क़बायली इलाक़ों को वही बुनियादी हक दिए जाएं जो लाहौर, कराची और इस्लामाबाद के नागरिकों को हासिल हैं.
  • तालिबान के ख़िलाफ़ फ़ौजी ऑपरेशन में आम लोगों के जो घर और कारोबार तबाह हुए उनका मुआवज़ा दिया जाए और इन इलाक़ों में चेक पोस्टों पर वहाँ के लोगों से अच्छा सलूक किया जाए.

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पाकिस्तान की राष्ट्रीय संस्थाओं को शक है,कि मंज़ूर पश्तून इतना सीधा नहीं हैं, उन्हें कोई और ऑपरेट कर रहा है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार – जहां-जहां पश्तून ताहफुज़ मूवमेंट के जलसे होते हैं वहां पहले रुकावटें खड़ी की जाती हैं, फिर हटा ली जाती हैं. कल पश्तून ताहफ़ुज मूवमेंट ने लाहौर में जलसा किया, पहले इजाज़त दी गई, फिर इजाज़त वापस ले ली गई.

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तीन महीने पहले पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (पीटीएम) नाम का संगठन तेजी से उभरा है. ये पश्तून समुदाय में काफी लोकप्रिय हो रहा है. पिछले तीन महीनों में पाकिस्तान में आमतौर पर इसी संगठन की अगुवाई में आंदोलन जारी है.

पाकिस्तान की दूसरी पार्टियां जहां इससे दूरी बरत रही हैं, वहीं सेना के डर से पाकिस्तान मीडिया ने भी इसे ब्लैक आउट किया हुआ है. पाक सरकार लगातार पीटीएम नेताओं की धरपकड़ में लगी हुई है, लेकिन इसके बाद भी इसकी रैलियां लगातार जारी हैं, जिससे पाकिस्तानी सरकार घबरा चुकी है.

लाहौर रैली ऐतिहासिक इसलिए है, क्योंकि प्रशासन ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था, इसके बाद भी बड़ी संख्या में लोग खुद ब खुद इकट्ठा हुए. उन्होंने रैली निकाली और सभा की. इसमें सोशल मीडिया का भी योगदान रहा. रैली में बड़े पैमाने पर छात्र और टीचर शामिल हुए.